Pahalgam से Iran War तक… BRICS में भारत ने कैसे साधा सबसे बड़ा Diplomatic Balance?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
एक तरफ पश्चिम एशिया में Iran को लेकर बढ़ता सैन्य तनाव और दूसरी तरफ Pahalgam आतंकी हमले के बाद भारत की कड़ी कूटनीतिक मांग. ऐसे समय में BRICS के नई दिल्ली घोषणापत्र में आतंकवाद पर ‘Zero Tolerance’ और पश्चिम एशिया में संयम की बात क्यों महत्वपूर्ण है? समझिए भारत की कूटनीति का पूरा खेल.
नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी कहानी सिर्फ Xi Jinping और Vladimir Putin की मौजूदगी नहीं है. असली कहानी उस समय की है जब एक तरफ Iran पर जारी युद्ध ने पश्चिम एशिया को अस्थिर कर रखा है, दूसरी तरफ Pahalgam आतंकी हमले पर भारत ने BRICS से स्पष्ट रुख हासिल किया है.
New Delhi Declaration ने आतंकवाद को किसी भी परिस्थिति में जायज मानने से इनकार किया और Pahalgam हमले की कड़ी निंदा की. साथ ही पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव पर चिंता जताते हुए अधिकतम संयम और कूटनीतिक समाधान की बात कही.
भारत के लिए यह सिर्फ एक घोषणापत्र नहीं, बल्कि अपनी विदेश नीति और कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा भी है.

1. Iran पर हमला: BRICS ने हमलावरों को क्या संदेश दिया?
BRICS देशों ने पश्चिम एशिया में बढ़ती हिंसा और तनाव पर गंभीर चिंता जताई. घोषणापत्र ने उन घटनाओं की निंदा की जिनसे जान-माल का नुकसान हुआ और सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने को कहा. साथ ही जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की बात कही गई.
हालांकि यहां एक अहम बात समझना जरूरी है—घोषणापत्र ने अमेरिका या इजराइल का नाम लेकर Iran पर हमले की निंदा नहीं की. यही BRICS diplomacy की सीमा भी है और उसकी खासियत भी.
Iran और UAE जैसे अलग-अलग हित वाले देशों को एक ही दस्तावेज पर सहमत कराना आसान नहीं था.
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2. भारत ने आतंकवाद पर अपनी बात मनवाई
भारत के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि Pahalgam आतंकी हमले पर BRICS की स्पष्ट भाषा है.
घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 के Pahalgam हमले की कड़ी निंदा की गई, जिसमें 26 लोग मारे गए थे. BRICS ने आतंकवाद को criminal and unjustifiable बताया और cross-border movement of terrorists, terror financing तथा safe havens के खिलाफ कार्रवाई की बात कही.
और सबसे महत्वपूर्ण शब्द था—zero tolerance.
भारत लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ दोहरे मानदंडों का विरोध करता रहा है. घोषणापत्र ने भी आतंकवाद के खिलाफ double standards को खारिज किया है.
3. Iran का सवाल और Pahalgam का सवाल: भारत ने दोनों को कैसे जोड़ा?
यहीं भारत की कूटनीति की असली परीक्षा दिखाई देती है.
एक तरफ Iran BRICS का सदस्य है और उस पर जारी युद्ध ने पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया है. दूसरी तरफ भारत खुद सीमा-पार आतंकवाद की चुनौती झेलता रहा है.
भारत ने इसलिए किसी एक देश के पक्ष में खड़े होने के बजाय एक व्यापक सिद्धांत पर जोर दिया—सैन्य आक्रमण हो या आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में जवाबदेही और नागरिकों की सुरक्षा जरूरी है.
यह approach भारत की strategic autonomy के अनुरूप है: किसी एक geopolitical camp का हिस्सा बने बिना अपने मूल हितों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाना.
4. क्या BRICS America-विरोधी मंच बन रहा है?
घोषणापत्र में एकतरफा प्रतिबंधों, tariffs और आर्थिक दबावों पर भी चिंता जताई गई है. इसे सीधे-सीधे America के खिलाफ BRICS कहना आसान होगा, लेकिन तस्वीर इससे ज्यादा जटिल है.
भारत खुद अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी रखता है. इसलिए नई दिल्ली के लिए चुनौती यह है कि BRICS को पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनने से रोके और उसे Global South के हितों का मंच बनाए रखे.
प्रधानमंत्री मोदी ने भी BRICS को किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के पक्ष में बताया है.

5. असली परीक्षा: क्या भारत इस consensus को आगे ले जा पाएगा?
BRICS का घोषणापत्र पास होना भारत के लिए कूटनीतिक उपलब्धि है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है.
क्या आतंकवाद के खिलाफ बनी भाषा भविष्य में भी कायम रहेगी? क्या पश्चिम एशिया में BRICS संवाद और de-escalation की भूमिका निभा पाएगा? क्या China, Russia, Iran, UAE और भारत जैसे अलग-अलग हित वाले देश किसी बड़े संकट में एक साझा रास्ता खोज पाएंगे?
और सबसे अहम—क्या भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान बने consensus को संस्थागत सहयोग में बदल पाएगा?
BRICS में भारत की बड़ी परीक्षा यही है: अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच खड़े होकर भारत कितना अपने हितों की रक्षा कर सकता है और कितना वैश्विक एजेंडा तय कर सकता है.
Iran युद्ध और Pahalgam आतंकवाद—दोनों मुद्दों पर BRICS की भाषा ने भारत को एक महत्वपूर्ण diplomatic space दिया है. अब इस space को वास्तविक रणनीतिक प्रभाव में बदलना नई दिल्ली की अगली चुनौती है.
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