पूजास्थल कानून-1991 की वैधानिकता को शीर्ष अदालत में चुनौती, कहा- भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है कानून

Updated at : 31 Oct 2020 6:30 PM (IST)
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पूजास्थल कानून-1991 की वैधानिकता को शीर्ष अदालत में चुनौती, कहा- भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है कानून

नयी दिल्ली : अयोध्या में रामजन्म भूमि का फैसला आने के बाद मथुरा के श्रीकृष्ण विराजमान की जन्मस्थली को लेकर अदालती लड़ाई के बीच सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता व बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल कर पूजास्थल कानून-1991 की वैधानिकता को चुनौती दी है.

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नयी दिल्ली : अयोध्या में रामजन्म भूमि का फैसला आने के बाद मथुरा के श्रीकृष्ण विराजमान की जन्मस्थली को लेकर अदालती लड़ाई के बीच सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता व बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल कर पूजास्थल कानून-1991 की वैधानिकता को चुनौती दी है.

बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने शीर्ष अदालत में दाखिल याचिका में पूजास्थल कानून-1991 को भेदभावपूर्ण बताते हुए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है. उन्होंने पूजास्थल कानून-1991 की धारा 2, 3 और 4 को संविधान का उल्लंघन बताते हुए इन्हें रद्द करने की मांग की है.

याचिका में उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार को इस तरह का कानून बनाने का अधिकार ही नहीं है. उन्होंने कहा है कि संविधान में तीर्थस्थल राज्य का विषय है. यह संविधान की सातवीं अनुसूची की दूसरी सूची में शामिल है. साथ ही पब्लिक ऑर्डर भी राज्य का विषय है. इसलिए केंद्र ने ऐसा कानून बनाकर क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण किया है.

अश्विनी उपाध्याय ने याचिका में कहा है कि ऐतिहासिक तथ्यों, संवैधानिक प्रावधानों और हिंदू, जैन, बौद्ध और सिखों के मौलिक अधिकारों को संरक्षित करते हुए शीर्ष अदालत उनके धार्मिक स्थलों को पुनर्स्थापित करे. साथ ही कानून की धारा 2, 3 और 4 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26 और 29 का उल्लंघन बताते हुए रद्द करने की अपील की है.

बीजेपी नेता का कहना है कि पूजास्थल कानून-1991 को 11 जुलाई, 1991 को अतार्किक तरीके से लागू करते हुए कहा गया था कि 15 अगस्त, 1947 को जो स्थिति पूजा स्थलों और तीर्थस्थलों की थी, वही आगे भी कायम रहेगी.

उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार कानून को पूर्व की तारीख से लागू नहीं कर सकता है. साथ ही लोगों को ज्यूडिशियल रेमेडी से वंचित भी नहीं कर सकता है. केंद्र सरकार कानून बनाकर हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख समुदाय के लिए अदालत का दरवाजा भी बंद नहीं कर सकता है.

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