रविवार दोपहर दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के पास स्थित सत्य निकेतन में एक पांच मंजिला इमारत ढह गयी. उसमें लड़कों का पेइंग गेस्ट आवास चल रहा था. इस दुर्घटना में सात लोगों की मौत हो चुकी है और करीब एक दर्जन लोगों को मलबे से निकाला गया है. इमारत चार से पांच दशक पुरानी थी. खबरों के अनुसार, ढहने के समय इमारत की बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था. मालिक, उसकी पत्नी और उसके बेटे को गिरफ्तार कर लिया गया है. दक्षिणी क्षेत्र के पांच एमसीडी अधिकारी भी निलंबित किये गये हैं. उच्च न्यायालय ने नगर निगम और विश्वविद्यालय से कहा है कि वे जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. न्यायालय ने निगम के अधिकार क्षेत्र में आने वाले हर पीजी और हॉस्टल का एक सप्ताह के भीतर ऑडिट कराने का आदेश दिया है. यह सब स्वागत योग्य है. पर इनमें से कुछ भी नया नहीं है. शुरुआत इमारत से करते हैं. उसकी उम्र अपने आप में कुछ नहीं समझाती. पुरानी इमारतें दशकों तक खड़ी रहती हैं, बशर्ते उनका रखरखाव होता रहे और उन्हें छेड़ा न जाये. गणित तब बदलता है, जब उन हिस्सों से छेड़छाड़ की जाती है, जो भार उठाते हैं- नींव, कॉलम, भार वहन करने वाली दीवारें और उनके आसपास की मिट्टी. दिल्ली सरकार की ओर से दिये गये प्रारंभिक आकलन के अनुसार, बेसमेंट में हुई खुदाई से एक पिलर खिसक गया, जिसके बाद ढांचा गिर पड़ा. यह क्रम संभव लगता है. पुरानी फुटिंग के करीब की गयी खुदाई उस मिट्टी को हटा देती है, जो चुपचाप सहारा दे रही थी. जिस भार को नींव को धरती में फैलाना था, वह अब उस रास्ते नहीं जाता जिसके लिए उसे बनाया गया था. जिस कॉलम का आधार खिसक जाये, वह झुक सकता है, चटक सकता है या मुड़कर बैठ सकता है, और उसका उठाया हुआ भार उन कॉलमों पर चला जाता है, जिन्हें उतने भार के लिए कभी बनाया ही नहीं गया था. कई दिनों की भारी बारिश और बेसमेंट में भरे पानी ने मिट्टी को और कमजोर किया होगा. इसमें कोई असाधारण अभियांत्रिकी नहीं है. इसी कारण ऐसे काम के लिए नक्शे, अनुमतियां और निगरानी आवश्यक होते हैं. प्रश्न है कि खुदाई हो ही क्यों रही थी? तो यह कोई रहस्य नहीं है. दिल्ली विश्वविद्यालय में ढाई लाख से अधिक छात्र हैं और हॉस्टल की सीटें करीब नौ हजार. वर्ष 2022 से दाखिला एक साझा राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा के जरिये हो रहा है, जिसने विश्वविद्यालय के दरवाजे देशभर के छोटे शहरों और अलग-अलग बोर्डों के छात्रों के लिए खोल दिये. अब उसके आधे से अधिक छात्र दिल्ली के बाहर से आते हैं. दाखिले की नीति बदल गयी, पर आवास की नीति नहीं बदली. यही अंतर एक बाजार बन गया. समाचार की मानें, तो सत्य निकेतन में एक बिस्तर का किराया करीब बारह हजार रुपये महीना था. छात्रों को तीन चीजें चाहिए- सस्ता किराया, कॉलेज से नजदीकी और आने-जाने का साधन. मालिकों को मुनाफा चाहिए. जहां ये दोनों किसी नियामक की मौजूदगी के बिना मिलते हैं, वहां इमारतें उस सीमा से आगे धकेल दी जाती हैं, जिसके लिए उन्हें बनाया गया था. फिर जवाबदेही का वह ढर्रा है, जहां लाशें निकलने के बाद मालिक गिरफ्तार होते हैं. अधिकारी निलंबित होते हैं, और निलंबन चुपचाप खत्म हो जाते हैं. बदला हुआ बेसमेंट, जोड़ी गयी पांचवीं मंजिल, पचास नौजवानों के हॉस्टल में तब्दील हो चुका पारिवारिक मकान- ये अदृश्य चीजें नहीं हैं. जिस किसी का कानूनी कर्तव्य इसे देखना था, उसने या तो देखा नहीं, या देखकर जाने दिया. जब तक इस प्रश्न के साथ कोई नाम नहीं जुड़ता, अनधिकृत निर्माण लाभ का सौदा बना रहेगा, क्योंकि जोखिम पूरी तरह उन लोगों के हिस्से आता है, जो अंदर सो रहे होते हैं. दूसरी व्यवस्थाएं इसे अलग ढंग से संभालती हैं, इसलिए नहीं कि वहां के अधिकारी अधिक नेक हैं, बल्कि अनुमतियां निर्माण के तय चरणों पर होने वाले निरीक्षणों से बंधी होती हैं. ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट तय करता है कि भवन का कानूनी उपयोग क्या हो सकता है. रिकॉर्ड सार्वजनिक होते हैं, शिकायतें दर्ज होती हैं और उन पर समय अंकित होता है. इस तरह स्वीकृति देने वाला अधिकारी बरसों बाद भी पहचाना जा सकता है. दिल्ली भी यही कर सकती है. हर शिकायत दर्ज हो, हर निरीक्षण की तारीख हो, हर निर्णय पर उस अधिकारी का नाम दर्ज हो, जिसने वह निर्णय लिया. असुरक्षित पीजी बंद कर देना पूरा जवाब नहीं हो सकता. विश्वविद्यालय और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को आज की मांग का आकलन करके सस्ते छात्र आवास का विस्तार उस पैमाने पर करना चाहिए, जो दाखिलों से मेल खाता हो. दिल्ली सरकार और नगर निगम को निजी पीजी के लिए एक वास्तविक नियामक व्यवस्था खड़ी करनी चाहिए, जिसमें पंजीकरण, ढांचागत और अग्नि सुरक्षा प्रमाणन, रहने वालों की अधिकतम संख्या और समय-समय पर निरीक्षण शामिल हों. साथ ही, एक ऑनलाइन सूची हो, जो छात्रों और अभिभावकों को बताये कि किस परिसर को मंजूरी मिली है. तय सुरक्षा और किराया मानकों के भीतर, विशेष रूप से छात्रों के लिए बनाये गये निजी आवास की भी जरूरत पड़ेगी. जब राष्ट्रीय नीति देशभर के नौजवानों को एक शहर में लाती है, तो वे सुरक्षित रूप से कहां रहेंगे, यह तय करना नगर निगम के भरोसे छोड़ी जाने वाली बात नहीं है. यह शिक्षा नीति का हिस्सा है, और इसे उस दिन से बहुत पहले तय हो जाना चाहिए था, जब मलबे को यह दलील देनी पड़े. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)