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  • May 18 2018 4:53AM

दानापुर-दिघवारा प्रस्तावित पुल सारण को बनायेगा मिनी ‘नोएडा’

दानापुर-दिघवारा प्रस्तावित पुल सारण को बनायेगा मिनी ‘नोएडा’
II सुरेंद्र किशोर II
राजनीतिक विश्लेषक
 
पटना के पास गंगा नदी पर एक और पुल के निर्माण की योजना है. उस पर शुरुआती प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है. इस पुल के बन कर तैयार हो जाने के बाद आर्थिक रूप से पिछड़े जिले सारण के विकास की प्रक्रिया तेज हो जाने की संभावना है. वैसे भी जेपी सेतु के चालू हो जाने के बाद सारण के एक बड़े इलाके में बिल्डर्स और डेवलपर्स सक्रिय हो चुके हैं.
 
दानापुर-दिघवारा प्रस्तावित पुल के बन जाने के बाद उन इलाकों में कृषि उद्योग की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं. सारण मुख्यत: एक कृषि प्रधान जिला है. पर वहां आबादी अधिक व खेती का रकबा कम है. नतीजतन बड़ी संख्या में लोग राज्य के बाहर जाकर नौकरी करते हैं या छोटा-मोटा रोजगार. 1972 से पहले अविभाजित सारण जिले को मनीआर्डर इकोनाॅमी का जिला कहा जाता था. कमोवेश अब भी यही स्थिति है.
 
पटना से करीब होने के बावजूद सारण का समुचित विकास नहीं हो सका है. पर अब स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. हाल के वर्षों में सड़क-बिजली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. पटना और हाजीपुर के बीच के गांधी सेतु के 1982 में चालू हो जाने के बाद वैशाली जिले का विकास तो हुआ, पर सारण के विकास की प्रक्रिया जेपी सेतु ही तेज कर सका. 
 
अब नये प्रस्तावित पुल से दानापुर दियारे का भी विकास तेज हो सकता है. यदि वह पुल दियारे से होकर गुजरे और दियारे के लोगों को भी पुल तक पहुंचने का आसान मौका मिले. जानकार सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित पुल को लेकर अभी दो  वैकल्पिक संरेखनों यानी एलाइनमेंट पर विचार किया जा रहा है. 
 
पुल को सगुना मोड़ से शुरू करके उसे गंगा के उस पार सोनपुर-छपरा एनएच से मिला दिया जाये. या फिर दानापुर से ही शुरू करके दियारा होते हुए उस पार दिघवारा से मिला दिया जाये. दूसरे विकल्प से सारण के अपेक्षाकृत अधिक इलाकों को लाभ पहुंच सकेगा. 
 
अधिक लाभ यानी अपेक्षाकृत सारण के अधिक भूभाग का विकास. सोनपुर से दिघवारा तक गंगा के किनारे दिल्ली के यमुना पार वाली स्थिति बन सकती है. जाहिर है कि ऐसे विकास में गैर सरकारी एजेंसियां भी भूमिका निभाती हैं. 
 
सारण के विकास होने पर पटना पर से आबादी का बोझ घटेगा. इससे प्रादेशिक राजधानी पर प्रदूषण व भू-जल संकट की मार भी कम होगी. साथ ही पटना और  उत्तर बिहार के बीच आना-जाना और सुगम हो जायेगा. अब देखना है कि इस प्रस्तावित पुल का निर्माण कार्य कब शुरू होता है.    
 
कितनी महंगी हो गयी राजनीति! : कर्नाटक से एक यह खबर आयी कि प्रत्येक विधायक को खरीदने के लिए इस बार 100 करोड़ रुपये का आॅफर दिया गया. पता नहीं, यह आरोप सही है या गलत! पर एक बात तो  पक्की है कि आज की राजनीति बहुत  महंगी हो चुकी है.
 
अपवादों को छोड़ दें तो आम लोग तो चुनाव लड़ ही नहीं सकते. 2013 में एक सांसद ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्हें  2009 के अपने चुनाव क्षेत्र में 8 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े थे. नब्बे के दशक में यह खबर आयी थी कि कुछ सांसदों को 50-50 लाख रुपये देकर ‘प्रभावित’ किया गया था. इतने रुपये उनके बैंक खातों में पाये भी गये थे. ऐसा एक दिन में नहीं हुआ है. 
 
राजनीति व शासन में बढ़ते भ्रष्टाचार के साथ साथ धीरे-धीरे चुनावी खर्च भी बढ़ता चला गया. जिस तबके ने यह खर्च बढ़ाया है, जिम्मेदारी उसी की है कि वह उसे कम करे. एक बार पूर्व केंद्रीय मंत्री एलपी शाही ने बताया था कि 1952 के विधानसभा चुनाव  में उनका  सिर्फ 11 हजार रुपये खर्च हुआ था. 
 
1972 में 30 हजार रुपये और 1980 में 35 हजार. पर 1991 में मुजफ्फरपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र में उनके 11 लाख रुपये खर्च हुए. 
कर्ज दबाने वालों के लिए बुरी खबर : 50 करोड़ रुपये से अधिक के सारे कर्जों का बैंकों ने फाॅरेंसिक आॅडिट कराना शुरू कर दिया है. 
 
यदि इस तरह के आॅडिट में  इस बात की आशंका दिखी कि कर्ज की वापसी की संभावना कम है तो वैसे मामलों को जांच एजेंसियों को सौंप दिया जायेगा. साथ ही 250 करोड़ रुपये से अधिक के कर्जों पर अलग से नजर रखी जा रही है. देखा जा रहा है कि कहीं कर्ज देने की नियम को तोड़ा तो नहीं गया है. 
 
यानी आने वाले दिनों में ऐसे कर्जखारों की नींद हराम हो सकती है, जिनका इरादा कर्ज वापस करने का कभी नहीं रहा. साथ ही ऐसे मामलों में वैसे वीवीआईपी भी बेनकाब हो सकते हैं जिन लोगों ने अपने प्रभाव का दुरुपयोग करके ऐसे लोगों को भारी कर्ज दिलवाये जिनकी कर्ज वापसी की क्षमता काफी कम है. 
 
एक भूली-बिसरी याद : जून 2011 में पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए मनमोहन सिंह सरकार को कुछ ठोस सुझाव दिये थे. इस सुझाव पर पीएम के सलाहकार सैम पित्रोदा और योजना आयोग के सलाहकार अरुण मायरा के साथ मोइली की बातचीत भी हुई थी. 
 
पर सवाल है कि इन सुझावों पर कितना कुछ हुआ? उन  सुझावों  का विवरण इस प्रकार है. 1-किसी भी सेवा निवृत्त नौकरशाह को नियामक‘रेगुलेटर’ न बनाया जाये. से पदों पर सिर्फ सेवारत अफसर ही तैनात हों. रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले पद के लालच में सेवारत अफसर भ्रष्टाचार में मदद करते हैं. 
 
2-जो अधिकारी  सरकार में अभी कार्यरत हैं, सिर्फ उन्हें ही रेगुलेटरी दायित्व दिये जाने चहिए. इसके लिए प्रशासनिक तंत्र को जिला, राज्य व केंद्र स्तर पर अपने अधिकारियों को प्रशिक्षित करना चाहिए. सेवारत अधिकारियों व जजों को रेगुलेटर बनाने से उन्हें सफलता-असफलता या सही गलत काम के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा. 
 
3-ऐसा कानून बने जिससे सरकार के खिलाफ झूठे आरोप लगाने वाले किसी व्यक्ति या स्वयंसेवी संगठनों को भी दंडित किया जा सके. 4-पूरे देश में जहां भी माइनिंग हो रही है या खानें लीज पर हैं, उन सारे मामलों की विस्तार से जांच हो और उनकी लीज को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाये. 
 
ऐसा देखा जा रहा है कि माइनिंग कराने वाले स्थानीय स्तर पर अनेक किस्म के भ्रष्टाचार को जन्म और प्रश्रय दे रहे हैं. 5 - सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर कोई सेवा विस्तार दिया जाये, ताकि वे ज्यादा जिम्मेदारी से कार्य कर सकें और इसके लिए नौकरी से संबंधित कानूनों में आवश्यक संशोधन किये जाएं.
 
6.-लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं  को सक्रिय किया जाये. 7-जिन लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गयी हो, उन्हें सरकारी पदों पर नियुक्त न किया जाये और यही नियम चुनाव के समय राजनीतिक उम्मीदवारों के मामले में भी लागू किया जाये. 
 
मतदान का प्रतिशत बढ़ने का लाभ : कर्नाटक मेें इस बार 72 दशमलव 36 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है. वहां 2013 के विधानसभा चुनाव में 71 दशमलव 45 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया था. 2015 में हुए बिहार विधानसभा  चुनाव में 56 दशमलव 8 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया था. 
 
उससे पहले 2010 में 52 दशमलव 7 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले थे. जानकार लोग बताते हैं कि यदि देश में हर राज्य में कम से कम 80-85 प्रतिशत मतदातागण मतदान केंद्रों पर पहुंचने लगें तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक का महत्व व दबाव घट जायेगा. 
और अंत में : उत्तर प्रदेश के पिछड़ा कल्याण मंत्री ओम प्रकाश भर के अनुसार ‘भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मुझे आश्वासन दिया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक छह माह पहले 27 प्रतिशत पिछड़ा आरक्षण को तीन हिस्सों में बांट दिया जायेगा.’
 

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