पतंगबाजी आजादी का प्रतीक: कभी ब्रिटिश हुकूमत से टकराई थी, आज तिरंगे के रंग में इतराती है पतंग
पतंगबाजी का नजारा, फोटो एक्स
स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती है, देश भर के आसमान का रंग बदलने लगता है. छतों, बालकोनियों और मैदानों से उठती पतंगें सिर्फ हवा से होड़ नहीं लगातीं, बल्कि आजादी और देशभक्ति के जश्न का प्रतीक बन जाती हैं. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई चरखी थामे आसमान में अपनी पतंग को सबसे ऊंचा लहराने की होड़ में शामिल हो जाता है.
पतंगबाजी सिर्फ एक खेल नहीं है, बल्कि इसका भारत के स्वतंत्रता संग्राम से गहरा ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है. साल 1928 में जब साइमन कमीशन का विरोध हो रहा था, तब आंदोलनकारियों ने संदेश फैलाने के लिए पतंगों का सहारा लिया था. 'साइमन गो बैक' (साइमन वापस जाओ) जैसे नारे पतंगों पर लिखकर हवा में उड़ाए जाते थे. पुलिस की पाबंदियों और तंग गलियों से ऊपर उठकर पतंगें दूर-दूर तक विरोध का संदेश पहुंचाती थीं. उस दौर में आसमान, भारतीयों के लिए प्रतिरोध दर्ज कराने का एक खुला मंच बन गया था.
पतंगबाजी: 1947 के बाद बदला स्वरूप, बनी जश्न-ए-आजादी का हिस्सा
1947 में मिली आजादी के बाद, पतंगबाजी का यह संदेश धीरे-धीरे उत्सव में बदल गया. अब यह खेल राष्ट्रीय एकता और आजादी की भावना का जीवंत प्रतीक है. बाजारों में तीन रंगों वाली पतंगें, देशभक्ति के संदेश, राष्ट्रीय नायकों की तस्वीरें और सामाजिक अभियानों से जुड़ी रंग-बिरंगी पतंगें पटी पड़ी हैं. दिल्ली टूरिज्ज्म से लेकर गुजरात के अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव तक, यह परंपरा भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.
छतों पर जुड़ता है परिवार, सजती हैं महफिलें
15 अगस्त के दिन घर की छतें किसी उत्सव स्थल से कम नजर नहीं आतीं. परिवार के सदस्य एक साथ जमा होते हैं, संगीत बजता है, स्वादिष्ट पकवान बनते हैं और 'काटो-काटो' के शोर के बीच पतंगें काटी जाती हैं. एक पतंग के कटते ही पूरी छत तालियों और ठहाकों से गूंज उठती है.
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लेखक के बारे में
By अरबिंद कुमार मिश्रा
अरबिंद कुमार मिश्रा मुख्यधारा की पत्रकारिता में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वर्तमान में, वह प्रभात खबर डॉट कॉम (Prabhat Khabar) में सीनियर कंटेंट राइटर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. अरबिंद नेशनल, इंटरनेशनल और स्पोर्ट्स कैटेगरी में अपनी लेखनी के लिए जाने जाते हैं. गहरी रिसर्च पर आधारित स्पेशल स्टोरीज, रिपोर्टिंग और जटिल मुद्दों पर आसान भाषा में 'एक्सप्लेनर' लिखना उनकी मुख्य यूएसपी (USP) है.
झारखंड की समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं में उनकी गहरी रुचि है. अपनी उत्कृष्ट और सरोकार से जुड़ी रिपोर्टिंग के लिए उन्हें संस्थान स्तर पर कई बार सम्मानित और पुरस्कृत भी किया जा चुका है.
करियर का सफरनामा
अरबिंद ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत देश की प्रतिष्ठित बहुभाषी न्यूज एजेंसी 'हिंदुस्थान समाचार' से बतौर रिपोर्टर की थी. इसके बाद उन्होंने प्रसार भारती के अंग दूरदर्शन और आकाशवाणी के साथ भी काम किया, जहां उन्होंने एंकरिंग, वॉइस-ओवर और रिपोर्टिंग के गुर सीखे. साल 2011 में वह 'प्रभात खबर डॉट कॉम' से जुड़े और तब से लगातार डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
प्रमुख उपलब्धियां और ग्राउंड रिपोर्टिंग
खेल पत्रकारिता और जमीनी रिपोर्टिंग में अरबिंद का योगदान उल्लेखनीय रहा है. उनकी कुछ सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल हैं:
34वें राष्ट्रीय खेल: झारखंड में आयोजित ऐतिहासिक 34वें नेशनल गेम्स की बेहतरीन और व्यापक ग्राउंड रिपोर्टिंग.
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट: रांची के जेएससीए (JSCA) स्टेडियम में आयोजित कई इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों को करीब से कवर किया.
पुरुष हॉकी वर्ल्ड कप (2018): भुवनेश्वर में आयोजित वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले की शानदार स्पोर्ट्स रिपोर्टिंग.
पंचायतनामा: प्रभात खबर के इस खास विंग के लिए ग्रामीण इलाकों का दौरा कर कई प्रेरक 'सक्सेस स्टोरीज' लिखीं.
शैक्षणिक योग्यता (Education & Credentials)
UGC NET: साल 2019 में यूजीसी नेट (UGC NET) की परीक्षा उत्तीर्ण की.
बैचलर ऑफ जर्नलिज्म (BJMC): रांची विश्वविद्यालय से साल 2011 में पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल की.
एम.ए. (नागपुरी भाषा): रांची विश्वविद्यालय के 'जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग' से साल 2009 में नागपुरी भाषा में स्नातकोत्तर (MA) की डिग्री हासिल की.
लेखन शैली और विशेषज्ञता: एक्सप्लेनर, रिसर्च बेस्ड स्टोरीज, स्पोर्ट्स जर्नलिज्म, इंटरनेशनल अफेयर्स और झारखंड की लोक-संस्कृति.
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