1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों से भिड़ गए थे कमलेश्वरी चौधरी, सहीं जेल की यातनाएं

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स्वतंत्रता सेनानी कमलेश्वरी चौधरी

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बांका जिले के कमलेश्वरी चौधरी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई. उन्होंने जेल की कठोर यातनाएं भी सहीं, फिर भी उनका हौसला नहीं टूटा. यह कहानी दर्शाती है कि आजादी की लड़ाई सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि दूरदराज के गांवों में भी राष्ट्रप्रेम की ज्वाला धधक रही थी.

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देश की आजादी के इतिहास में बांका जिले का योगदान बेहद अहम रहा है. जिले के बाराहाट प्रखंड अंतर्गत मिर्जापुर गांव के रहने वाले स्वतंत्रता सेनानी कमलेश्वरी चौधरी ने स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय और गौरवशाली भूमिका निभाई थी. 1942 के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंका, बल्कि जेल की कठोर यातनाएं भी सहीं. उनकी कहानी इस बात का सशक्त प्रमाण है कि आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि बांका के दूरदराज के गांवों में भी राष्ट्रप्रेम की ज्वाला धधक रही थी.

1942 की क्रांति और अंग्रेजी हुकूमत से सीधी टक्कर

14 सितंबर 1916 को जन्मे कमलेश्वरी चौधरी ने युवावस्था में ही मातृभूमि को आजाद कराने का संकल्प ले लिया था:

  • आंदोलन में कूदने का जज्बा: जब 1942 में महात्मा गांधी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दिया, तो उसकी गूंज बांका के गांवों तक भी पहुंची. कमलेश्वरी चौधरी बिना किसी खौफ के इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन में कूद पड़े.


  • साथियों का मिला मजबूत साथ: इस कठिन संघर्ष में वे अकेले नहीं थे. स्थानीय स्तर पर महेंद्र गोप और सीताराम सिंह सहित कई अन्य क्रांतिकारियों ने कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दिया.

जेल की यातनाएं भी नहीं डिगा सकीं हौसला

आंदोलन को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने हर संभव दमनकारी हथकंडे अपनाए:

  • कठोर कार्रवाई और अत्याचार: अंग्रेजी पुलिस आंदोलनकारियों को चुन-चुन कर गिरफ्तार कर रही थी. कमलेश्वरी चौधरी को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, जहां उन्हें भारी अमानवीय यातनाएं दी गईं.
  • अडिग रहा संकल्प: क्रूर अंग्रेजी शासन और जेल की सलाखें भी इन स्वतंत्रता सेनानियों का हौसला नहीं तोड़ सकीं और वे हंसते-हंसते देश के लिए संघर्ष करते रहे.

शहरों से निकलकर गांवों तक पहुंची थी आजादी की गूंज

कमलेश्वरी चौधरी बताते थे कि स्वाधीनता संग्राम केवल शहरी संभ्रांत वर्ग का आंदोलन नहीं था. गांवों में रहने वाले सामान्य किसानों, मजदूरों और युवाओं ने भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सीना तानकर मोर्चा लिया था. बांका के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन की जो लहर उठी, उसने पूरे इलाके में ब्रिटिश राज की नींव हिला दी थी. स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर मिर्जापुर निवासी कमलेश्वरी चौधरी जैसे गुमनाम नायकों के योगदान को याद करना और उनके शौर्य की कहानी आज की नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य है.


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विभांशु सिंह

लेखक के बारे में

By विभांशु सिंह

विभांशु सिंह प्रिंट माध्यम में 15 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति व सिनेमा में रुचि रखते हैं.

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