जानलेवा होता शोर
Updated at : 29 Apr 2019 6:45 AM (IST)
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दो साल पहले दुनिया के 50 महानगरों के एक अध्ययन में पाया गया था कि दिल्ली में सबसे अधिक शोर का प्रदूषण है. इस शोध में यह भी बताया गया था कि शहरों में बढ़ते शोर का संबंध बहरेपन के 64 फीसदी मामलों से है. लेकिन शहरीकरण की तेज गति के कारण यह समस्या जानलेवा […]
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दो साल पहले दुनिया के 50 महानगरों के एक अध्ययन में पाया गया था कि दिल्ली में सबसे अधिक शोर का प्रदूषण है. इस शोध में यह भी बताया गया था कि शहरों में बढ़ते शोर का संबंध बहरेपन के 64 फीसदी मामलों से है.
लेकिन शहरीकरण की तेज गति के कारण यह समस्या जानलेवा भी होती जा रही है. संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि 2050 तक दो-तिहाई आबादी शहरों की वासी होगी. भारत में तब करीब 42 करोड़, चीन में 25.5 करोड़ और नाइजीरिया में 19 करोड़ अधिक लोग शहरी लोगों की आज की तादाद में जुड़ जायेंगे. हालिया अध्ययनों की मानें, तो शहरों में उच्च रक्तचाप, हृदयाघात और मधुमेह की बीमारियों का एक बड़ा कारण शोर है. यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी के मुताबिक उस महादेश में लगभग 10 हजार असमय मौतों इस वजह से होती हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में बीमारों की संख्या भी बढ़ रही है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन का आकलन है कि पश्चिमी यूरोपीय देशों में कम-से-कम दस लाख स्वस्थ जीवन-वर्ष शोर-शराबे की भेंट चढ़ जाते हैं. इस संस्था ने 2011 की एक रिपोर्ट में रेखांकित किया था कि बहरेपन और अन्य बीमारियों के अलावा सोने में दिक्कत और चिड़चिड़ापन भी शोर के चलते बढ़ रहे हैं. भारत में भी नगरीकरण और विकास का सिलसिला तेजी से आगे बढ़ रहा है. हमारे देश में शोर के खतरनाक असर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन 2007 में भी एक अध्ययन जारी कर चुका है. वैसे तो उसके बाद कुछ और रिपोर्ट आयीं और अदालती आदेश भी दिये गये, लेकिन सरकार, मीडिया और समाज के स्तर पर जरूरी सक्रियता नहीं दिखायी गयी है.
इस महीने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया है कि वह शोर पर निगरानी के अपने इंतजाम को सात शहरों के दायरे से निकाले और अन्य शहरों का भी जायजा ले. ट्रिब्यूनल ने बोर्ड को पूरे देश का एक शोर प्रदूषण नक्शा बनाने को कहा है ताकि इस मुश्किल का आकलन ठीक से हो सके. इसके लिए 15 जून की तारीख तय की गयी है. फिलहाल दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु और लखनऊ में शोर के स्तर को नियमित रूप से परखा जाता है.
इस काम में राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को भी लगाया गया है. उम्मीद है कि ट्रिब्यूनल के निर्देश के अनुरूप सरकारें पुलिस और बोर्ड को जरूरी यंत्र एवं संसाधन उपलब्ध कराने के लिए तत्पर होंगी.
यह भी उल्लेखनीय है कि यह निर्देश किसी अन्य मामले की सुनवाई के दौरान एक अखबार की रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लेते हुए ट्रिब्यूनल ने दिया है. इसका मतलब यह है कि सरकारी और सामाजिक संस्थाएं शोर की समस्या के प्रति अभी भी कम गंभीर हैं. वायु और जल प्रदूषण के साथ कचरे के निबटारे की मुश्किलों से जूझते शहरों के लिए शोर बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है. इससे पहले कि देर हो, शहरी जीवन को रहने लायक बनाने के लिए इस पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है.
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