महादेव के भस्म श्रृंगार का रहस्य, जानें भगवान शिव क्यों लगाते हैं शरीर पर राख

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भगवान शिव

सनातन परंपरा में भगवान शिव का भस्म श्रृंगार अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह नश्वरता, वैराग्य और इच्छाओं पर विजय का प्रतीक है. जानें महादेव के इस अलौकिक स्वरूप के पीछे छिपे गहरे अर्थ.

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Bhagwan Shiva Singar: सनातन परंपरा में भगवान शिव का स्वरूप अन्य सभी देवी-देवताओं से अत्यंत भिन्न और अलौकिक माना गया है. जहां अन्य देवता दिव्य वस्त्रों, आभूषणों और वैभव से सुशोभित रहते हैं, वहीं देवों के देव महादेव अपने शरीर पर भस्म (राख) धारण करते हैं, गले में सर्प पहनते हैं और बाघंबर ओढ़ते हैं. भगवान शिव का भस्म धारण करना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है. आइए जानते हैं कि आखिर महादेव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं.

जीवन की नश्वरता और वैराग्य का संदेश

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भस्म संसार की अंतिम अवस्था का प्रतीक है. चाहे धन हो, पद हो, सौंदर्य हो या अहंकार, अंततः सब कुछ नष्ट होकर राख में ही परिवर्तित हो जाता है. भगवान शिव अपने शरीर पर भस्म धारण कर यह संदेश देते हैं कि यह भौतिक शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा ही शाश्वत और सत्य है. भस्म वैराग्य का प्रतीक है, जो मनुष्य को मोह-माया और सांसारिक आकर्षणों से ऊपर उठकर जीवन जीने की प्रेरणा देती है.

कामदेव दहन और इच्छाओं पर विजय

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एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं के अनुरोध पर कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तब महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर उन्हें भस्म कर दिया. इसके बाद उन्होंने उसी भस्म को अपने शरीर पर धारण किया. इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ यह माना जाता है कि भगवान शिव ने काम, क्रोध, मोह और वासना जैसी सांसारिक इच्छाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली थी. इसलिए भस्म आत्मसंयम और इंद्रियों पर नियंत्रण का भी प्रतीक मानी जाती है.

जब भगवान शिव ने तोड़ा एक साधु का अहंकार

शिव पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार, एक समय जंगल में प्राणाद नाम के एक तपस्वी साधु रहते थे. वे केवल फल और पत्तियां खाकर कठोर तपस्या करते थे. उनकी साधना का प्रभाव इतना अधिक था कि जंगल के हिंसक पशु भी उनके सामने शांत हो जाते थे.

एक दिन लकड़ी काटते समय उनकी उंगली गलती से कट गई. आश्चर्य की बात यह थी कि उंगली से रक्त की जगह हरे रंग का रस निकलने लगा. इसे देखकर साधु को लगा कि उनकी तपस्या इतनी सिद्ध हो चुकी है कि उनका शरीर अब सामान्य मनुष्यों जैसा नहीं रहा. धीरे-धीरे उन्हें अपनी तपस्या और सिद्धियों पर घमंड हो गया.

भगवान शिव ने जब उनका अहंकार देखा, तो वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उनके सामने पहुंचे और पूछा, "तुम इतने गर्वित क्यों हो?" साधु ने अपनी उंगली दिखाते हुए कहा, "देखिए, मेरी तपस्या का प्रभाव. मेरे शरीर से रक्त नहीं, बल्कि पौधों जैसा रस निकल रहा है."

तब भगवान शिव ने कहा, "चाहे शरीर कितना भी पवित्र, शक्तिशाली या सिद्ध क्यों न हो जाए, उसका अंतिम परिणाम भस्म ही है. जब अंतिम सत्य केवल राख है, तो इस नश्वर शरीर पर अहंकार कैसा?" भगवान शिव की यह बात सुनकर साधु प्राणाद का घमंड चूर हो गया. उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगकर पुनः विनम्र भाव से तपस्या आरंभ की.

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नेहा कुमारी

लेखक के बारे में

By नेहा कुमारी

नेहा कुमारी वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में धर्म बीट पर कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. वह व्रत-त्योहार, राशिफल, पंचांग, ज्योतिष, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेख लिखती हैं. उन्होंने वेस्ट बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की डिग्री प्राप्त की है.

डिजिटल पत्रकारिता में उन्होंने धर्म, ज्योतिष और भारतीय परंपराओं से जुड़े विषयों पर विशेष अनुभव हासिल किया है. उनका उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में सटीक, विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुंचाना है, ताकि वे धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को आसानी से समझ सकें.

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