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झारखंड के जिला अस्पतालों में बंटी रद्दी दवाइयां, बच्चों को लगा हेपेटाइटिस का एक्सपायर्ड टीका

Updated at : 17 Mar 2022 7:06 AM (IST)
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झारखंड के जिला अस्पतालों में बंटी रद्दी दवाइयां, बच्चों को लगा हेपेटाइटिस का एक्सपायर्ड टीका

झारखंड के जिला अस्पतालों में मरीजों को रद्दी दवाईयां दी गयी है व बच्चों को हेपेटाइटिस-बी की एक्सपायर्ड वैक्सीन लगायी गयी है. ऑडिट में ये मामला उजागर हुआ है. ये जानकारी प्रधान महालेखाकार इंदु अग्रवाल संवाददाता सम्मेलन में दी.

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रांची: राज्य के जिला अस्पतालों में मरीजों को रद्दी दवाइयां दी गयीं और बच्चों को हेपेटाइटिस-बी की एक्सपायर्ड वैक्सीन लगायी गयी. ऑडिट में ये तथ्य रामगढ़ और देवघर के जिला अस्पतालों में उजागर हुए. विभाग ने गड़बड़ी के इन मामलों में महालेखाकार द्वारा उठाये गये बिंदुओं का जवाब ही नहीं दिया. जांच में देर की वजह से एक करोड़ रुपये से अधिक की दवा बेकार हो गयी. यह जानकारी प्रधान महालेखाकार(ऑडिट) इंदु अग्रवाल ने बुधवार को संवाददाता सम्मेलन में दी.

जिला अस्पताल को मिला नकली इंजेक्शन : इंदु अग्रवाल ने बताया कि देवघर के सिविल सर्जन ने 25 जुलाई 2018 से जनवरी 2019 के बीच डेक्सोना इंजेक्शन (दो एमएल) का 17.500 वॉयल जिला अस्पताल को दिया. ड्रग इंस्पेक्टर ने 30 जुलाई 2018 को इसमें से नमूना लेकर जांच के लिए भेजा. रीजनल ड्रग टेस्टिंग लैब गुवाहाटी ने आठ मार्च 2019 को इंजेक्शन को नकली (स्पूरियस) करार दिया. आपूर्तिकर्ता की आपत्तियों और न्यायालय के आदेश के आलोक में इंजेक्शन को दूसरी बार सीडीएल कोलकाता भेजा गया. जांच के बाद सीडीएल ने इसे ‘सब-स्टैंडर्ड’ करार दिया. कोलकाता की प्रयोगशाला की रिपोर्ट 11 सितंबर 2019 को आयी.

ऑडिट में पाया गया कि देवघर जिला अस्पताल ने इस इंजेक्शन के 17,500 वॉयल में से 12 मार्च 2019 तक मरीजों के लिए 4,185 वॉयल का इस्तेमाल कर लिया. 309 वॉयल का इस्तेमाल 12 मार्च से 31 मार्च 2019 तक के बीच किया गया. जबकि गुवाहाटी की प्रयोगशाला ने 12 मार्च 2019 को जानकारी दे दी थी. फिर बाद में कोलकाता की प्रयोगशाला ने भी इंजेक्शन के रद्दी होने की 11 सितंबर 2019 को पुष्टि की थी.

प्रयोगशाला द्वारा रद्दी घोषित करने के बाद भी मरीजों के लिए इस इंजेक्शन के इस्तेमाल पर महालेखाकार द्वारा उठाये गये सवालों का कोई जवाब विभाग ने नहीं दिया.

रद्द घोषित एंटीबायोटिक का किया इस्तेमाल :

उन्होंने बताया कि झारखंड मेडिसिन प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन ने रामगढ़ जिला अस्पताल को एसाइक्लोविर-200 एमजी नामक एंटीबायोटिक 31 अगस्त 2018 को दिया था. झारखंड स्थित प्रयोगशाला ने जांच के बाद 15 मार्च 2019 को इसे रद्द घोषित कर दिया. कॉरपोरेशन से मिली पांच हजार गोलियों में से 23 नवंबर 2018 से 27 मार्च 2019 तक की अवधि में 140 गोलियां मरीजों के दे दी गयीं. बाकी बची 4,860 गोलियां फरवरी 2020 तक अस्पताल के गोदाम में पड़ी थी.

हेपिटाइटिस-बी के एक्सपायर्ड 410 डोज बच्चों को लगाये :

ऑडिट में पाया गया कि रामगढ़ जिला अस्पताल ने हेपिटाइटिस-बी के एक्सपायर्ड 410 डोज बच्चों को लगाया. हेपिटाइटिस-बी की वैक्सीन अक्तूबर 2018 में एक्सपायर हो चुकी थी. इसके बावजूद नवंबर 2018 से जनवरी 2019 तक की अवधि में बच्चों पर इस वैक्सीन का इस्तेमाल किया गया. दवाइयों की क्वालिटी जांच में होनेवाली देर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कॉरपोरेशन ने 1.11 करोड़ रुपये की एंटीबायोटिक 2017 में खरीदी.

इसकी एक्सपायरी डेट अक्तूबर 2018 थी. जांच में दवा को सब-स्टैंडर्ड करार दिया गया. कॉरपोरेशन ने सप्लायर को यह सूचना देने में डेढ़ महीने की देरी की. सूचना मिलने के बाद सप्लायर ने आपत्ति दर्ज करायी और फिर से जांच कराने की मांग की. इसके तीन महीने बाद दवा को जांच के लिए कोलकाता भेजा गया. प्रयोगशाला ने जुलाई 2018 में अपनी रिपोर्ट दी. इसके बाद बाकी बचे तीन महीने में छह लाख रुपये का एंटीबायोटिक का इस्तेमाल हो सका. बाकी दवाइयां के इस्तेमाल की अवधि समाप्त हो गयी.

Posted by: Sameer Oraon

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