त्रेता युग की आस्था से 1883 के ऐतिहासिक दस्तावेजों तक, जानिए कांवर यात्रा का अनूठा इतिहास
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सुल्तानगंज से देवघर की कांवर यात्रा सिर्फ आधुनिक मेला नहीं, बल्कि सहस्रों वर्ष पुरानी परंपरा है. त्रेता युग से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और 1883 के ऐतिहासिक दस्तावेजों से इसके प्राचीन इतिहास को जानें.
आज सुल्तानगंज से देवघर तक करीब 105 किलोमीटर का कांवरिया पथ आधुनिक व्यवस्थाओं, सेवा शिविरों और 'बोल बम' के जयघोष से सराबोर रहता है. लेकिन इस आध्यात्मिक यात्रा की जड़ें आधुनिक श्रावणी मेले से कहीं अधिक गहरी और प्राचीन हैं. धार्मिक मान्यताओं में जहां इसके तार त्रेता युग और पौराणिक काल से जुड़ते हैं, वहीं ऐतिहासिक दस्तावेजों में 19वीं सदी (वर्ष 1883) में बांका होकर कांवरियों के देवघर जाने के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं. यह तथ्य प्रमाणित करता है कि बांका का भू-भाग सदियों से बाबा बैद्यनाथ की यात्रा की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धुरी रहा है.

पौराणिक आख्यान: रावण, परशुराम और प्रभु श्रीराम से जुड़ी परंपराएं
गुरुधाम के पंडित गंगाधर मिश्र के अनुसार, धार्मिक ग्रंथों और लोकपरंपराओं में पहली कांवर यात्रा और शिवाभिषेक को लेकर विभिन्न मान्यताएं प्रचलित हैं:
- दशानन रावण: बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कथा रावण से जुड़ी है. मान्यता है कि शिव को प्रसन्न कर वह शिवलिंग लंका ले जा रहा था, जो देवघर में स्थापित हो गया. इस कारण कई परंपराएं रावण को पहला कांवरिया मानती हैं.
- भगवान परशुराम: कांवर परंपरा की उत्पत्ति के संबंध में एक प्रमुख मत भगवान परशुराम को प्रथम कांवरिया स्वीकार करता है.
- प्रभु श्रीराम का जलाभिषेक: 'आनंद रामायण' के प्रसंगों के अनुसार, भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मण के साथ सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था.
इतिहासकारों के अनुसार, सुल्तानगंज से वर्तमान कांवर परंपरा के व्यापक प्रचलन की शुरुआत 18वीं सदी के आसपास मानी जाती है.

वर्ष 1883 के दस्तावेज: जब बांका से गुजरते थे दो प्रमुख कांवरिया मार्ग
स्थानीय इतिहास के जानकार उदयेश रवि बताते हैं कि तत्कालीन बांका सबडिवीजन के डिप्टी मजिस्ट्रेट बाबू रासबिहारी बोस ने ‘मुखर्जीज़ मैगजीन’ में बांका होकर जाने वाले कांवरियों का विस्तृत विवरण दर्ज किया था.
उस दौर में बांका से देवघर जाने के दो प्रमुख मार्ग प्रचलन में थे:
- पहला मार्ग: कटोरिया और चांदन होते हुए सीधे देवघर पहुंचता था.
- दूसरा मार्ग: जयपुर और जमदाहा के रास्ते बाबा बैद्यनाथ धाम तक जाता था.
उस समय कांवर का स्वरूप भी पारंपरिक था. बांस की बहंगी के दोनों छोर पर बनी टोकरियों में मिट्टी के कलश रखे जाते थे, जिनमें गंगाजल भरकर श्रद्धालु नंगे पांव पदयात्रा करते थे.
ढोल-नगाड़ों की थाप और लोकगीतों का उल्लास
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, कांवरियों के बांका पहुंचते ही यात्रा का रंग पूरी तरह बदल जाता था. कांवरियों की टोलियों के पीछे ढोल-नगाड़ा बजाने वाले दल चलते थे. ढोल की तेज थाप, नृत्य और बाबा बैद्यनाथ के भजनों से पूरा इलाका गूंज उठता था. यात्रा में केवल स्तुति गान ही नहीं, बल्कि कठिन रास्तों, जल स्रोतों, पड़ावों, सुरक्षा की चिंताओं और बाबा की कृपा से जुड़े लोकगीत भी गाए जाते थे. रासबिहारी बोस के दस्तावेजों के अनुसार, उस दौर में सावन से भी अधिक भीड़ महाशिवरात्रि के समय इस मार्ग पर जुटती थी.

'फट्टा पत्थर' और धर्मशाला: अतीत के मौन गवाह
जयपुर और जमदाहा के बीच स्थित 'फट्टा पत्थर' पड़ाव आज भी उस दौर की यादें समेटे हुए है. यहां एक विशाल पत्थर पर बने कुएं से कांवरियों को पेयजल मिलता था. इसी स्थल पर भागलपुर के मारवाड़ी समाज के जोखी राम जी महेशका ने अपनी माता सुरजी देवी की स्मृति में कांवरियों के ठहरने के लिए एक भव्य धर्मशाला बनवाई थी. वर्तमान में यह ऐतिहासिक धर्मशाला और कुआं भले ही जर्जर अवस्था में हों, लेकिन वे उस समृद्ध विरासत की गवाही देते हैं जब बांका की भूमि से होकर लाखों श्रद्धालु बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने जाते थे.
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लेखक के बारे में
By संजीव कुमार
संजीव कुमार पाठक प्रिंट माध्यम में 18 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. बौंसी (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.
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