Aurangabad News: आस्था, इतिहास और लोकविश्वास का अद्भुत संगम

Published by : Vivek Pandey Updated At : 27 May 2026 12:20 PM

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Aurangabad News: यहां मां के निराकार स्वरूप की होती है पूजा, श्रद्धालुओं की हर मन्नत होती है पूरी

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Aurangabad News: (सुजीत कुमार सिंह)
औरंगाबाद जिले के नवीनगर प्रखंड अंतर्गत टंडवा थाना क्षेत्र में कररबार नदी के तट पर स्थित गजनाधाम आज बिहार और झारखंड के लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बन चुका है.प्राकृतिक वातावरण से घिरा यह प्राचीन धाम धार्मिक मान्यताओं, लोकसंस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का अनोखा संगम माना जाता है. नवरात्र, रामनवमी और दशहरा जैसे पर्वों के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. दूर-दराज से आने वाले भक्त मां गजना के दरबार में पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की कामना करते हैं.


स्थानीय लोगों का कहना है कि मां गजना के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता. यही वजह है कि हर वर्ष यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. हालांकि इतनी प्रसिद्धि मिलने के बावजूद यह ऐतिहासिक स्थल आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है. सड़क, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था और श्रद्धालुओं के ठहरने की समुचित व्यवस्था नहीं होने से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है. ग्रामीणों का मानना है कि यदि सरकार इस स्थल का सुनियोजित विकास करे, तो गजनाधाम बिहार-झारखंड का बड़ा धार्मिक पर्यटन केंद्र बन सकता है.

निराकार रूप में होती है मां की आराधना


मंदिर के पुजारी जयनंदन पांडेय ने बताया कि गजनाधाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मां की पूजा किसी प्रतिमा के रूप में नहीं, बल्कि निराकार शक्ति के रूप में की जाती है.मंदिर परिसर में देवी की कोई मानवी आकृति स्थापित नहीं है. मंदिर के महंत अवध बिहारी दास बताते हैं कि यहां मां को वन देवी के रूप में पूजा जाता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत मां गजना पूरी करती हैं.


बताया जाता है कि मंदिर का वर्तमान स्वरूप वर्ष 1965 में जगन्नाथ सिंह उर्फ त्यागी जी के प्रयास से विकसित हुआ. इससे पहले यहां खपड़े का एक छोटा मंदिर हुआ करता था.उस समय श्रद्धालु मिट्टी के हाथी-घोड़े चढ़ाकर मां की पूजा करते थे. समय के साथ यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई और मंदिर की पहचान दूर-दूर तक फैलने लगी.

इतिहास और लोकसंस्कृति से जुड़ी पहचान


गजनाधाम केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इतिहास और लोकसंस्कृति का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है . स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह क्षेत्र प्राचीन काल में आदि मानवों का निवास स्थान रहा है.समीपवर्ती पोलडीह गांव में आज भी प्राचीन अवशेष और देवी-देवताओं की मूर्तियां मिलने की बात कही जाती है. यहां खरवार समाज की कुलदेवी चेड़ीमाई की भी पूजा की जाती है.इतिहासकारों के अनुसार चेरो शासकों के आने से करीब 800 वर्ष पहले जपला खरवार राजाओं की राजधानी हुआ करती थी. प्रसिद्ध साहित्यकार आशुतोष भट्टाचार्य ने अपनी पुस्तक “बंगाला, लोक साहित्य और संस्कृति” में सूर्य पर्व “गाजन” का उल्लेख किया है.माना जाता है कि गाजन पर्व बंगाल के शैव संप्रदाय से जुड़ा एक प्राचीन उत्सव था, जो चैत्र और वैशाख माह में मनाया जाता था। यही कारण है कि इस क्षेत्र की परंपराओं और संस्कृति में बंगाल और मगध दोनों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है.इतिहास यह भी बताता है कि बारहवीं शताब्दी तक यह इलाका बंगाल के शासक रामपाल सेन के अधीन था. बाद में यह क्षेत्र गढ़वाल राजाओं के नियंत्रण में चला गया. सांस्कृतिक प्रभावों के इस मिश्रण ने गजनाधाम को अलग पहचान दी है.

बलि प्रथा बंद होने के बाद बढ़ी श्रद्धा

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यहां पशु बलि की परंपरा प्रचलित थी और बकरे की बलि दी जाती थी. बाद में ग्रामीणों के आग्रह पर पंडित मुखदेव दास ने इस प्रथा को बंद करा दिया. इसके बाद यहां पूजा-पद्धति पूरी तरह सात्विक हो गई और श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ने लगी.
आज भी प्रतिदिन सुबह मां को जगाने, स्नान कराने और श्रृंगार करने की परंपरा निभाई जाती है.चैत माह में नौ दिनों तक विशेष पूजा और रामलीला का आयोजन किया जाता है.रामनवमी और दशहरा के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है.

250 ग्राम घी में बनता है विशेष प्रसाद

मंदिर में पूजा करने पहुंचे संजय कुमार सिंह और हरिहरगंज की नीतू सिंह ने बताया कि गजनाधाम की एक अनोखी परंपरा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. मंदिर में प्रतिदिन केवल 250 ग्राम घी में करीब डेढ़ किलो आटे की पूड़ी तैयार कर मां को भोग लगाया जाता है.यह प्रसाद मिट्टी की कड़ाही में बनाया जाता है और इसके साथ गुड़ भी अर्पित किया जाता है. श्रद्धालु इसे मां की विशेष कृपा और चमत्कार मानते हैं.

मन्नत पूरी होने पर पहुंच रहे नवविवाहित जोड़े


हाल के वर्षों में गजनाधाम की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। बड़ी संख्या में नवविवाहित जोड़े यहां कड़ाही चढ़ाने और पूजा करने पहुंच रहे हैं.श्रद्धालुओं का कहना है कि मां गजना से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. यही कारण है कि लोग अपनी खुशियों और सफलताओं के बाद यहां आकर धन्यवाद अर्पित करते हैं.
स्थानीय लोगों ने सरकार से मांग की है कि गजनाधाम को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए.उनका कहना है कि यदि यहां सड़क, प्रकाश, पेयजल और ठहरने जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो यह स्थल राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सकता है.

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Vivek Pandey

लेखक के बारे में

By Vivek Pandey

विवेक रंजन पांडेय का जन्म और पालन-पोषण बिहार के गौरवशाली इतिहास और ज्ञान की भूमि नालंदा में हुआ. इसी पावन धरती के संस्कारों ने उन्हें समाज और व्यवस्था को गहराई से देखने का नजरिया दिया. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को करियर बदलने के लिए उन्होंने पटना के आर्यभट्ट विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की. पिछले 7 वर्षों से टीवी चैनल के जरिए रिपोर्टिंग फील्ड में लगातार सक्रिय हैं. Network 10 National News Channel से करियर की शुरुआत की. उसके बाद कई संस्थानों में काम किया. शिक्षा और राजनीति के साथ कृषि, महिला सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर विशेष रूचि रखते हैं. पत्रकारिता की बारीकियों को सीखा और ग्राउंड जीरो पर रहकर जनता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. वर्तमान में Prabhat Khabar के माध्यम से बिहार की खबरों को एक नया आयाम दे रहे हैं. वे बिहार की राजनीति के साथ-साथ देश की सियासी हलचलों पर भी पैनी नजर रखते हैं. अपने शानदार करियर में उन्होंने ​बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जब वह उप मुख्यमंत्री थे तब इंटरव्यू किया. इसके साथ कैबिनेट के अधिकांश प्रमुख मंत्रियों का विशेष इंटरव्यू किया है. ​बिहार के शीर्ष नेताओं और नौकरशाहों को बहुत करीब से देखा, समझा और उनकी नीतियों का निष्पक्ष विश्लेषण किया. ​जटिल राजनीतिक घटनाक्रमों को बेहद सरल भाषा में जनता के सामने पेश किया है.

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