गायत्री जयंती है आज, जानें वेदमाता के अवतरण की रोचक कथा

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गायत्री जयंती 2026

Gayatri Jayanti 2026: आज, 25 जून गुरुवार को गायत्री जयंती का त्योहार मनाया जा रहा है. इस दिन मां गायत्री की पूजा-अर्चना और व्रत रखने का विशेष महत्व होता है. आइए इस पावन अवसर पर वेदमाता के अवतरण की कथा जानते हैं.

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Gayatri Jayanti 2026: आज ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देश भर में गायत्री जयंती का पावन पर्व बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. सनातन परंपरा में माँ गायत्री को सिर्फ एक देवी नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की ‘आद्यशक्ति’ और समस्त ज्ञान यानी चारों वेदों की जननी ‘वेदमाता’ माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज ही के दिन धरती से अज्ञानता का नाश करने के लिए माता का अवतरण हुआ था. माता के अवतरण से संबंधित ऐसी कई पौराणिक कथाएँ हैं, जिनमें से तीन के बारे में हमने इस आर्टिकल में चर्चा की है.

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जब सृष्टि के प्रारंभ में गूंजा महामंत्र

पौराणिक कथा के अनुसार, जब सृष्टि की शुरुआत हुई तो चारों ओर केवल गहरा अंधकार और अज्ञानता का वातावरण था. तब संसार में ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए देवताओं और ऋषियों ने परमपिता ब्रह्मा जी से प्रार्थना की. ऋषियों की पुकार सुनकर ब्रह्मा जी ने अपने दिव्य तेज से माँ गायत्री को प्रकट किया. माँ गायत्री के प्रकट होते ही ब्रह्मा जी ने अपने चारों मुखों से गायत्री मंत्र का उच्चारण किया, जिससे चारों वेदों की उत्पत्ति हुई. माँ गायत्री की कृपा से ही ब्रह्मा जी को सृष्टि निर्माण की शक्ति और वरदान मिला, इसीलिए उन्हें ‘वेदमाता’ कहा गया.

पुष्कर का यज्ञ और सावित्री का शाप

माता के अवतरण की दूसरी सबसे प्रसिद्ध कथा राजस्थान के तीर्थराज पुष्कर से जुड़ी है. एक बार ब्रह्मा जी सृष्टि के कल्याण के लिए वहाँ एक विशेष महायज्ञ कर रहे थे. धार्मिक नियमों के अनुसार, उस यज्ञ में ब्रह्मा जी के साथ उनकी पत्नी देवी सावित्री का बैठना अनिवार्य था, लेकिन सावित्री समय पर यज्ञ स्थल पर नहीं पहुँच सकीं. यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकलता जा रहा था. ऐसे में यज्ञ को पूरा करने के लिए ब्रह्मा जी ने वहाँ मौजूद देवी गायत्री से विवाह किया और उन्हें अपनी सहचरी (पत्नी) के रूप में स्थापित कर यज्ञ संपन्न किया. जब देवी सावित्री वहाँ पहुँचीं, तो ब्रह्मा जी के पास दूसरी स्त्री को बैठा देख वे क्रोधित हो गईं और उन्होंने ब्रह्मा जी को शाप दे दिया कि संसार में कहीं भी उनकी पूजा नहीं की जाएगी.

गाय के मुख से प्राकट्य का रहस्य

इसी पुष्कर यज्ञ से जुड़ी एक और अनोखी मान्यता है. कहा जाता है कि जब देवी सावित्री के आने में देरी हो रही थी, तब यज्ञ करा रहे ब्राह्मणों और ऋषियों ने वेदमंत्रों के तीव्र उच्चारण के साथ वहाँ एक गाय को बैठाया. मंत्रों के उसी दिव्य प्रभाव से उस गाय के मुख से साक्षात देवी गायत्री प्रकट हुईं. इसके बाद उन्हें ब्रह्मा जी के बगल में बिठाकर यज्ञ को समय पर पूरा किया गया.

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