लक्ष्मी के वाहन उल्लू की पूजा से अर्थ लाभ होगा या नहीं, जानें क्या कहते हैं सद्गुरुश्री स्वामी आनंद जी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Oct 2019 12:06 PM
सद्गुरुश्री स्वामी आनंद जीसद्गुरु स्वामी आनंद जी एक आधुनिक सन्यासी हैं, जो पाखंड के धुरविरोधी हैं और संपूर्ण विश्व में भारतीय आध्यात्म व दर्शन के तार्किक तथा वैज्ञानिक पक्ष को उजागर कर रहे हैं. सद्गुरुश्री के नाम से प्रख्यात कार्पोरेट सेक्टर से अध्यात्म में क़दम रखने वाले यह आध्यात्मिक गुरु नक्षत्रीय गणनाओं तथा गूढ़ विधाओं […]
सद्गुरुश्री स्वामी आनंद जी
सद्गुरु स्वामी आनंद जी एक आधुनिक सन्यासी हैं, जो पाखंड के धुरविरोधी हैं और संपूर्ण विश्व में भारतीय आध्यात्म व दर्शन के तार्किक तथा वैज्ञानिक पक्ष को उजागर कर रहे हैं. सद्गुरुश्री के नाम से प्रख्यात कार्पोरेट सेक्टर से अध्यात्म में क़दम रखने वाले यह आध्यात्मिक गुरु नक्षत्रीय गणनाओं तथा गूढ़ विधाओं में पारंगत हैं तथा मनुष्य के आध्यात्मिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक व्यवहार की गहरी पकड़ रखते हैं. आप भी इनसे अपनी समस्याओं को लेकर सवाल पूछ सकते हैं. इसके लिए आप इन समस्याओं के संबंध में लोगों के द्वारा किये गये सवाल के अंत में पता देख सकते हैं…
-दिवाली पर लक्ष्मी के वाहन उल्लू की पूजा करनी चाहिए?
नीरज पारिख, किशन गंज
वर्तमान का उचित मूल्यांकन, दूरदृष्टि, सही दिशा में लिये गये निर्णय और अनवरत सटीक कर्म ही अर्थ लाभ की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं. उल्लू विशिष्ट दृष्टिकोण का प्रतीक है. उल्लू तब देखता है, जब जगत देख नहीं सकता. यह उल्लू की विलक्षण व्यापारिक क्षमता है. अतएव लक्ष्मी यानी धन का वाहक वही है, जो वक्त से पहले आने वाले वक्त को देख सके. उल्लू को लक्ष्मी का वाहन समझ कर पूजना मेरी दृष्टि में उचित नहीं. हमारे ग्रंथों में भी इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता.
-क्या दिवाली पर द्यूत क्रीड़ा (जुआ खेल) से लक्ष्मी प्रसन्न होकर अपने स्थायी स्वरूप में वास करती हैं?
अमिताभ अग्रवाल, कटिहार
कदापि नहीं. जुआ लोभ से जन्मी एक कुरीति है. उसके पोषण के लिए ही ऐसी असत्य और भ्रामक अवधारणाएं फैलाई गयी हैं, जिसकी न ही कोई आध्यात्मिक बुनियाद है, न तांत्रिक आधार. इस जगत में हर शय परिवर्तनशील है. धन की स्वामिनी लक्ष्मी को भी चंचला कहा गया है. इसलिए धन को स्थायी समझने का ख्याल एक भूल है. धन को द्यूत से अर्जित करने का ख्याल अकर्मठ, अयोग्य और आलसियों का है.
-दीपावली का तंत्र साधना से क्या संबंध है?
विनीत शाह, रांची
दीपावली महापर्व अभीष्ट सिद्धि के लिए बेहद मुफीद है. यह काल हमारे लक्ष्यों कि पूर्ति में बड़ी भूमिका अदा करता है. यह हमारे ऊपर ही निर्भर है कि हम इस महापर्व से क्या चाहते हैं. यदि हम मोक्ष चाहते हैं, तो इस काल में मोक्ष के पथ पर हमारे कदमों को गति मिलेगी. यदि हमारी आकांक्षा भौतिकता की है, तो हम उसके करीब पहुंचेंगे. यदि हमें ज्ञान चाहिए, तो इस काल में हम अपने ज्ञान में इज़ाफा कर सकते हैं. यदि हमारी रूचि तंत्र में है, तो उस उद्देश्य की पूर्ति होगी.
श्रींकार यानी श्रीं बीज को लक्ष्मी बीज कहा गया है, पर सिर्फ लक्ष्मी प्राप्ति ही समृद्धि का कारक नहीं. समृद्धि और ऐश्वर्य के सूत्र तो माया में समाहित हैं. मान्यताओं के अनुसार माया और लक्ष्मी एक नहीं, भिन्न हैं. माया का बीज मंत्र ह्रींकार यानी ह्रीं है, पर उस समृद्धि का कोई मोल नहीं जिसमें आकर्षण न हो. क्लींकार यानी क्लीं को आकर्षण बीज कहा गया है. तंत्र शास्त्र में ऐंकार यानी ऐं को ज्ञान बीज माना गया है.
उपाय, जो जीवन बदले : शंख पर रोली से लक्ष्मी बीज का लेखन कठिन आर्थिक स्थिति के निराकरण में महती भूमिका का निर्वहन करता है. मान्यताएं कहती हैं कि कागज पर बड़ी संख्या में लक्ष्मी बीज और माया बीज मंत्र लिखकर तथा काट कर उसे आटे की छोटी-छोटी गोलियों में लपेटकर मछलियों को अर्पित करने से आर्थिक संकोच नष्ट होते हैं.
यदि आपकी कोई ज्योतिषीय, आध्यात्मिक या गूढ़ जिज्ञासा हो, तो आप अपनी जन्म तिथि, जन्म समय व जन्म स्थान के साथ कम-से-कम शब्दों में हमें अपना प्रश्न saddgurushri@gmail.com पर भेजें. सब्जेक्ट लाइन में ‘प्रभात खबर’ जरूर लिखें. चुनिंदा सवालों के जवाब प्रकाशित किये जायेंगे.
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