आरा में मवेशियों पर महामारी का खतरा: बरसात में भी नहीं हुआ टीकाकरण, पशुपालकों की बढ़ी चिंता

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मवेशी की सांकेतिक तस्वीर

Arrah Cattle Vaccination : आरा जिले में पशुपालकों के बीच मवेशियों के नियमित टीकाकरण को लेकर चिंता बढ़ गई है. बरसात के मौसम में संक्रामक बीमारियों के बढ़ते खतरे और समय पर टीकाकरण न होने से पशुधन को नुकसान का डर सता रहा है. पशुपालक सरकारी दावों पर सवाल उठा रहे हैं और नियमित टीकाकरण अभियान की मांग कर रहे हैं.

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Arrah Cattle Vaccination : आरा जिले में बड़ी संख्या में लोग पशुपालन से जुड़े हैं, लेकिन मवेशियों के नियमित टीकाकरण को लेकर पशुपालकों की चिंता बढ़ रही है. पशुपालकों का आरोप है कि बरसात के मौसम में मवेशियों को संक्रामक और मौसमी बीमारियों से बचाने के लिए नियमित टीकाकरण अभियान नहीं चलाया जा रहा है. इससे पशुओं के बीमार होने और पशुपालकों को आर्थिक नुकसान का खतरा बढ़ गया है.

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पशुओं में बीमारी का बढ़ रहा खतरा

आरा जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मवेशियों का पालन किया जाता है. सरकार पशुधन के विकास और पशुपालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित करती है. पशुओं को संक्रामक बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण भी अहम माना जाता है, लेकिन पशुपालकों का कहना है कि जिले में नियमित अभियान नहीं चल रहा है.

मुफ्त टीकाकरण के दावे पर उठे सवाल

पशुपालकों का आरोप है कि टीकाकरण के लिए कभी-कभार उनकी मांग पर पशु चिकित्सकों को भेजा जाता है, लेकिन दवाओं के लिए शुल्क लिया जाता है. इससे पशुपालकों में नाराजगी है. उनका सवाल है कि यदि सरकारी व्यवस्था में नि:शुल्क टीकाकरण का प्रावधान है, तो इसके लिए उनसे शुल्क क्यों लिया जा रहा है.

बरसात से पहले और बाद टीकाकरण जरूरी

बरसात के मौसम में पशुओं में कई संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. ऐसे में बीमारी फैलने से पहले बचाव के उपाय करना जरूरी होता है. बरसात के बाद भी पशुओं को विभिन्न रोगों से बचाने के लिए टीकाकरण और निगरानी की आवश्यकता रहती है. पशुपालकों का कहना है कि समय पर टीका नहीं लगने से बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है.

बीमारी से दूध उत्पादन पर भी असर

संक्रामक बीमारी की चपेट में आने पर पशुओं के इलाज में पशुपालकों को काफी खर्च करना पड़ सकता है. बीमारी के कारण दूध उत्पादन में कमी आने से उनकी आमदनी भी प्रभावित होती है. ग्रामीण क्षेत्रों में समय पर पशु चिकित्सकीय सुविधा नहीं मिलने की स्थिति में परेशानी और बढ़ सकती है.

गलघोंटू का भी रहता है खतरा

गलघोंटू एक संक्रामक जीवाणुजनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से गाय और भैंसों को प्रभावित करती है. बरसात के मौसम में इसके फैलने का खतरा बढ़ सकता है. संक्रमित पशु के मल, मूत्र और नाक से निकलने वाले स्राव के संपर्क से संक्रमण फैलने की आशंका रहती है. समय पर पशु चिकित्सक की सलाह और निर्धारित टीकाकरण से बचाव में मदद मिल सकती है.

खुरपका-मुंहपका से भी सावधानी जरूरी

खुरपका-मुंहपका एक संक्रामक विषाणुजनित बीमारी है, जो कई जुगाली करने वाले पशुओं में हो सकती है. संक्रमित पशुओं में मुंह और खुर के आसपास छाले, लंगड़ापन और अत्यधिक लार आने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. इस बीमारी की रोकथाम के लिए समय पर टीकाकरण और संक्रमित पशुओं को अलग रखना महत्वपूर्ण है.

लंगड़िया रोग भी बन सकता है परेशानी

लंगड़िया रोग भी गाय और भैंसों में होने वाली संक्रामक बीमारी है. बरसात के दौरान इसके फैलने का खतरा बढ़ सकता है. पशुपालकों के अनुसार बीमार पशु के संपर्क, दूषित चारा-दाना या घाव के माध्यम से संक्रमण फैलने की आशंका रहती है. ऐसे में पशुओं के स्वास्थ्य पर नियमित निगरानी जरूरी है.

रिंडरपेस्ट का उल्लेख भी सामने आया

पशुपालकों की ओर से रिंडरपेस्ट यानी पशु प्लेग का भी उल्लेख किया गया है. इसमें तेज बुखार, भूख में कमी और दुग्ध उत्पादन घटने जैसे लक्षण बताए जाते हैं. हालांकि रिंडरपेस्ट के संबंध में वर्तमान स्थिति को लेकर किसी आधिकारिक जिलेवार पुष्टि की जानकारी यहां उपलब्ध नहीं है. किसी भी बीमारी के लक्षण दिखने पर पशुपालकों को पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए.

पशुपालकों ने नियमित टीकाकरण की मांग की

पशुपालकों का कहना है कि पशुओं में रोग फैलने के बाद इलाज कराने के बजाय समय रहते टीकाकरण और अन्य बचाव उपाय किए जाने चाहिए. उन्होंने जिले में निर्धारित समय पर टीकाकरण अभियान चलाने और सरकारी व्यवस्था के तहत उपलब्ध सुविधाओं का लाभ पशुपालकों तक पहुंचाने की मांग की है.

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