डीजे के शोर में दबती ढोलक की थाप, सुरों की साधना से परंपरा बचा रही शिल्पी
फोटो | Prabhat Khabar Network
आज के डिजिटल युग में जहाँ डीजे और आधुनिक संगीत का बोलबाला है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में हारमोनियम, ढोलक और मंजीरे की पारंपरिक धुनें आज भी गूंज रही हैं. गायिका शिल्पी और उनकी कीर्तन मंडली अपनी सुरीली आवाज़ और संगीत साधना से इस विरासत को बचाए रखने का अनूठा प्रयास कर रही है.
बांका : समाज के बदलते परिवेश में एक ओर डीजे की तेज धुन, मोबाइल पर बजते आधुनिक गीत और बदलते दौर का संगीत है, तो दूसरी ओर हारमोनियम की मधुर धुन, ढोलक की थाप और मंजीरे की छनक को बचाए रखने की कोशिश भी जारी है. संगीत के बदलते दौर में ग्रामीण क्षेत्रों की पुरानी सांगीतिक परंपरा भले ही सिमट रही हो, लेकिन कुछ कलाकार और कीर्तन मंडलियां आज भी इसे जीवंत रखने में जुटी हैं.
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इन्हीं कलाकारों में एक नाम शिल्पी का है. अपनी सुरीली आवाज और निरंतर संगीत साधना के जरिए वह ग्रामीण भजन संध्याओं में पुराने सुरों की मिठास घोल रही हैं. बचपन से ही संगीत के प्रति लगाव रखने वाली शिल्पी ने धीरे-धीरे अपनी साधना को आगे बढ़ाया. ग्रामीण क्षेत्र में आयोजित भजन संध्याओं में जब वह मंच संभालती हैं, तो उनकी आवाज के साथ श्रोताओं के बीच पारंपरिक भक्ति संगीत का वही पुराना रंग नजर आने लगता है.
शिल्पी को संगीत की शिक्षा भेड़ामोड़ के डॉ. रघुवीर कुमार से मिल रही है. निरंतर अभ्यास और सीखने की ललक ने उन्हें ग्रामीण क्षेत्र में भजन गायन के लिए एक पहचान दिलाई है.
भजन संध्या में सजती है महफिल
क्षेत्र में जब भी भजन संध्या का आयोजन होता है, शिल्पी अपने सुरों से महफिल सजाने के लिए पूरी तन्मयता से जुट जाती हैं. आधुनिक संगीत के बढ़ते प्रभाव के बीच उनका प्रयास सिर्फ गायन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण संगीत की उस परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश भी है, जिसकी जड़ें गांव की चौपाल, मंदिर और आंगन से जुड़ी रही हैं.
उनके गायन में भक्ति के साथ लोक संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है. यही वजह है कि ग्रामीण आयोजनों में पारंपरिक भजन और कीर्तन सुनने वाले श्रोताओं के बीच उनकी प्रस्तुति को खास पसंद किया जाता है.
मंडली भी बचा रही विरासत
शिल्पी के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के कलाकारों की कीर्तन मंडली भी पुरानी संगीत परंपरा को जीवित रखने के लिए प्रयासरत है. अजय कुमार मिश्रा, मंटून मांझी, नवीत मांझी, सोपन साह, मदन मिश्रा और मोहित मिश्रा सहित मंडली से जुड़े कलाकार आज भी हारमोनियम, ढोलक, झाल और मंजीरे के साथ भजन-कीर्तन की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
इन कलाकारों के लिए भजन-कीर्तन सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि गांव की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हिस्सा है. धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में मंडली की मौजूदगी आज भी पुराने दौर की याद दिलाती है.
पहले सामूहिकता, अब डिजिटल संगीत
ग्रामीणों के अनुसार, पहले संगीत गांव के सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा हुआ करता था. कीर्तन मंडली किसी एक आयोजन तक सीमित नहीं रहती थी, बल्कि पूरे गांव को एक साथ जोड़ती थी. रात-रात भर चलने वाली भजन मंडलियों में बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक शामिल होते थे.
अब मोबाइल और डीजे ने संगीत का स्वरूप बदल दिया है. गीत सुनने के लिए न चौपाल की जरूरत है और न मंडली की. मोबाइल की स्क्रीन पर पसंद का गीत पलभर में उपलब्ध हो जाता है. ऐसे में सामूहिक रूप से बैठकर भजन सुनने और गाने की परंपरा धीरे-धीरे सिमट रही है.
इसके बावजूद शिल्पी और उनकी तरह कई ग्रामीण कलाकार यह संदेश दे रहे हैं कि आधुनिक संगीत अपनी जगह है, लेकिन अपनी मिट्टी के सुरों को खोकर आधुनिक होना उचित नहीं है. ढोलक की थाप, मंजीरे की छनक और हारमोनियम की धुन को बचाए रखने की यह कोशिश भले छोटी दिखाई दे, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए यही प्रयास गांव की पुरानी संगीत परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है.
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