गंगाजल ही नहीं, गंगा की पवित्र मिट्टी भी पहुंचती है बाबा बैद्यनाथ के दरबार
कांवर यात्रा
Shravani Mela: श्रावणी मेले में गंगाजल के साथ गंगा की मिट्टी भी अहम है. यह न सिर्फ एक पारंपरिक मान्यता है, बल्कि 98 किमी की कठिन यात्रा में जल को रिसाव से बचाने का वैज्ञानिक तरीका भी है. श्रद्धालु इसे घर ले जाकर पूजा-अर्चना में भी इस्तेमाल करते हैं.
सुलतानगंज से शुभंकर की रिपोर्ट
विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में विश्वप्रसिद्ध उत्तरवाहिनी गंगा (सुलतानगंज) से पवित्र जल लेकर अब तक लाखों शिवभक्त बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) की ओर प्रस्थान कर चुके हैं. लेकिन इस 98 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा में गंगाजल जितना ही महत्वपूर्ण स्थान 'गंगा की मिट्टी' का भी है. जल भरने के बाद लगभग हर कांवरिया अपने जलपात्र (कांवर के पात्र) के मुंह पर गंगा की मिट्टी का लेप लगाता है. यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि यात्रा के दौरान जल की एक-एक बूंद को सुरक्षित रखने का मुख्य माध्यम भी बनती है.
गंगा मिट्टी के बिना अधूरी मानी जाती है कांवर यात्रा
अजगैवीनाथ धाम घाट पर उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरने के बाद कांवरिया सबसे पहले अपने जलपात्र को कपड़े से सुरक्षित रूप से बांधते हैं और उसके ऊपर गंगा की पवित्र मिट्टी का मजबूत लेप चढ़ाते हैं.
- लीकेज से सुरक्षा: यह लेप जलपात्र को पूरी तरह से सील (Air-tight Seal) कर देता है, जिससे 98 किमी की ऊबड़-खाबड़ और कठिन पैदल यात्रा के दौरान गंगाजल की एक भी बूंद बाहर नहीं छलकती.
- अक्षुण्ण शुद्धता: कांवरियों का मानना है कि यह केवल एक पुरानी परंपरा नहीं है, बल्कि बाबा धाम तक पवित्र जल को पूरी शुद्धता और सुरक्षित रूप से पहुंचाने की एक सनातन व वैज्ञानिक व्यवस्था है.
आस्था के साथ वैज्ञानिक उपयोग भी
धार्मिक मान्यताओं और व्यवहारिकता के इस अद्भुत संगम पर पंडित संजीव झा बताते हैं:
"धार्मिक दृष्टिकोण से गंगा की मिट्टी में मां गंगा का दिव्य अंश निहित माना जाता है. वहीं व्यवहारिक रूप से यह मिट्टी जलपात्र को एक प्राकृतिक सीलिंग (Natural Sealing) प्रदान करती है, जिससे रिसाव (Seepage) नहीं होता और जल लंबे समय तक सुरक्षित रहता है."
वर्षभर पूजा-अर्चना के लिए घर ले जाते हैं श्रद्धालु
श्रावणी मेले में आने वाले अधिकांश श्रद्धालु बाबा धाम यात्रा पूरी करने के बाद गंगा की मिट्टी को अपने घर भी ले जाते हैं.
- मांगलिक कार्य: इसका उपयोग वर्षभर घर में होने वाली गृह-पूजा, यज्ञ, अनुष्ठान और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों में किया जाता है.
- धार्मिक मान्यता: ऐसी मान्यता है कि यदि किसी कारणवश गंगाजल उपलब्ध न हो, तो सामान्य जल में इस पावन मिट्टी का स्पर्श कराने से वह जल भी धार्मिक अनुष्ठानों के योग्य और पवित्र हो जाता है.
मेले में गंगा मिट्टी की भी भारी मांग
श्रावणी मेले के दौरान अजगैवीनाथ घाट और आसपास की सैकड़ों दुकानों पर फूल, बेलपत्र और पूजा सामग्री के साथ-साथ गंगा की मिट्टी के छोटे-छोटे गोले बिकते हैं. मानसून के दौरान गंगा का जलस्तर बढ़ने पर घाटों से उपयुक्त मिट्टी निकालना मुश्किल हो जाता है, इसलिए स्थानीय कारोबारी पहले से ही शुद्ध मिट्टी का संग्रह कर लेते हैं.
पश्चिम बंगाल से आए शिवभक्त अरुण बम कहते हैं:
"गंगाजल के बिना यह यात्रा अधूरी है, लेकिन गंगा की मिट्टी के बिना जलपात्र पूरा नहीं माना जाता. यही मिट्टी पूरे रास्ते में बाबा के प्रसाद (जल) की रक्षा करती है."
प्रमुख बिंदु (Key Highlights):
- पारंपरिक लेप: हर कांवरिया अपने जलपात्र के मुंह को सुरक्षित रखने के लिए गंगा मिट्टी का लेप लगाता है.
- प्राकृतिक सीलिंग: 98 किलोमीटर की कठिन यात्रा में गंगाजल के रिसाव को रोकने का यह एक पारंपरिक और वैज्ञानिक तरीका है.
- घर-घर में स्थान: श्रद्धालु इस पवित्र मिट्टी को अपने घर ले जाकर सालभर मांगलिक कार्यों में उपयोग करते हैं.
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