गंगा कटाव से हर साल उजड़ रहे गांव, क्या गाद प्रबंधन और वैज्ञानिक अध्ययन से मिलेगा स्थायी समाधान?

गोपालपुर स्पर संख्या छह के निकट गंगा नदी का दृश्य. | Prabhat Khabar Network
Ganga River Erosion : गंगा नदी के कटाव से उत्तर बिहार के लाखों लोग हर साल विस्थापन और बर्बादी का दंश झेल रहे हैं. करोड़ों के खर्च के बावजूद स्थायी समाधान न मिलने के पीछे फरक्का बैराज और गाद प्रबंधन की भूमिका पर उठ रहे सवाल.
Ganga River Erosion : उत्तर बिहार और गंगा तटीय क्षेत्रों में गंगा नदी का कटाव लगातार गंभीर चुनौती बना हुआ है. विशेषकर भागलपुर, नवगछिया और आसपास के इलाकों में हर वर्ष हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि नदी में समा जाती है. कई गांवों का अस्तित्व मिट चुका है और सैकड़ों परिवार वर्षों से विस्थापन का दंश झेल रहे हैं. ऐसे में स्थानीय लोग अब दीर्घकालिक और वैज्ञानिक समाधान की मांग कर रहे हैं.
हर साल कटाव, हर साल विस्थापन
गंगा के किनारे बसे गांवों में बाढ़ और कटाव का संकट हर वर्ष गहराता जा रहा है. उपजाऊ कृषि भूमि नदी में समाने से किसानों की आजीविका प्रभावित हो रही है, जबकि कई परिवार अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर रहने को मजबूर हैं. लगातार हो रहे कटाव से सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह की चुनौतियां बढ़ी हैं.
करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं मिला स्थायी समाधान
राज्य सरकार हर वर्ष कटाव रोकने के लिए बोल्डर पिचिंग, स्पर, एप्रन और अन्य सुरक्षात्मक कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च करती है. इन उपायों से कई स्थानों पर अस्थायी राहत मिलती है, लेकिन बाढ़ के दौरान नदी फिर अपना मार्ग बदल लेती है और नए क्षेत्रों में कटाव शुरू हो जाता है. यही कारण है कि हर साल वही समस्या दोबारा सामने आ जाती है.
फरक्का बराज और गाद पर उठ रहे सवाल
गंगा तटीय क्षेत्रों के कई स्थानीय लोगों का मानना है कि फरक्का बराज बनने के बाद नदी में गाद (सिल्ट) का जमाव बढ़ा है. उनका कहना है कि इससे नदी की धारा बार-बार बदलती है और कटाव की समस्या अधिक गंभीर हो जाती है.
हालांकि विशेषज्ञों के बीच इस विषय पर एकमत राय नहीं है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि कटाव के पीछे केवल फरक्का बराज नहीं, बल्कि नदी का प्राकृतिक प्रवाह, बाढ़, भू-आकृति, गाद का वितरण और अन्य जलवैज्ञानिक कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
वैज्ञानिक अध्ययन और दीर्घकालिक नीति की जरूरत
स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल वार्षिक कटाव निरोधी कार्यों से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है. उनकी मांग है कि केंद्र सरकार गंगा नदी तंत्र का व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कराए, गाद प्रबंधन की प्रभावी नीति बनाए और आवश्यकता होने पर फरक्का बराज के दीर्घकालिक प्रभावों की विशेषज्ञों से समीक्षा कराए.
विशेषज्ञों का भी मानना है कि नदी प्रबंधन को केवल तात्कालिक उपायों तक सीमित रखने के बजाय पूरे गंगा बेसिन को ध्यान में रखकर दीर्घकालिक रणनीति तैयार की जानी चाहिए. इससे कटाव प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों को स्थायी राहत मिलने की संभावना बढ़ सकती है.
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