क्या सच में बदलने वाला है आपकी घड़ी का समय? नए IST नियम से आप पर क्या होगा असर?

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IST Rules : भारत में IST पहले से लागू है, फिर 2026 में नए नियमों की जरूरत क्यों पड़ी? जानिए IST को कानूनी और डिजिटल सिस्टम में ट्रेसेबल बनाने, NPL और NavIC की भूमिका और आम लोगों पर इसके असर की पूरी कहानी.

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भारत में इंडियन स्टैंडर्ड टाइम यानी IST कोई नई चीज नहीं है. हमारी और आपकी घड़ी दशकों से इसी प्रमाणिक समय के हिसाब से चलती आई है. लेकिन अब सरकार ने समय को लेकर एक बड़ा बदलाव किया है. कानूनी मेट्रोलॉजी (इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) नियम, 2026 के जरिए IST को कानूनी तौर पर मान्य और साझा समय बनाने की दिशा में कदम उठाया गया है. नए नियम 27 अगस्त 2026 को जारी किए गए और इन्हें लागू करने से पहले 180 दिन का समय दिया गया है.

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सवाल यह है कि जब भारत में पहले से ही IST चलता है, तो नए नियमों की जरूरत क्यों पड़ी?

IST तो पहले से है, फिर बदलाव क्या हुआ?

  • अभी तक IST देश का मानक समय है, लेकिन हर डिजिटल सिस्टम का समय जरूरी नहीं कि सीधे इसी राष्ट्रीय समय से जुड़ा हो. अलग-अलग कंप्यूटर, सर्वर और संस्थान इंटरनेट, जीपीएस या दूसरे समय स्रोतों से अपनी घड़ी मिला सकते थे.
  • नए नियम में इसे चेंज करते हुए अब कानूनी, सरकारी, कारोबारी और दूसरे आधिकारिक कामों में इस्तेमाल होने वाले समय को आईएसटी से जुड़े अधिकृत और जांचे-परखे स्रोत से जोड़ने की बात कही जा रही है.
  • यानी बात सिर्फ घड़ी में सही समय दिखाने की नहीं है, बल्कि यह भी जानने की है कि घड़ी में दिख रहा समय कितना प्रमाणिक है.

IST से ट्रेसेबल होने का मतलब क्या है?

यह शब्द थोड़ा तकनीकी है, लेकिन इसे आसान उदाहरण से समझिए.

  • मान लीजिए किसी कंपनी के सर्वर पर किसी लेन-देन का समय दर्ज हुआ. अगर उस सर्वर की घड़ी ऐसे स्रोत से मिली हुई है, जिसका संबंध प्रमाणित राष्ट्रीय समय से साबित किया जा सकता है, तो उस समय को IST से ट्रेसेबल यानी IST से जोड़ा और जांचा जा सकने वाला माना जा सकता है.
  • इसके लिए नेटवर्क टाइम प्रोटोकॉल यानी NTP जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. ज्यादा सटीक समय की जरूरत वाले कामों में प्रिसीजन टाइम प्रोटोकॉल यानी PTP, उपग्रह आधारित व्यवस्था और फाइबर-ऑप्टिक लिंक जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हो सकता है.
  • हर जगह एक जैसी सटीकता की जरूरत नहीं होती. सामान्य कंप्यूटर और कई कारोबारी कामों के लिए मिलीसेकंड स्तर की सटीकता काफी हो सकती है, जबकि अंतरिक्ष, रक्षा या बहुत संवेदनशील वैज्ञानिक कामों में इससे कहीं ज्यादा सटीक समय चाहिए होता है.

बैंक और डिजिटल सिस्टम के लिए सही समय क्यों जरूरी?

  • आज लगभग हर बड़ी डिजिटल व्यवस्था समय के सहारे चलती है. बैंकिंग लेन-देन, शेयर बाजार, दूरसंचार, बिजली नेटवर्क, सर्वर लॉग और साइबर सुरक्षा सिस्टम में हर गतिविधि का समय दर्ज होता है.
  • अब मान लीजिए किसी साइबर हमले के दौरान पांच अलग-अलग सर्वरों की घड़ियां कुछ सेकंड के अंतर से चल रही हों. जांच के समय यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि कौन-सी घटना पहले हुई और कौन-सी बाद में.
  • एक साझा और भरोसेमंद समय ऐसी घटनाओं की जांच को आसान बना सकता है. यही वजह है कि ‘एक देश, एक समय’ (One Nation, One Time) को सिर्फ घड़ी सही करने की कोशिश नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे डिजिटल सिस्टम को ज्यादा भरोसेमंद बनाने में भी मदद मिल सकती है.

पूरे सिस्टम में क्या चेंज होगा

  • भारत में राष्ट्रीय समय को बनाए रखने की जिम्मेदारी CSIR-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला यानी CSIR-NPL की है. यही संस्थान देश के प्रमाण समय को बनाए रखने और उसे दूसरे सिस्टम तक पहुंचाने वाली व्यवस्था में सबसे अहम भूमिका निभाता है.
  • इसके अलावा क्षेत्रीय संदर्भ मानक प्रयोगशालाएं भी समय को अलग-अलग जगहों तक पहुंचाने में मदद करती हैं. इस तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में समय उपलब्ध कराया जा सकता है, लेकिन उसकी कड़ी राष्ट्रीय समय से जुड़ी रहती है.

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GPS पर निर्भरता कम करने में NavIC की भूमिका

  • समय हासिल करने के लिए दुनिया में GPS समेत उपग्रह प्रणालियों का इस्तेमाल होता है. लेकिन भारत अपनी खुद की क्षमता को भी मजबूत करना चाहता है.
  • यहीं NavIC यानी नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन की भूमिका आती है. यह भारत की अपनी उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली है. इसके जरिए जगह की जानकारी के साथ सटीक समय भी हासिल किया जा सकता है.
  • CSIR-NPL और इसरो के बीच समय की कड़ी इस व्यवस्था को देश के स्तर पर ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद बनाने में मदद करती है.
  • इसका रणनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि अगर किसी बाहरी उपग्रह प्रणाली में किसी वजह से दिक्कत आती है, तो भारत के पास अपना विकल्प मौजूद रह सकता है.

आम लोगों को क्या करना होगा?

  • अगर आप सामान्य मोबाइल या कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं, तो आपको तुरंत कोई खास बदलाव करने की जरूरत आम तौर पर नहीं होगी. समय से जुड़ा बड़ा बदलाव सेवा देने वाली कंपनियों और संस्थानों के स्तर पर होगा.
  • नए नियमों का असली असर उन संस्थानों पर पड़ेगा जिनके सिस्टम कानूनी, सरकारी, कारोबारी या महत्वपूर्ण तकनीकी कामों के लिए समय पर निर्भर हैं.
  • यानी आपके मोबाइल की घड़ी में अचानक कोई नया समय नहीं आएगा. बदलाव इस बात में होगा कि जिस डिजिटल सिस्टम के पीछे वह समय चल रहा है, वह समय आखिर किस भरोसेमंद स्रोत से आया है.

इन नए नियमों की जरूरत क्यों पड़ी?

  • आसान भाषा में कहें तो भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अलग-अलग संस्थान अपनी-अपनी घड़ियां अलग-अलग जगहों से मिले समय के आधार पर न चलाएं.
  • इसके बजाय एक साझा, प्रमाणित और जांचा जा सकने वाला राष्ट्रीय समय हो. IST पहले भी भारत का प्रमाण समय था, लेकिन 2026 के नए नियम इस समय को कानूनी और डिजिटल सिस्टम में लागू करने की व्यवस्था को ज्यादा साफ और जवाबदेह बनाने की दिशा में कदम हैं.

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