जब रामेश्वर बाबू ने सैंडिस कंपाउंड में यूनियन जैक हटाकर फहराया तिरंगा, पढ़ें एक गुमनाम नायक की कहानी

Updated:
विज्ञापन

जयप्रकाश उद्यान स्थित नेहरू मेमोरियल

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत जीर्णोद्धार हुए जयप्रकाश उद्यान के टीले का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से गहरा नाता है. यहीं स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर नारायण अग्रवाल ने ब्रिटिश झंडे की जगह तिरंगा फहराकर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी थी. उनकी शौर्य गाथा आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा है, भले ही शहर में उनकी यादें धूमिल पड़ रही हों.

विज्ञापन

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत भागलपुर के जयप्रकाश उद्यान (सैंडिस कंपाउंड) में जिस टीले का जीर्णोद्धार 'नेहरू मेमोरियल' के रूप में हुआ है, उसका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से गहरा और ऐतिहासिक नाता है. यह वही पवित्र जगह है, जहां स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर नारायण अग्रवाल (रामेश्वर बाबू) ने अंग्रेजी हुकूमत की आंखों में धूल झोंकते हुए ब्रिटिश झंडे 'यूनियन जैक' की जगह भारत का तिरंगा फहरा दिया था. भागलपुर नगरपालिका के दूसरे चेयरमैन और समाज सेवा में अपना जीवन समर्पित करने वाले रामेश्वर बाबू की कहानी आज की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है, भले ही प्रशासनिक उदासीनता के कारण शहर में उनकी यादें मिटती जा रही हों.

बीएचयू से स्वतंत्रता संग्राम तक का सफर और ऐतिहासिक चुनावी जीत

नयाबाजार मोहल्ले के रहने वाले रामेश्वर बाबू वर्ष 1922 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के छात्र थे. महामना मदन मोहन मालवीय से प्रेरित होकर वे आई.ए. की पढ़ाई पूरी करने के बाद सीधे आजादी की लड़ाई में कूद पड़े.

  • दीप बाबू का मिला साथ: भागलपुर में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी दीप नारायण सिंह ने उनकी प्रतिभा को पहचाना.
  • जमींदार को दी मात: दीप बाबू ने उन्हें बिहार की अंतरिम सरकार के प्रथम लेजिस्लेटिव काउंसिल चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार बनाया. उनका मुकाबला बड़े जमींदार बाबू तिलकधारी लाल से था, जिनके समर्थन में खुद दरभंगा महाराज प्रचार करने आए थे. इसके बावजूद नौजवान रामेश्वर बाबू ने शानदार जीत दर्ज की और काउंसिल में कांग्रेस पार्टी के मुख्य सचेतक बने.
View on Instagram

1929 का वह साहसिक दिन: जब यूनियन जैक से ऊंचा लहराया तिरंगा

आजादी की लड़ाई में रामेश्वर बाबू 1922 से 1945 के बीच कई बार जेल गए, लेकिन सबसे ऐतिहासिक घटना 1929 में हुई:

  • झंडे पर विवाद: सैंडिस कंपाउंड में ब्रिटिश सरकार और जनता के सहयोग से एक प्रदर्शनी आयोजित हुई. तत्कालीन जिलाधिकारी इस बात पर अड़े थे कि टीले पर सिर्फ 'यूनियन जैक' फहराया जाएगा.
  • समझौता और बगावत: तत्कालीन आयुक्त पी.सी. सेन से समझौता हुआ कि टीले पर दोनों झंडे लगेंगे. लेकिन नगरपालिका चेयरमैन रामेश्वर बाबू ने जनता के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर भारत का तिरंगा, ब्रिटिश झंडे से कहीं अधिक ऊंचाई पर फहरा दिया.
  • ब्रिटिश संसद में हड़कंप: इस घटना की गूंज पूरी दुनिया के अखबारों में सुनाई दी. ब्रिटिश संसद की आपात बैठक बुलानी पड़ी और भागलपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी व आयुक्त को मुअत्तल (सस्पेंड) कर दिया गया.

उसी टीले पर नेहरू जी ने फेंकी थी चांदी की कुर्सी

इसी ऐतिहासिक टीले के नीचे आज अशोक स्तंभ का खूबसूरत द्वार बना है. वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद जब प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भागलपुर आए, तो उन्होंने इसी टीले पर तिरंगे के नीचे जनसभा को संबोधित किया था. स्थानीय किस्सों के अनुसार, जब नेहरू जी के बैठने के लिए वहां चांदी की कुर्सी लगाई गई, तो वे नाराज हो गए और कुर्सी उछालकर आम जनता के बीच सामान्य रूप से भाषण दिया था.

डॉ राजेंद्र प्रसाद का भेजा गया पत्र और रामेश्वर नारायण अग्रवाल की फाइल तस्वीर
डॉ राजेंद्र प्रसाद का भेजा गया पत्र और रामेश्वर नारायण अग्रवाल की फाइल तस्वीर

डॉ. राजेंद्र प्रसाद से आत्मीयता और 28 साल का स्वर्णिम कार्यकाल

रामेश्वर बाबू का समकालीन बड़े नेताओं जैसे डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, जगजीवन राम और डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह से निकट का संबंध था. देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उनसे इतने आत्मीय थे कि पत्रों में भी उन्हें 'तुम' कहकर संबोधित करते थे.

  • 28 वर्षों तक चेयरमैन: वे 28 वर्षों तक भागलपुर नगरपालिका के चेयरमैन रहे. उनके ही कार्यकाल (1946) में भागलपुर के वार्ड नंबर 18 (राय गोपाल सरकार लेन) में नमूने के तौर पर पहली 'आरसीसी (RCC) सड़क' बनवाई गई थी, जो 60-65 सालों तक मजबूत रही.
  • यूनाइटेड प्रेस के संचालक: वे बिहार के बड़े प्रिंटिंग प्रेसों में शुमार 'यूनाइटेड प्रेस लिमिटेड' की भागलपुर शाखा के संचालक भी थे.
रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय में लगा सचिवों का बोर्ड, जिसमें पहला नाम रामेश्वर नारायण अग्रवाल का है
रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय में लगा सचिवों का बोर्ड, जिसमें पहला नाम रामेश्वर नारायण अग्रवाल का है

आज अपने ही शहर में गुमनाम हैं रामेश्वर बाबू

09 जुलाई 1974 को भागलपुर में ही अंतिम सांस लेने वाले इस महानायक की यादें आज धुंधली पड़ गई हैं. चुनिहारी टोला की सड़क का नाम 'रामेश्वर नारायण अग्रवाल पथ' रखा गया था, लेकिन 90 के दशक में उसका शिलापट्ट नाले में गिर गया, जिसे नगर निगम ने आज तक दोबारा नहीं लगाया. वर्तमान में सिर्फ रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय के कार्यालय में सचिवों की सूची में उनका नाम पहले स्थान पर अंकित है. इतिहास के ऐसे नायकों को सम्मान दिलाना और उनकी यादों को सहेजना आज प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है.


विज्ञापन
संजीव झा

लेखक के बारे में

By संजीव झा

संजीव कुमार झा प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक जागरण से की. अभी प्रभात खबर के भागलपुर कार्यालय में काम कर रहे हैं. शिक्षा, अनुसंधान, कला-संस्कृति व सिनेमा में रुचि रखते हैं.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन