क्या भारत एक Dead Economy है या फिर तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था, जानिए ट्रंप के बयान में कितनी है सच्चाई
ट्रंप ने भारत को क्यों कहा 'डेड इकोनॉमी'
Indian economy : क्या भारत की अर्थव्यवस्था डेड है या फिर वह बढ़ती हुए अर्थव्यवस्था की लिस्ट में शामिल है? यह सवाल हर आम भारतीय के मन में चल रहा है क्योंकि 30 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर 25% लगाने की घोषणा की है और साथ ही कहा है कि वह भारत पर अतिरिक्त पेनाल्टी भी लगाएगा क्योंकि भारत, रूस से सैन्य उपकरण और पेट्रोलियम प्रोडक्ट खरीद रहे हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर यह लिखा है कि उन्हें परवाह नहीं है भारत और रूस अपनी मृत अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ नीचे ले जाते हैं.
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Indian economy: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वाराणसी दौरे के दौरान आज कहा कि भारत जल्दी ही विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर है और हम अपने देश के नागरिकों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे. वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के ‘डेड इकोनॉमी’ वाले बयान को विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सच करार दिया है और कहा है कि यह सच सभी जानते हैं, प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री के अलावा.
किसे कहते हैं ‘डेड इकोनॉमी’
डेड इकोनॉमी (Dead Economy) वैसी अर्थव्यवस्था को कहते हैं, जिसमें आर्थिक गतिविधियां ठप हो चुकी हैं या बहुत ही कमजोर पड़ चुकी हैं. जहां विकास बहुत धीमा हो चुका हो और वहां कोई उत्पादन ना होता है, साथ ही रोजगार की संभावना भी पूरी तरह खत्म हो चुकी हो. डेड इकोनॉमी में सभी उद्योग धंधे नष्ट हो जाते हैं और वहां कोई निवेश नहीं हो रहा होता है. मृत अर्थव्यवस्था वाले देश में मुद्रा का मूल्य गिरा होता है साथ ही कृषि क्षेत्र भी ध्वस्त हो चुका होता है.
ट्रंप ने भारत को क्यों कहा ‘डेड इकोनॉमी’
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को ‘डेड इकोनॉमी’अपने चिड़चिड़ेपन में कहा है. उनके कहने का अर्थ यह नहीं है कि भारत की इकोनॉमी ध्वस्त हो रही है. उनके शब्दों में छिपे खीज को समझने की जरूरत है. ट्रंप की खीज इस वजह से है क्योंकि अमेरिका के लाख कहने पर भी भारत रूस से हथियार और पेट्रोलियम खरीदना बंद नहीं कर रहा है, इससे अमेरिका को नाराजगी है. अमेरिका का कहना है कि भारत, रूस से जो हथियार और पेट्रोलिम खरीदता है उससे मिलने वाले पैसे का उपयोग रूस, यूक्रेन के साथ युद्ध में करता है. अमेरिका इस युद्ध को रोकना चाहता है और वह यूक्रेन के साथ खड़ा है.
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दूसरी वजह यह है कि अमेरिका का यह कहना है कि भारत उससे कम व्यापार करता है, जिसे बढ़ाने की जरूरत है. खासकर डेयरी क्षेत्र और कृषि क्षेत्र में. भारत अपने किसानों और दुग्ध उत्पादकों की सुरक्षा के लिए अमेरिका से कृषि और डेयरी उत्पाद कम खरीदता है. वहीं इन उत्पादों को ना खरीदने के पीछे भारत के धार्मिक कारण भी हैं. बस इसी वजह से अमेरिका भारत पर भड़का हुआ है और उसे डेड इकोनॉमी बता रहा है. वह यह चाहता है कि भारत उसके लिए अपने बाजार खोल दे, जो हो नहीं पा रहा है.
भारतीय टैरिफ और टैरिफ बैरियर अमेरिका की नाराजगी की वजह
अमेरिका का कहना है कि भारत, अमेरिका से आयातित सामानों पर बहुत अधिक टैरिफ लगाता है, साथ ही यहां कई टैरिफ बैरियर भी हैं. जैसे कस्टम ड्यूटी और सरकार द्वारा किसानों को दिया जाने वाला एमएसपी. अमेरिका का कहना है कि इससे वैश्विक व्यापार को नुकसान पहुंचता है. MSP के कारण भारत जबअधिक उत्पादन करता है और सरकारी खरीद के बाद बचे हुए अनाज को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचता है, तब भारत की सब्सिडी वाली फसलें वैश्विक बाज़ार में सस्ती हो जाती हैं, इससे अन्य देशों के किसानों को नुकसान होता है, जो बिना सब्सिडी के प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं. कहने का आशय यह है कि भारत की MSP आधारित प्रणाली अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक कृषि कीमतों को गिरा देती है, तब अमेरिकी किसान अपनी उपज नहीं बेच पाते या घाटे में बेचते हैं. इसे ट्रेड डिस्टारटिंग कहा जाता है वो विश्व व्यापार संगठन के अनुसार गलत है. लेकिन भारत सरकार यह कहती है कि हम एक विकासशील देश हैं, इसलिए हमें अपने किसानों और मजदूरों का हक पहले देखना होगा.
क्या कहते हैं अर्थशास्त्री और आंकड़े
अर्थशास्त्रियों और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘कमजोर’ या ‘dead economy’ कहना पूरी तरह गलत और भ्रामक है. भारत इस वक्त दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और इसे इस रूप में मान्यता भी दी गई है. IMF का कहना है कि भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है, जो मजबूत घरेलू मांग, डिजिटल नवाचार और विनिर्माण सुधारों द्वारा संचालित है. जबकि विश्व बैंक के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था लचीली है, जो एक बढ़ते मध्यम वर्ग से प्रेरित है, बुनियादी ढांचे में वृद्धि और मजबूत सेवाओं के निर्यात में वृद्धि हुई है. प्रधानमंत्री ने भारत को तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर बताया है जो प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में है, जो सच है. भारत में लोगों के आय में काफी वृद्धि हुई है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने हैं, जिनमें रोजगार सृजन, ग्रामीण आय में धीमापन प्रमुख है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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