रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक दक्षिण और सार्थक सहयोग की भारतीय दृष्टि: भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता पर जेएनयू के प्रोफेसर डॉ. महीप का जबरदस्त लेख

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सिर्फ सहभागिता नहीं, स्थायी प्रभाव- यही भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की असली कसौटी है.

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भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका को ठोस सहयोग और संस्थागत उपलब्धियों में बदलने का महत्त्वपूर्ण अवसर है. वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और बहुध्रुवीय विश्व की संभावनाओं के बीच भारत ऐसी साझेदारी को दिशा दे सकता है जिसमें राष्ट्रीय हित और साझा विकास एक-दूसरे को सुदृढ़ करें.

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इस अवसर का विशेष महत्त्व विविध प्राथमिकताओं वाले देशों के बीच संवाद, विश्वास और व्यावहारिक सहमति विकसित करने की भारत की क्षमता में निहित है.

12 सितम्बर 2026 को जब 18वा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत मंडपम में आरम्भ होगा, तब शी जिनपिंग सात वर्षों में पहली बार भारत की यात्रा करेंगे और व्लादिमीर पुतिन उस प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा करेंगे जिन्हें वे एक सहभागी मानते हैं. यह उपस्थिति ही इस अध्यक्षता के कूटनीतिक महत्त्व को रेखांकित करती है.

इस अवसर के साथ एक जटिल कूटनीतिक दायित्व भी जुड़ा है. सदस्य देशों की भिन्न सुरक्षा प्राथमिकताएं, क्षेत्रीय तनाव और आर्थिक असंतुलन साझा निर्णयों को प्रभावित करते हैं. 28 फरवरी से संयुक्त राज्य अमेरिका और इजराइल का ईरान के विरुद्ध अभियान जारी है, जिससे होर्मुज जलसंधि की आवाजाही मंद पड़ी है; अगस्त में ईरानी प्रक्षेपास्त्रों से आहत संयुक्त अरब अमीरात ने तेहरान से व्यापार और वित्तीय लेन-देन स्थगित कर दिया. इसी संगठन के दो सदस्य आज जारी संघर्ष में परस्पर विरोधी पक्षों के साथ खड़े हैं. मेजबान और अध्यक्ष के रूप में भारत के नेतृत्व की कसौटी इन भिन्नताओं के बीच सहयोग के ऐसे क्षेत्र विकसित करना है जिनमें सहमति ठोस परिणामों का आधार बन सके.

इस अवसर के साथ एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक अंतर्विरोध भी विद्यमान है, जिसका प्रबंधन भारत को ही करना है. ब्रिक्स में सहभागिता भारत के विकल्पों को विस्तृत करती है, और साथ ही कुछ निर्भरताओं को गहरा भी करती है. दस अन्य सदस्यों के साथ भारत का वस्तु-व्यापार महामारी के बाद दुगुने से अधिक हो गया, अर्थात् वित्त वर्ष 2021 के लगभग 203 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में लगभग 417 अरब डॉलर. इसी अवधि में इस संबंध के भीतर भारत का व्यापार-घाटा तिगुना होकर लगभग 226 अरब डॉलर हो गया. जो मंच विकासशील देशों की आवाज सशक्त करने का उद्देश्य रखता है, वही असंतुलन को भी गहरा सकता है. यही वह पहेली है जो अध्यक्ष के रूप में भारत को विरासत में मिली है. ग्यारह सदस्यों और दस भागीदारों का यह गठबंधन अब मानवता के लगभग आधे भाग का, और क्रय-शक्ति समता के मान से औद्योगिक लोकतंत्रों के समकक्ष उत्पादन का प्रतिनिधित्व करता है. इसमें लोकतंत्र भी हैं, दल-राज्य भी, राजतंत्र भी, और एक युद्धरत गणराज्य भी. प्रश्न यह है कि ऐसा निकाय मात्र सहभागिता को स्थायी प्रभाव में कैसे परिणत करे.

इस आलेख का तर्क सीधा है, और अपने दृष्टिकोण में नि:संकोच भारतीय है. ब्रिक्स का आकर्षण तीन शक्तियों के मेल से उपजता है: भौतिक विस्तार, वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व की मांग, और स्वतंत्र रणनीतिक विकल्पों की आकांक्षा. 2012, 2016 और 2021 के बाद भारत की चौथी अध्यक्षता इस आकर्षण को परिणामकारी सहयोग में बदलने का अवसर प्रदान करती है. इस वर्ष का सही मापदंड किसी घोषणापत्र की प्रभावशाली भाषा नहीं है. वह त्रिविध है: क्या भारत असमान सदस्यों के बीच व्यावहारिक सहयोग रच पाता है, क्या वह ठोस और व्यापक लाभ सुनिश्चित करता है, और क्या वह ऐसे संकल्प छोड़ता है जो अध्यक्षता के वार्षिक हस्तांतरण से आगे टिकें. विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के शब्दों में, ब्रिक्स 'उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के बीच सहयोग का एक महत्त्वपूर्ण मंच' बन चुका है. भारत का कार्य इस मंच को सार्थक बनाना है.

भारत मंडपम, नई दिल्ली
भारत मंडपम, नई दिल्ली
यह शिखर सम्मेलन क्यों महत्त्वपूर्ण है: 18वा शिखर सम्मेलन ब्रिक्स के बीसवें वर्ष में पड़ता है और भारत की चौथी अध्यक्षता का समापन करता है. इसमें ग्यारह सदस्य और दस भागीदार एकत्र हैं जो मिलकर विश्व की लगभग आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह सात वर्षों में पहली बार शी जिनपिंग की भारत-यात्रा और पुतिन की उपस्थिति के साथ जुटता है, जबकि एक सदस्य-राज्य से जुड़ा युद्ध संगठन की एक स्वर में बोलने की सामर्थ्य को परख रहा है. .

सर्वसम्मति और स्वैच्छिक सहयोग

प्रतिद्वंद्वियों का यह समूह सहयोग करता कैसे है? उत्तर उन निर्णयों के भेद में है जिनमें सर्वसम्मति अनिवार्य है, और जिनमें नहीं. संयुक्त नेता-घोषणापत्र के लिए सर्वसम्मति चाहिए, और ठीक वहीं, ईरान-युद्ध की भाषा पर, सहमति सर्वाधिक कठिन है. किन्तु ब्रिक्स का अधिकांश कार्य विशिष्ट विषयों पर इच्छुक देशों के सहयोग से आगे बढ़ता है. न्यू डेवलपमेंट बैंक अपनी संस्थागत निर्णय व्यवस्था के अनुसार उन्हीं सदस्यों को ऋण देता है जो उधार लेते हैं; स्थानीय-मुद्रा निपटान उन्हीं युग्मों के बीच बढ़ता है जो उसे चुनते हैं; रुपया-दिरहम निपटान द्विपक्षीय है, ग्यारह का सामूहिक निर्णय नहीं. भारत की अध्यक्षता की प्रज्ञा यही है कि सर्वसम्मति की दुर्लभ पूंजी उन्हीं कुछ प्रश्नों के लिए सुरक्षित रहे जिन्हें उसकी सचमुच आवश्यकता है, और शेष इच्छुक सदस्यों के साथ आगे बढ़े. जयपुर में अगस्त 2026 में व्यापार मंत्रियों ने ‘ब्रिक्स आर्थिक साझेदारी रणनीति 2030’ को अंतिम रूप दिया, उन कठिन भू-राजनीतिक प्रश्नों की प्रतीक्षा किए बिना जो सदस्यों को विभाजित करते हैं. चयनित पहलें व्यापक मतभेदों के बावजूद आगे बढ़ सकती हैं.

बैंक और जलवायु-वित्त

न्यू डेवलपमेंट बैंक इस समूह में भारत की सबसे मूर्त हिस्सेदारी है, और वर्ष के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न, अर्थात् जलवायु-वित्त, के केंद्र में बैठा है. दिसम्बर 2025 के अंत तक इसके निदेशक मंडल ने 139 परियोजनाओं के लिए लगभग 43 अरब डॉलर स्वीकृत किए. मुंबई मेट्रो और एस्कॉम की अक्षय-ऊर्जा परियोजना दर्शाती हैं कि स्वीकृति एक वचन है, जबकि संवितरण स्वीकृत राशि का वास्तविक वितरण है, और उसे प्रत्येक परियोजना के निर्माण-कार्यक्रम के सापेक्ष पढ़ना चाहिए, ताकि मेट्रो-निर्माण की स्वाभाविक मंद गति को असफलता न समझा जाए. जलवायु-वित्त वह भूमि है जहाँ भारत का नैतिक तर्क सर्वाधिक अपना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 के रियो शिखर में कहा कि वैश्विक दक्षिण को प्राय: 'प्रतीकात्मक भाव-भंगिमाओं से अधिक कुछ नहीं' मिला. स्थानीय मुद्रा में, विकास-कालावधि पर ऋण देने वाला बैंक वही उपकरण है जिसके द्वारा मान्यता ठोस लाभ में बदलती है.

वैश्विक दक्षिण के अधिकांश के लिए पूंजी की लागत ही तय करती है कि सौर-उद्यान या बाढ़-प्रतिरोध कभी बनेगा या नहीं. अत: स्थानीय मुद्रा में, विकास-कालावधि पर ऋण देने वाला बैंक भारत के संधारणीयता-एजेंडे की धुरी है, और इस बात की सबसे स्पष्ट कसौटी कि मान्यता ऐसे लाभ में बदलती है या नहीं जिसे कोई नागरिक देख सके.

ब्रिक्स का विस्तार, जी-7 और आंतरिक शक्ति संतुलन

सऊदी अरब की सदस्यता की स्थिति पर स्पष्टता आवश्यक है. आधिकारिक सूचियां उसे जनवरी 2024 से सदस्य गिनती हैं, जबकि सऊदी वक्तव्य पूर्ण सदस्यता की पुष्टि से बचते रहे हैं, और उसका प्रतिनिधित्व-स्तर सम्मिलित होते राज्यों से नीचे रहा है. ब्रिक्स और जी-7 की तुलना प्राय: भ्रामक है, क्योंकि वह आर्थिक और जनसांख्यिकीय आकार को नीतिगत एकजुटता मान लेती है. क्रय-शक्ति समता पर विस्तृत ब्रिक्स जी-7 से आगे है, लगभग 37 प्रतिशत उत्पादन और 54 प्रतिशत जनसंख्या, किन्तु बाज़ार-विनिमय दर पर जी-7 आरक्षित-मुद्रा वित्त और प्रौद्योगिकी-मानकों के गहरे कोष अपने पास रखता है. ऊर्जा में समूह प्रबल दिखता है, फिर भी ईरान-युद्ध सीमा उजागर करता है: तेहरान और अबू धाबी दोनों को समेटे समूह उसी वस्तु पर एक स्वर में नहीं बोल सकता जो उसे कथित रूप से जोड़ती है.

ब्रिक्स के आर्थिक शक्ति संतुलन में चीन का प्रभाव व्यापक है, और नई दिल्ली में उसकी भागीदारी का विशेष कूटनीतिक महत्त्व है. यहाँ व्यापार-घाटे का विश्लेषण आवश्यक है, क्योंकि वह अकेले किसी एक प्रकार की भेद्यता सिद्ध नहीं करता. चीन पर निर्भरता विनिर्माण में प्रयुक्त कलपुर्जों और मध्यवर्ती उत्पादों की है, जहाँ प्रतिस्थापन कठिन है, और यही रणनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक भारी मामला है. रूस पर निर्भरता रियायती ऊर्जा है, जो विनिमेय है, फिर भी संकट में रणनीतिक बन सकती है.

ब्रिक्स में भारत का विशिष्ट योगदान

इस समूह में भारत का योगदान विशिष्ट है. पहली शक्ति डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना है, अर्थात् पहचान, तात्क्षणिक भुगतान और सहमति-आधारित आँकड़ा-विनिमय की जनसंख्या-स्तरीय संरचना, जिसे भारत ने अमीरात और अन्यों से जोड़ते हुए साझा हित के रूप में प्रस्तुत किया, न कि स्वामित्वयुक्त निर्यात के रूप में. दूसरी शक्ति प्रतिद्वंद्वी गठबंधनों के आर-पार भारत की विश्वसनीय स्थिति है, अर्थात् QUAD और ब्रिक्स दोनों में, रियायती रूसी तेल और मालाबार अभ्यास दोनों. यह व्यवहार में बहु-संरेखण है, अ-पश्चिमी, न कि पश्चिम-विरोधी. जैसा नैटस्ट्रैट के डॉ. राज कुमार शर्मा ने लक्षित किया है, भारत वही संयमकारी शक्ति रहा है जो ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकती है, और वैश्विक दक्षिण को 'बिना किसी शर्त' विकास प्रदान करती है. रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए भारत को व्यापक सहमति और अपनी तात्कालिक प्राथमिकताओं के बीच सावधानी से संतुलन साधना पड़ता है.

मुद्रा, और साझा मुद्रा का मिथक

मौद्रिक सहयोग पर विमर्श में प्राय: अतिरंजित दावे किए जाते हैं. भारत और ब्राज़ील बारंबार एकल ब्रिक्स-मुद्रा को नीति मानने से इनकार कर चुके हैं, क्योंकि जो सदस्य साझा मौद्रिक-नीति के लिए अत्यधिक विविध हैं, वे साझा मुद्रा नहीं रख सकते. भारत इस शिखर पर सदस्यों की केंद्रीय-बैंक डिजिटल मुद्राओं को सीमापार भुगतान हेतु अंतर-संयोजित करने का प्रस्ताव रख रहा है, जो समाचारों में उल्लिखित एक प्रस्ताव है, स्वीकृत कार्यक्रम नहीं. CBDC अंतर-संयोजन भुगतान-अवसंरचना है, साझा मुद्रा नहीं. मौद्रिक विविधीकरण भारत के चयन को तभी विस्तृत करता है जब वह जोखिम आयात किए बिना लागत घटाए और उसी निर्भरता का माध्यम न बने जिसे घटाने का वह दावा करता है.

कसौटियां, और भारत के चयन

तर्क को अपनी प्रबलतम आपत्तियों का सामना करना होगा.

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इनमें प्रमुख हैं आंतरिक असममिति, जहा एक अर्थव्यवस्था शेष को बौना कर दे; दुर्बल क्रियान्वयन, जो स्वीकृति और संवितरण के अंतराल में दिखता है, यद्यपि वह अंतराल प्राय: निर्माण की स्वाभाविक लय है; और प्रतिनिधित्व, जहा एजेंडा तथा वित्त बड़े सदस्यों के हाथ है. इन पर वर्तमान क्षण एक और कसौटी जोड़ता है, अर्थात् सदस्यों के बीच एक युद्ध. संस्थागत सुधार पर भारत को स्पष्टवादी होना होगा, क्योंकि सदस्य अधिकार के पुनर्वितरण का समर्थन तभी सबसे कम करते हैं जब उनके अपने विशेषाधिकार दाँव पर हों. संयुक्त राष्ट्र-सुधार का सामान्य समर्थन सस्ता है, किन्तु किसी स्थायी सुरक्षा-परिषद सीट का समर्थन विरल, और चीन ने कभी भारत की स्थायी सीट का समर्थन नहीं किया. प्रधानमंत्री मोदी ने यह माँग एक दशक से अधिक जीवित रखी है, 2014 में ही यह कहते हुए कि वैश्विक अभिशासन की संस्थाओं का सुधार ब्रिक्स के एजेंडे पर 'इसके आरम्भ से' रहा है.

भारत की अध्यक्षता की सबसे दूरगामी प्राथमिकताओं में संस्थागत निरंतरता का विशेष स्थान है. अध्यक्ष देश एक वर्ष तक समूह का नेतृत्व करता है, और न अपने पूर्ववर्ती के संकल्पों पर नियंत्रण रखता है, न उत्तराधिकारी के एजेंडे पर. 2026 में भारत जो ढाँचा रचता है, उसका मूल्य इस पर निर्भर है कि वह 2027 की चीनी अध्यक्षता में टिकता है या नहीं. संस्थाएँ प्रभाव पुनरावृत्ति से अर्जित करती हैं, अर्थात् इस विश्वसनीय अपेक्षा से कि एक वर्ष का संकल्प अगले वर्ष निभाया जाएगा. भारत का विशिष्ट अवसर प्रतिबद्धताओं के क्रियान्वयन से विश्वसनीयता स्थापित करना है, अर्थात् वह सदस्य बनना जिसका शब्द, भारत मंडपम में दिया गया, निभाए जाने के कारण अधिक मूल्यवान हो. 

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की स्थायी उपलब्धि उन व्यवस्थाओं में दिखाई देगी जो साझा संकल्पों को विकास वित्त, सुगम भुगतान, प्रौद्योगिकी सहयोग और अधिक न्यायसंगत प्रतिनिधित्व में बदलें. भारत के पास समूह की विविधता को सहयोग की शक्ति बनाने तथा वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को संस्थागत आधार देने का अवसर है. इसके लिए राष्ट्रीय हितों की स्पष्टता, साझेदारों की प्राथमिकताओं के प्रति संवेदनशीलता और प्रतिबद्धताओं के निरंतर क्रियान्वयन का समन्वय आवश्यक होगा. रणनीतिक स्वायत्तता का आधार स्वतंत्र निर्णय क्षमता है, जिसके अंतर्गत भारत प्रत्येक विषय पर अपने राष्ट्रीय हितों और परिस्थितियों के अनुसार साझेदारी निर्धारित करता है, और यही एक बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में भारत का योगदान है. भारत की नेतृत्वकारी भूमिका का दीर्घकालिक महत्त्व इसी क्षमता से निर्धारित होगा कि उसकी अध्यक्षता में विकसित सहयोग आने वाले वर्षों में कितना विश्वसनीय और लाभकारी बना रहता है.

यह लेख डॉ. महीप (निदेशक, इंडियन पर्सपेक्टिव ऑन ग्लोबल अफेयर्स) ने लिखा है.

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