Smash the Patriarchy 1 : प्यार-मोहब्बत अपनी जगह,सेल्फ आइडेंटिटी से समझौता नहीं चाहती हैं Gen Z लड़कियां
Gen Z लड़कियां
कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों Gen Z से लगातार संपर्क में हैं और उनके मुद्दों को उठाकर उन्हें न्याय दिलाने की बात कर रहे हैं. इसी क्रम में उन्होंने पुणे में लड़कियों का आह्वान किया कि उन्हें पेट्रियारकी यानी पितृसत्ता का विरोध करना चाहिए.
हमारे देश का संविधान महिलाओं को पुरुषों के बराबर ही अधिकार देता है, लेकिन समाज में भेदभाव मौजूद है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. इन परिस्थितियों में देश की युवा पीढ़ी यानी Gen Z क्या सोचती है, इसपर प्रभात खबर एक सीरीज शुरू कर रहा है, जिसमें Gen Z की सोच को सामने लाया जाएगा. इस स्टोरी में इस बात पर चर्चा है कि क्या शादी के बाद लड़कियों को अपना सरनेम बदलना चाहिए?
अगर मेरा हैसबैंड मुझे बहुत प्यार करेगा और मेरी सारी जिम्मेदारियां भी उठाएगा, तब भी मैं उसकी सरनेम कैरी नहीं करूंगी. इसकी वजह यह है कि मेरी अपनी आइडेंटिटी है, मैं उस आइडेंटिटी के साथ ही पली बढ़ी हूं. ऐसा कैसे संभव है कि अचानक शादी के बाद मैं अपनी आइडेंटिटी बदल दूं. यह तो मेरी पहचान पर सवाल होगा, इसलिए मैं ऐसा नहीं करूंगी. यह कहना है बिहार के छपरा की रहने वाली सोनम सिंह का.
सरनेम बदलना आइडेंटिटी से समझौता है
सोनम सिंह एक जेन जी हैं और फिलहाल एक निजी कंपनी में काम करती हैं. उनका कहना है कि मैं जिस फैमिली से आती हूं वहां हमारी मां ने वह सबकुछ किया जो उनसे करवाया गया. उन्होंने यह समझा कि शादी के बाद अपना नाम बदलना (सरनेम) एक रिचुअल है, जिसे उन्हें करना है. उनके पास कोई विकल्प नहीं था, लेकिन मेरी स्थिति वैसी नहीं है. मैं जानती हूं कि मेरी अपनी पहचान है. मैं अपने पति से यह बता दूंगी कि मैं किसी भी परिस्थिति में अपना सरनेम चेंज नहीं करूंगी. अगर वो मुझे इसके लिए फोर्स करेगा, तो फिर मैं अपने रास्ते और वो अपने रास्ते.
रांची की सौम्या शाहदेव कहती हैं कि पेट्रियारकी महिलाओं को दबाने और उन्हें नियंत्रित करने का एक जरिया है. हम अपनी पहचान खोना नहीं चाहते हैं, इसलिए मैं अपना सरनेम चेंज करने में बिलकुल भी यकीन नहीं रखती हूं. सरकार को भी चाहिए कि वो कोई ऐसी व्यवस्था बनाए, ताकि शादी के बाद फीमेल को अपनी आइडेंटिटी के साथ कोई समझौता ना करना पड़े. आखिर कब तक पेट्रियारकी औरतों को दबाने का काम करता रहेगा?
सरनेम बदलना है या नहीं यह मेरी च्वाइस
रांची की जूही कुमारी कहती हैं कि सरनेम बदलना तो नहीं चाहिए क्योंकि यह आइडेंटिी से जुड़ा मसला है. जहां तक मेरी बात करें तो मेरे नाम के साथ कुमारी जुड़ा है, इसलिए शादी के बाद मैं अपना सरनेम तो जरूर बदलूंगी. हां, यह जरूर ध्यान दूंगी कि कोई ऐसा बंदा मिले जिसका सरनेम मेरा नाम से मैच करता हो, तो मैं उसका सरनेम अपने नाम के साथ लगा लूंगी. जहां तक मेरे अपने सरनेम का सवाल है, तो मैं उसे इसलिए कैरी नहीं करूंगी क्योंकि वो मुझे पसंद नहीं है.
परंपरा है, इसलिए सरनेम बदल लूंगी
मेजॉरिटी ऑफ जेन जी लड़कियां यह मानती हैं कि सरनेम चेंज करना उनकी आइडेंटिटी से जुड़ा मसला है, इसलिए वो सरनेम चेंज नहीं करेंगी. वहीं कुछ ऐसी लड़कियां भी हैं, जो यह मानती हैं कि यह हमारी परंपरा का हिस्सा है, इसलिए वो सरनेम चेंज कर लेंगी. जमशेदपुर की प्रियंका गोरांई कहती है कि उन्हें इस बात की नाॅलेज है कि यह उनकी पहचान से जुड़ा मसला है, बावजूद इसके वे अपना सरनेम चेंज करेंगी. इसके पीछे वजह यह है कि यह हमारी परंपरा का हिस्सा है.
आखिर क्या है Patriarchy जिसका हो रहा है विरोध?
Patriarchy यानी पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पुरुषों के पास प्रमुख शक्ति होती है. प्रसिद्ध नारीवादी इतिहासकार और समाजशास्त्री गर्डा लर्नर (Gerda Lerner) के अनुसार पितृसत्ता परिवार में महिलाओं और बच्चों पर पुरुषों के वर्चस्व की अभिव्यक्ति और संस्थागतकरण तथा सामान्य रूप से महिलाओं पर पुरुषों के सामाजिक वर्चस्व का विस्तार है. पितृसत्ता की अवधारणा यानी सोच में परिवार, समाज, राजनीति तथा अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में नेतृत्व का अधिकार पुरुषों के पास होता है. इस सोच आधारित समाज में महिलाओं को पुरुषों के अधीन माना जाता है और उन्हें एक स्वतंत्र इकाई के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है. इसी सोच के तहत महिलाओं को जन्म से पिता, शादी के बाद पति और वृद्धावस्था में पुत्र के अधीन रखा गया है. वर्तमान समय में लड़कियां स्वतंत्र हैं और आर्थिक रूप से भी इंडिपेंडेंट हैं, इस वजह से वे पितृसत्ता का विरोध कर रही हैं.
क्या लड़कियों के सरनेम चेंज करने को लेकर देश में है कोई कानून?
भारत में चाहे हिंदू मैरिज एक्ट हो या मुस्लिम मैरिज एक्ट उनका निर्माण समाज में मौजूद परंपराओं के आधार पर हुआ है. जो अधिनियम बनाए गए हैं उनका डॉक्यूमेंटेशन यानी दस्तावेजीकरण परंपराओं के आधार पर हुआ है. इस संबंध में झारखंड हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट अवनीश रंजन मिश्रा ने बताया कि लड़कियों के सरनेम चेंज करने से संबंधित कोई कानून देश में नहीं है. संविधान ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर माना है और उन्हें समान अधिकार दिए हैं. इसके साथ ही समाज से लिंग आधारित भेदभाव मिटाने के लिए समय-समय पर कई तरह के कानून भी बनाए गए हैं, जो महिलाओं को सशक्त करते हैं. जहां तक बात शादी के बाद सरनेम बदलने की है, तो यह सिर्फ और सिर्फ रूढ़ी और परंपरा आधारित व्यवस्था है, इसका कानून से कोई संबंध नहीं है.
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