परमात्मा से आत्मा के मिलन का जरिया है महाकुंभ, जानिए नागा साधु क्यों शाही स्नान में पहले लगाते हैं डुबकी

Edited by Rajneesh Anand
Updated:
विज्ञापन

नागा साधु

Maha Kumbh Mela : महाकुंभ में स्नान से पाप धुल जाते हैं, ये बात हर दूसरा आदमी कहता है. लेकिन जो व्यक्ति पाप करता है, उसे पाप धोने की जरूरत क्यों पड़ती है? वजह साफ है एक इंसान के अंदर आत्मा होती है, जो परमात्मा का अंश है. आत्मा, परमात्मा के बिना नहीं रह सकती है और परमात्मा से मिलन के लिए वह पाप धोकर मोक्ष पाने की इच्छा करता है.

विज्ञापन

Maha Kumbh Mela : हिंदू धर्म के अनुसार आत्मा अजर-अमर है और वह परमात्मा का अनमोल अंश है. परमात्मा हर आत्मा को किसी ना किसी उद्देश्य से धरती पर मानव रूप में जन्म लेने को कहते हैं और उसके बाद मानव के कर्म उसे जीवन चक्र में उलझा देते हैं. जीवन चक्र में उलझा व्यक्ति मोक्ष की चाहत करता है, क्योंकि वह परमात्मा का अंश है और उसे अपनी पूर्णता यानी परमात्मा से मिलने के लिए जीवन चक्र से मुक्ति चाहिए होती है. जीवन चक्र से मुक्ति ही मोक्ष है. प्रयागराज में लगने वाले महाकुंभ मेले में स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता हिंदू धर्म में है, इसी वजह से महाकुंभ मेले का महत्व काफी बड़ा है.

मोक्ष की ओर लेकर जाने का सहज साधन है महाकुंभ मेले का स्नान

जीवन चक्र से मुक्ति, एक व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर मिलती है. मनुष्य रूप में अगर व्यक्ति अच्छे कर्म करेगा तो वह मोक्ष की ओर अग्रसर होगा, अन्यथा उसे मृत्यु के बाद फिर एक जन्म लेकर जीवन के कष्ट भोगने पड़ेंगे. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार महाकुंभ मेले में स्नान से बड़ा पुण्य मिलता है और मनुष्य के बुरे कर्म धुल जाते हैं, यही वजह है कि मोक्ष की चाहत में तड़पती आत्मा कुंभ की ओर अग्रसर होती है. 

प्रयागराज में ऐसा क्या है कि धुल जाते हैं पाप

prayagraj snan
प्रयागराज में स्नान

प्रयागराज यानी उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी. इस नगरी का जिक्र हमें पौराणिक कथाओं में भी मिल जाता है. प्रयागराज में तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है, जिसे त्रिवेणी कहा जाता है. तीन नदियों के संगम को स्वर्ग का द्वार कहा जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्रमंथन के दौरान जब अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों के बीच युद्ध छिड़ा तो भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप लेकर असुरों को अमृत से वंचित किया, लेकिन जब असुरों को सच्चाई पता चल गई तो भयंकर युद्ध शुरू हो गया, तब भगवान विष्णु ने इंद्र देव के बेटे जयंत को अमृत कलश दे दिया और वह कौवे का रूप लेकर अमृत कलश लेकर उड़ गए. जब वे अमृत कलश लेकर उड़ रहे थे तो कलश से अमृत की कुछ बूंदें प्रयागराज, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में गिर गई, इसी वजह से यहां की नदियों में स्नान से पाप धुल जाते हैं. इन चार स्थानों में मेला कब लगेगा इसका निर्धारण  सूर्य की स्थिति और उस समय बृहस्पति जिस राशि में रहता है उस आधार पर किया जाता है. प्रयागराज में हर 12 साल में महाकुंभ और हर 144 साल में पूर्णकुंभ लगता है. साल 2025 का महाकुंभ पूर्णकुंभ भी है.

महाकुंभ में क्या है शाही स्नान

महाकुंभ में शाही स्नान उस दिन आयोजित किए जाते हैं, जो दिन हिंदू धर्म के अनुसार काफी पवित्र माना जाता है. उस दिन महाकुंभ में शाही स्नान होता है. शाही स्नान का अर्थ होता है, नदी में पहले डुबकी वो लोग लगाएंगे जो संत हैं और सांसारिक मोहमाया से ऊपर हैं. शाही स्नान का समय ज्योतिषीय गणना के अनुसार तय किया जाता है. हर साधु समाज और अखाड़े के लिए उनके महत्व के आधार पर स्नान का समय निर्धारित है. नागा साधु जो हिमालय से आते हैं वे सबसे पहले स्नान करते हैं. उस वक्त मंत्रोच्चारण होता है, शंख ध्वनि बजती है और धूप-दीप से वातावरण आध्यात्मिक और भक्तिमय हो जाते हैं, मानों आत्मा का परमात्मा से मिलन यहीं हो रहा हो. इस वर्ष शाही स्नान की तिथि इस प्रकार है-

  • पौष पूर्णिमा 13 जनवरी(महाकुंभ प्रारंभ,पहला शाही स्नान)
  • मकर संक्रांति 14 जनवरी( दूसरा शाही स्नान)
  • मौनी अमावस्या 29 जनवरी (तीसरा शाही स्नान)
  • वसंत पंचमी तीन फरवरी (चौथा शाही स्नान)
  • माघी पूर्णिमा 12 फरवरी(पांचवां शाही स्नान)
  • महाशिवरात्रि 26 फरवरी (छठा शाही स्नान, महाकुंभ का समापन)

पवित्र पुरुष हैं नागा साधु, जिन्हें महाकुंभ में सर्वप्रथम डुबकी लगाने का है अधिकार

Naga Sadhus in Maha Kumbh Mela
महा कुंभ मेले में नागा साधु

नागा साधु हिमालय और जंगलों में रहते हैं. वे सांसारिक मोहमाया को त्याग चुके होते हैं. उनके शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं होता है और महादेव शंकर के ये भक्त अपने शरीर पर सिर्फ राख लगाए रहते हैं, कोई वस्त्र इनके शरीर पर नहीं होता, लेकिन मौसम का कोई असर भी इनपर होता नहीं दिखता है. लंबे बाल और जटाओं के साथ ये सबसे पहले हर-हर गंगे के जयघोष के साथ नदी में डुबकी लगाते हैं. उसके बाद अन्य साधुओं को डुबकी लगाने का मौका मिलता है, उसके बाद आम आदमी मोक्ष के लिए स्नान करता है.

महाकुंभ का विदेश तक है आकर्षण

महाकुंभ के दौरान कल्पवास किया जाता है. कल्पवास माघ माह के दौरान संगम के किनारे रहने और तप करने को कहा जाता है. कल्पवास के लिए विदेशों से भी लोग आते हैं. इस बार एपल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन पॉवेल जॉब्स भी कल्पवास के लिए संगम के किनारे दो सप्ताह तक रहेंगी. वे निरंजनी अखाड़े के शिविर में रहेंगी. कल्पवास न्यूनतम एक दिन का होता है, जब श्रद्धालु को एक रात वहां रहकर तप करना पड़ता है. कल्पवास के दौरान वहां रहने वाले व्यक्ति को तीन बार स्नान करना होता है और कई नियमों का पालन करना पड़ता है, जिसमें अहिंसा, दयालुता,ब्रह्मचर्य, सच बोलना और पूजा पाठ जैसे नियम शामिल हैं. महाकुंभ के प्रति विदेशियों का आकर्षण काफी पुराना है और वे हजारों की संख्या में यहां आते हैं, कुछ कल्पवास में भी रहते हैं.

इसे भी पढ़ें : मां और शादी की ड्रेस खोकर बिलख उठी महिला, क्यों 5 गुना भयावह हुई लॉस एंजिल्स की आग?

History of Munda Tribes 5 : पड़हा राजा के हाथों में होती थी शासन की कमान, आम सहमति से होते थे सभी कार्य

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

सांस्कृतिक आयोजन

Ganga Arti
प्रयागराज में गंगा आरती

महाकुंभ के दौरान सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं, जिसमें सर्वप्रमुख है गंगा आरती. महाकुंभ के दौरान प्रतिदिन शाम को आध्यात्मिक वातावरण में गंगा आरती होती है. साथ ही नदी किनारे, रामायण और महाभारत का वाचन पंडित करते हैं. भारत के विभिन्न प्रदेशों के नृत्य –संगीत का आयोजन होता है और हाट–बाजार जो लगते हैं, उसमें भारतीय सभ्यता संस्कृति की अनूठी झलक मिलती है. 

इसे भी पढ़ें : History of Munda Tribes 10 : नागवंशी राजा फणिमुकुट राय को कब मिली थी शासन की बागडोर?

FAQ : महाकुंभ में कितने शाही स्नान होते हैं?

महाकुंभ में कुल छह शाही स्नान होते हैं. जो इस प्रकार हैं-
पौष पूर्णिमा 13 जनवरी(महाकुंभ प्रारंभ,पहला शाही स्नान)
मकर संक्रांति 14 जनवरी( दूसरा शाही स्नान)
मौनी अमावस्या 29 जनवरी (तीसरा शाही स्नान)
वसंत पंचमी तीन फरवरी (चौथा शाही स्नान)
माघी पूर्णिमा 12 फरवरी(पांचवां शाही स्नान)
महाशिवरात्रि 26 फरवरी (छठा शाही स्नान, महाकुंभ का समापन)

महाकुंभ और पूर्णकुंभ में क्या अंतर है?

महाकुंभ का आयोजन 12 वर्ष में और पूर्णकुंभ का आयोजन 144 वर्ष में होता है.

विज्ञापन
Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola