जंतर-मंतर का अदृश्य बजट, आखिर चलता कैसे रहा इतना बड़ा आंदोलन?

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जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्र ( स्रोत- सोशल मीडिया )

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जंतर-मंतर पर चला हजारों युवाओं का आंदोलन सिर्फ नारों का नहीं, बल्कि एक अनूठी 'इकोनॉमी' का भी था. हजारों लोगों के भोजन, पानी, चिकित्सा और अन्य व्यवस्थाओं का खर्च कैसे चला, यह एक बड़ा सवाल था. जानिए इस आंदोलन की आर्थिक शक्ति के पीछे के अदृश्य हाथ.

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नयी दिल्ली से संदीप सावर्ण की रिपोर्ट

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जंतर-मंतर पर हजारों युवाओं का आंदोलन जितना चर्चा में रहा, उतनी ही दिलचस्प इसकी “इकोनॉमी” भी रही. आखिर रोज हजारों लोगों के भोजन, पानी, प्राथमिक चिकित्सा, पोस्टर, साउंड सिस्टम और अन्य व्यवस्थाओं का खर्च कैसे चलता था? आंदोलन में शामिल अधिकांश छात्रों के पास इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं था. उनका कहना था कि “मदद अपने आप आती रही.”

गाड़ी से उतारकर रख जाते हैं लोग पानी की बोतलें

धरनास्थल पर दिनभर पानी की बोतलें लगातार पहुंचती रहीं. कोई कार से उतारकर बोतलें रख जाता, तो कोई युवाओं के बीच घूम-घूमकर पानी बांटता. कई बार भोजन के पैकेट भी बड़ी संख्या में पहुंचते, लेकिन उन्हें भेजने वाला कौन है, इसकी जानकारी न आयोजकों को होती थी और न ही प्रदर्शनकारियों को. छात्रों का कहना था कि समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग बिना नाम बताए सहयोग कर रहे थे.

प्रदर्शनकारी ने बताया रेलवे स्टेशन पहुंचने के लिए नहीं थे पैसे

प्रभात खबर के साथ बातचीत करते हुए राजस्थान के अलवर जिले से आए लक्की ने कहा कि वे अनपढ़ हैं. लेकिन जब उन्होंने सोशल मीडिया पर इस आंदोलन के बारे में जाना तो किसी तरह ट्रेन से दिल्ली पहुंच गए. रेलवे स्टेशन पहुँचने पर जंतर मंतर तक पहुंचने के लिए भी पैसे नहीं थे, लोगों से लिफ्ट मांगते हुए धरना स्थल तक पहुंचे और 25 दिनों से यहाँ डटे रहे. कहा कि दिन भर वे प्रदर्शन करते, भूख लगती तो कोई ना कोई जरूर खाना देकर चला जाता और रात में नींद आने पर सड़क पर ही सो जाते.

गुरुद्वारे के लंगर में करते थे भोजन

आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी पास स्थित बंगला साहिब गुरुद्वारे के लंगर में भोजन करने भी पहुंचते थे. कई छात्र बताते हैं कि जब धरनास्थल पर भोजन की व्यवस्था कम पड़ जाती, तब गुरुद्वारे का लंगर उनके लिए सबसे बड़ा सहारा बनता था. कई सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवकों ने भी समय-समय पर भोजन और जरूरी सामान उपलब्ध कराया.

कुछ युवाओं ने संभाली ने सफाई की जिम्मेदारी

धरनास्थल पर स्वयंसेवकों की टीमें भी सक्रिय थीं. कोई प्राथमिक चिकित्सा में मदद कर रहा था, कोई भीड़ को व्यवस्थित कर रहा था, तो कुछ युवा सफाई की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. पोस्टर बनाने, मंच की व्यवस्था, साउंड सिस्टम और सोशल मीडिया संचालन का काम भी अलग-अलग स्वयंसेवकों ने संभाला.

बिना पहचान या प्रचार की लोग करते थे मदद

लक्की ने कहा कि इस आंदोलन ने यह भी दिखाया कि किसी बड़े जनआंदोलन की ताकत केवल मंच या नारों में नहीं होती, बल्कि उन अनगिनत अनजान हाथों में भी होती है, जो बिना किसी पहचान या प्रचार की इच्छा के चुपचाप पानी की एक बोतल, भोजन का एक पैकेट या मदद का एक छोटा-सा हाथ बढ़ा देते हैं. यही अदृश्य सहयोग जंतर-मंतर के इस आंदोलन की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनकर उभरा.

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