आजादी के बाद नोआखाली में हुई थी भयंकर हिंसा, तब महात्मा गांधी ने हिंदू-मुसलमानों से कही थी ये बात
कट्टर विरोधी शाहिद सुहरावर्दी के साथ महात्मा गांधी. सफेद कुर्ते में सुहरावर्दी
Story Of Partition Of India 7 : महात्मा गांधी वो व्यक्ति थे जिन्हें संभवत: भारत के विभाजन से सबसे ज्यादा दुख हुआ होगा. डोमिनीक लापिएर और लैरी काॅलिन्स ने अपनी किताब फ्रीडम एड नाइट उन्होंने हमेशा यही चाहा कि भारत को आजादी एक भारत के रूप में मिले ना कि खंडित भारत और पाकिस्तान के रूप में. लेकिन उनकी यह चाहत पूरी नहीं हो सकी. भारत का विभाजन हुआ और इतना ही नहीं जिस देश को महात्मा गांधी एक रखना चाहते थे, वहां हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे. उस वक्त महात्मा ने नोआखाली जाने का फैसला किया था.
Table of Contents
Story Of Partition Of India 7 : जिस वक्त देश में पाकिस्तान की मांग जोर पकड़ चुकी थी और मुस्लिम आम मुसलमान के मन में यह बात भर चुका था कि भारत में मुसलमानों पर अत्याचार होगा, उस वक्त एक मुसलमान महिला ने विभाजन का विरोध करने पर महात्मा गांधी को बहुत खरी-खोटी सुनाई थी. उन्होंने महात्मा गांधी से यह कहा था कि अगर दो भाई एक घर में रहते थे और वे अलग होकर दो अलग घरों में रहना चाहेंगे तो क्या आप उन्हें रोक देंगे. इसपर महात्मा ने कहा था-खास कि हम दो भाइयों की तरह अलग हो रहे होते. हम तो एक दूसरे का खून बहा रहे हैं, मां की कोख में ही बच्चों की बोटियां नोच रहे हैं. महात्मा गांधी देश में फैली सांप्रदायिक हिंसा से बहुत दुखी थे. उन्होंने हिंसाग्रस्त नोआखाली जाने का फैसला किया था.
नोआखाली में क्या हुआ था?

नोआखाली अब बांग्लादेश में स्थित है. जब देश में पाकिस्तान की मांग बढ़ती जा रही थी और ऐसे में मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन डे (16 अगस्त 1946) मनाए जाने से यह मांग और बढ़ गई और देश के मुसलमान आरपार की लड़ाई के मूड में थे, उसी वक्त नोआखाली में भयंकर नरसंहार हुआ. देश में दो राज्य ऐसे थे, जिनपर विभाजन का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा-पंजाब और बंगाल. बंगाल में तो अंग्रेजों ने 1905 में ही धर्म के आधार पर फूट डाल दी थी और राज्य को पूर्वी बंगाल और पश्चिम बंगाल में बांट दिया था. उसपर जब डायरेक्ट एक्शन की बात आई, तो मुसलमानों ने नोआखाली में हिंदुओं के साथ बर्बरता की हद कर दी थी. 1946 में जब यहां हिंसा की आग फैली थी तो महात्मा गांधी सात नवंबर को यहां आए थे और लगभग चार महीने तक यहां रूके थे. उनके यहां रूकने ने हिंसा में कमी आई और कई शांति समिति भी गठित की गई थी. गांधी जी ने हिंदुओं और मुसलमानों से हिंसा का रास्ता छोड़ने को कहा था.
इसे भी पढ़ें : क्या आप जानते हैं, आजादी के बाद भारत ने पाकिस्तान को क्यों दिया था 75 करोड़ रुपया?
History of Munda Tribes 10 : नागवंशी राजा फणिमुकुट राय को कब मिली थी शासन की बागडोर?
विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें
15 अगस्त को माउंटबेटन ने महात्मा को नोआखाली क्यों नहीं जाने दिया
महात्मा गांधी ने यह तय किया था कि वे आजादी के दिन नोआखाली के आतंकित हिंदुओं के साथ समय गुजारेंगे. उन्होंने वहीं पर चरखा चलाकर सूत कातने और उपवास करने का फैसला किया था.लेकिन माउंटबेटन उन्हें कलकत्ता में रोकना चाहते थे. माउंटबेटन ने महात्मा गांधी से कहा था कि वे नोआखाली जाने की बजाय कलकत्ता में रूकें, क्योंकि यहां हिंसा की आग फैल गई तो उसे रोकना असंभव होगा. सेना भेजने पर भी वहां हिंसा रोकना संभव नहीं हो पाएगा. इसपर गांधी जी ने उनसे कहा था कि यह आपकी विभाजन योजना का परिणाम है. दरअसल माउंटबेटन को यह भरोसा था कि महात्मा गांधी भारतीयों को इतनी अच्छी तरह समझते हैं और उनके प्रति भारतीयों का इतना सम्मान है, फिर चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान, वे उनके आगे हथियार नहीं उठाएंगे. यही वजह था कि कि माउंटबेटन उन्हें नोआखाली नहीं जाने देना चाहते थे. लेकिन महात्मा गांधी ने उनके अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया और वे नोआखाली जाने के लिए ही मन बना चुके थे.
किसके कहने पर कलकत्ता में रूक गए थे महात्मा गांधी
महात्मा गांधी अपने कट्टर विरोधी शाहिद सुहरावर्दी के कहने पर कलकत्ता में रूक गए थे. सुहरावर्दी ने उनसे यह कहा था कि उनके यहां रूकने से मुसलमानों पर खतरा कम होगा. गांधी जी ने उनकी बात मान ली थी, लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि वे उनके साथ रहें और हिंदू-मुसलमानों को एक करने के लिए काम करें. डोमिनीक लापिएर और लैरी काॅलिन्स ने अपनी किताब फ्रीडम एड नाइट में लिखा है कि सुहरावर्दी वह व्यक्ति था जिसने कलकत्ता में डायरेक्ट एक्शन के नाम पर खून की नदियां बहाई थी, अब वह भय से गांधीजी की शरण में था. गांधीजी ने कलकत्ता में रूकने के एवज में उससे यह वादा मांगा कि नोआखाली के हिंदू सुरक्षित रहेंगे. तमाम विरोध के बावजूद महात्मा एक गंदी बस्ती में एक मुस्लिम के खंडहर जैसे घर में रूके थे और हिंदू-मुसलमान को एक करने की कोशिश की थी.
इसे भी पढ़ें : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति ने अगर H-1B वीजा को किया समाप्त तो, हजारों भारतीयों पर गिर सकती है गाज
पाकिस्तान के लिए मुस्लिम लीग ने की थी डायरेक्ट एक्शन की घोषणा, कलकत्ता में हुआ था भीषण दंगा
नोआखाली में क्या हुआ था?
नोआखाली में नरसंहार हुआ था, जिसमें हजारों लोगों की जान गई थी और अपहरण, बलात्कार और धर्मांतरण की घटना भी हुई थी.
महात्मा गांधी को नोआखाली जाते हुए किसने कलकत्ता में रोका?
शाहिद सुहरावर्दी के कहने पर महात्मा गांधी कलकत्ता में रूके थे, वह उनका कट्टर विरोधी था.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










