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लोक जनशक्ति पार्टी: 20 साल पुरानी वो पार्टी जो बिहार से ज्यादा केंद्र की सत्ता में रही, रामविलास पासवान ने क्यों बनाया था अलग दल

Updated at : 09 Oct 2020 8:50 PM (IST)
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लोक जनशक्ति पार्टी:  20 साल पुरानी वो पार्टी जो बिहार से ज्यादा केंद्र की सत्ता में रही, रामविलास पासवान ने क्यों बनाया था अलग दल

Bihar Assembly Election 2020 News Lok jan Shakti Party: बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) एनडीए से अलग हो कर मैदान में है. पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने 143 सीटों पर लड़ने का एलान किया है. पार्टी का इतिहास 20 साल पुराना है लेकिन हमेशा चर्चा में रहा है.

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Bihar Assembly Election 2020 News Lok jan Shakti Party: बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) एनडीए से अलग हो कर मैदान में है. पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने 143 सीटों पर लड़ने का एलान किया है. पार्टी का इतिहास 20 साल पुराना है लेकिन हमेशा चर्चा में रहा है.बिहार के छोटे दलों की सूची में होने के बाद भी लोजपा हमेशा सत्ता में भागेदारी रहती है. लेकिन ये हिस्सेदारी उसे बिहार नहीं, बल्कि केंद्र की सत्ता में मिलती रही है. लोजपा के संस्थापक रामविलास पासवान हैं जिनका निधन गुरुवार की शाम हो गया.

रामविलास पासवान ने 20 साल पहले क्यों बनी थी पार्टी?

लोजपा की स्थापना साल 2000 में रामविलास पासवान ने की थी. पासवान पहले जनता पार्टी से होते हुए जनता दल और उसके बाद जदयू का हिस्सा रहे, लेकिन जब बिहार की सियासत के हालात बदले तो उन्होंने अपनी पार्टी बना ली. बिहार में इस पार्टी की पकड़ निचली जातियों और दलित समुदाय में मानी जाती है. बहुत कम लोगों को साथ लेकर पासवान ने यह पार्टी बनाई थी और इसका मकसद राज्य के निचले तबके को जोड़ना था. दलितों की राजनीति करने वाले पासवान ने 1981 में दलित सेना संगठन की भी स्थापना की थी.

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कितना है वोट बैंक

लोजपा का गठन सामाजिक न्याय और दलितों पीड़ितों की आवाज उठाने के मकसद से किया गया था. बिहार में दलित समुदाय की आबादी तो करीब 17 फीसदी है, लेकिन पासवान जाति का वोट करीब पांच फीसदी है, जो लोजपा का कोर वोट बैंक माना जाता है और इस जाति के सर्वमान्य नेता राम विलास पासवान माने जाते थे. ऐसा कहा जाता था कि जिस गठबंधन में लोजपा रहेगी उसकी जीत पक्की है.

अब तक का प्रदर्शन

लोजपा के गठन के बाद पासवान की इस पार्टी ने कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन में रहकर बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया. 2004 के लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन में रहते हुए लोजपा ने चार सीटें तो विधानसभा चुनाव में 29 सीटें जीती थीं. रामचंद्र पासवान, कैप्टन जयनाराण प्रसाद निषाद और रमेश जिगजिनागी पार्टी के प्रमुख नेता रहे. साल 2009 के आम चुनाव में लोजपा ‘चौथे मोर्चे’ यानी फोर्थ फ्रंट में शामिल हुई थी पर एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी. लोजपा ने 2010 का विधानसभा चुनाव फिर राजद के साथ मिलकर लड़ा. पार्टी को सिर्फ 3 सीटें हाथ लगीं.

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साल 2014 के लोकसभा चुनाव में लोजपा ने 12 साल बाद फिर एनडीए के साथ गठबंधन की घोषणा की. इस गठबंधन में आकर 7 सीटों पर चुनाव लड़कर लोजपा ने 6 सीटें जीतीं. मोदी लहर में एलजेपी की चांदी हो गई. राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान भी जमुई सीट से पहली बार चुनाव लड़े और जीत गए. दूसरी तरफ राम विलास पासवान को केंद्र में मंत्री बनाया गया. 2014 की एनडीए सरकार में पासवान को मंत्री पद भी मिला. एनडीए के ही दल के रूप में 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव भी लोजपा ने 20 सीटों पर लड़ा और सिर्फ 2 सीटों पर जीत मिली.

2005 में किया था कमाल, 2020 में भी उसी चाल पर 

बिहार विधानसभा चुनाव 2005 (फरवरी) में पासवान ने एक बड़ा दांव चला. केंद्र में वो कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार का हिस्सा रहे और बिहार में भी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा. लेकिन दूसरी तरफ यूपीए सरकार के ही सहयोगी लालू यादव की पार्टी राजद के खिलाफ उन्होंने प्रत्याशी उतार दिए. नतीजा ये हुआ कि 29 सीटों पर जीत दर्ज की. दूसरी तरफ किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया.

नीतीश कुमार और लालू यादव दोनों ही पासवान से समर्थन की कोशिश करते रहे लेकिन पासवान ने मुस्लिम मुख्यमंत्री की ऐसी मांग रखी कि दोनों नेताओं में से कोई भी राजी नहीं हुआ. लिहाजा, सरकार नहीं बन पाई और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. इसके बाद अक्टूबर-नवंबर 2005 में फिर से चुनाव कराए गए. इस चुनाव में लोजपा महज 10 सीटों पर सिमट कर रह गई. दूसरी तरफ राजद को भी भारी नुकसान पहुंचा और नीतीश कुमार व बीजेपी ने मिलकर सरकार बना ली.

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Posted By: Utpal kant

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