Marital Rape : पति द्वारा की गई जबरदस्ती को क्यों नहीं कहा जाता रेप? जानिए, पति-पत्नी के संबंध पर क्या कहता है कानून
सुप्रीम कोर्ट, Photo- ANI
संविधान ने भारतीय महिलाओं के साथ भले ही कोई भेदभाव नहीं किया है, लेकिन कई बार कई ऐसे मुद्दे सामने आते हैं जब समानता के अधिकार पर बहस छिड़ जाती है. भारतीय कानूनों में कई बार इसी वजह से कई बड़े बदलाव भी हुए हैं. खासकर महिलाओं के यौन शोषण और उनकी सामाजिक स्थिति को दुरुस्त करने के लिए संपत्ति के अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर.
इसी क्रम में एक बड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. यह मामला है मैरिटल रेप यानी वैवाहिक बलात्कार का. अगर मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाया गया, तो यह भारतीय महिलाओं के अधिकारों में ऐतिहासिक वृद्धि होगी और बेशक इसका असर उनकी सामाजिक स्थिति पर भी पड़ेगा. लेकिन यह मसला इतना सरल नहीं है, यही वजह है अबतक यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है. केंद्र सरकार का भी इस मसले पर यह कहना है कि अगर मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाया गया तो परिवार नामक संस्था पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं, क्योंकि इस कानून का दुरुपयोग हो सकता है. आइए समझते क्या है पूरी बात.
BNS की धारा 63 में रेप की परिभाषा
भारतीय कानून के अनुसार किसी महिला की मर्जी के बिना उसके साथ शारीरिक संबंध बनाना, कानून के हिसाब से अपराध है. भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 में रेप (बलात्कार) की परिभाषा और उसके बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है.
कानून के बारे में विस्तार से बताते हुए झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा बताते हैं कि बीएनएस की धारा 63 में रेप की परिभाषा का वर्णन है. जिसके अनुसार किसी महिला की इच्छा के खिलाफ; उसकी सहमति के बिना; डरा-धमकाकर ली गई सहमति से, सहमति इसलिए कि महिला को ऐसा लगता है कि संबंधित व्यक्ति भविष्य में उसका पति बन सकता है, मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के दौरान दी गई सहमति, नशे की हालात में दी गई सहमति, महिला की उम्र 18 साल से कम हो तो ऐसे शारीरिक संबंध को रेप माना जाता है.

मैरिटल रेप जैसा शब्द कानून में वर्णित नहीं
अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा बताते हैं कि बीएनएस में मैरिटल रेप जैसे शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है. दो व्यक्ति वैवाहिक संबंध में हैं तो यह एक नैसर्गिक सत्य है कि उनके बीच शारीरिक संबंध बनते हैं. पति-पत्नी के बीच अगर शारीरिक संबंध बिना सहमति के बनाए जाते हैं, तो उसके लिए BNS की धारा 63 में Exception 2 है.
इसमें कहा गया है कि-“A sexual act or sexual intercourse by a man with his own wife, the wife not being under eighteen years of age, is not rape. यहां गौर करने वाली बात यह है कि यहां sexual intercourse शब्द का प्रयोग हुआ है ना कि रेप का.
पति-पत्नी के बीच बन रहे शारीरिक संबंध को कानून रेप नहीं मानता और उसके लिए sexual intercourse का प्रयोग किया गया है.अगर सुप्रीम कोर्ट इसे रेप के दायरे में लाता है, तो फिर इसके लिए सरकार को अध्यादेश लाना होगा, राष्ट्रपति की मंजूरी लगेगी और चूंकि बीएनएस 2024 से ही लागू हुआ है, इसलिए इतनी जल्दी इसमें बदलाव अलग संदेश भी दे सकता है.
पति-पत्नी के संबंधों के लिए BNS की धारा 67 में भी कुछ प्रावधान है, संभवत: इस धारा के तहत सुप्रीम कोर्ट कुछ विचार कर सकता है. BNS की धारा 67 के अनुसार अगर पति-पत्नी अलग रह रहे हैं—चाहे अदालत के separation decree के तहत या किसी अन्य कारण से और पति, पत्नी की सहमति के बिना उसके साथ यौन संबंध बनाता है, तो यह अलग अपराध है. इसकी सजा कम से कम 2 साल और अधिकतम 7 साल की जेल तथा जुर्माना है. BNS की धारा 68 के तहत अधीनस्थ कर्मचारी के साथ संबंध को भी sexual intercourse की श्रेणी में रखा गया है और शादी का प्रलोभन देकर बनाया गया संबंध भी इसी श्रेणी में आता है.
मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने की क्यों हो रही है मांग?
मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने की मांग करने वालों का कहना है कि शादी को महिला की स्थायी यौन सहमति (permanent consent) नहीं माना जाना चाहिए. याचिकाकर्ताओं और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि विवाह के बाद भी महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए उसकी सहमति का होना बहुत जरूरी है.
| पक्ष | मुख्य बिंदु (Key Points) |
| मुख्य मांग | विवाह को महिला की स्थायी यौन सहमति (Permanent Consent) न माना जाए. |
| सहमति का अधिकार | विवाह के बाद भी शारीरिक संबंध के लिए महिला की स्पष्ट सहमति आवश्यक है. |
| शारीरिक स्वायत्तता | महिला के शरीर पर उसका स्वयं का अधिकार है, जिसे विवाह समाप्त नहीं करता. |
| मौलिक अधिकार | यह मुद्दा महिला की गरिमा (Dignity), समानता (Equality) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) से जुड़ा है. |
| दोहरा मापदंड | वही कृत्य जो गैर-पति करे तो 'रेप' माना जाता है, पति होने पर कानूनी छूट क्यों मिले? |
एक महिला के शरीर पर उसका हक होता है और इस वजह से इस मसले को उसकी गरिमा,समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों से जोड़ा गया है. शादी हमेशा के लिए सेक्स का आधार नहीं हो सकता. यह भी तर्क दिया जाता है कि जिस कृत्य के लिए किसी व्यक्ति को रेप का दोषी माना जाता है उसी कृत्य के लिए उसके पति हो जाने पर उसे छूट क्यों दी जाती है.
मैरिटल रेप को अपराध बनाने का क्यों हो रहा है विरोध?
मैरिटल रेप को अपराध बनाने का विरोध इसलिए नहीं हो रहा है कि सरकार या कानून यह मानता है कि पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध सही है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि पति को पत्नी की सहमति के खिलाफ यौन संबंध बनाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है.
विवाद इस बात को लेकर है कि क्या ऐसे कृत्य को अलग से रेप मानकर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए या मौजूदा वैवाहिक/आपराधिक कानूनों के तहत इसपर कार्रवाई हो. केंद्र सरकार का मानना है कि मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना जाता है, अगर इस कृत्य को अपराध की श्रेणी में लाया जाएगा, तो उसके लिए अलग से कानून बनाना होगा, जो संसद का काम है.
सरकार यह भी मानती है कि मैरिटल रेप से हमारा समाज भी जुड़ा है, अगर यह कानून का रूप ले लेता है तो इसके दुरुपयोग की भी प्रबल आशंका है. अगर इस कानून का दुरुपयोग हुआ, तो विवाह नामक संस्था खतरे में आ सकती है, जिसका असर परिवार पर पड़ेगा. परिवार अगर टूटे तो समाज भी टूटेगा और यह खतरनाक हो सकता है.
भारतीय समाज दूसरे किसी भी देश के समाज से अलग है, यह कहना कि पश्चिमी देशों में मैरिटल रेप अपराध है, इसलिए हमारे देश में भी होना चाहिए, यह तर्कसंगत नहीं है. सरकार यह भी मानती है कि पति द्वारा किए जा रहे अन्याय से निपटने के लिए देश में कानून हैं, जिनके तहत इस तरह के मामलों की सुनवाई संभव है.
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