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जम्मू कश्मीर : भाजपा की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है महबूबा सरकार गिराना, ऐसे लिया फैसला

Updated at : 19 Jun 2018 3:44 PM (IST)
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जम्मू कश्मीर : भाजपा की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है महबूबा सरकार गिराना, ऐसे लिया फैसला

नयी दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी ने आज एक चौंकाने वाले फैसले में जम्मू कश्मीर की महबूबा सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इस फैसले से पहले नरेंद्र मोदी सरकार के शीर्ष स्तर पर और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष सांगठनिक स्तर पर चरणबद्ध बैठकें हुईं. सरकार और पार्टी ने राष्ट्रीय सुरक्षा व हित के […]

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नयी दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी ने आज एक चौंकाने वाले फैसले में जम्मू कश्मीर की महबूबा सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इस फैसले से पहले नरेंद्र मोदी सरकार के शीर्ष स्तर पर और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष सांगठनिक स्तर पर चरणबद्ध बैठकें हुईं. सरकार और पार्टी ने राष्ट्रीय सुरक्षा व हित के साथ हर राजनीतिक नफे-नुकसान का आकलन किया और उसके बाद चौंकाने वाले कदम के रूप में समर्थन वापस ले लिया. हालांकि अमित शाह ने कल ही जम्मू कश्मीर के अपनी सभी अहम नेताओं व मंत्रियों को बैठक के लिए दिल्ली बुलाया था. भाजपा ने जम्मू कश्मीर के नेताओं की दिल्ली में ऐसी बैठक पहली बार नहीं बुलायी थी, राज्य के सुरक्षा व राजनीतिक हालात के मद्देनजर दिल्ली में ऐसी बैठकें पहले भी होती रही हैं.

यही वजह है कि पीडीपी यह कह रही है कि उसे इस बात का संकेत भी नहीं था कि भाजपा उनसे समर्थन वापस ले सकती है. पीडीपी के प्रवक्ता रफी मोहम्मद मीर ने भाजपा के इस कदम को खुद के लिए चौंकाने वाला बताया है. वहीं, शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने कहा है कि बीजेपी ने यह फैसला लोकसभा चुनाव के मद्देनजर लिया है. उन्होंने यह भी कहा है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे पहले दिन से इस अस्वाभाविक गंठबंधन का विरोध करते रहे हैं.

दरअसल, युद्ध विराम के दौरान जम्मू कश्मीर में आतंकियों जिस तरह हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया उससे बीजेपी सरकार पर आतंक के प्रति शॉफ्ट रुख अख्तियार करने को लेकर सवाल उठाये जाने लगे थे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व उनकी पार्टी बार-बार जम्मू कश्मीर में सरकार के विफल होने का आरोप लगा रही थी. जम्मू कश्मीर भारत की अखंडता का प्रतीक है और वहां की हर गतिविधि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करती है. देश भर के लोगों की भावनाएं जम्मू कश्मीर से जुड़ी हैं. इसलिए भाजपा महासचिव राम माधव ने आज समर्थन वापसी का एलान करते समय यह आरोप लगाया कि राज्य में आतंकवाद व अतिवाद बढ़ गया, ऐसे में राज्य व राष्ट्रहित में हमने यह फैसला लिया है.

लोकसभा चुनाव में अब मात्र 10 महीने बचे हैं. टेररिज्म पर नरम रुख की तोहमत भाजपा की राष्ट्रीय आकांक्षा को नुकसान पहुंचा सकती थी, क्योंकि वह यही आरोप सत्ता से बाहर रहने पर हमेशा बेहद आक्रामक अंदाज में कांग्रेस पर लगाती रही है. नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी को यह संदेश देना था कि उनका रुख आतंक पर नरम नहीं है और वह राष्ट्रीय संप्रभुता व एकता से कोई समझौता नहीं कर सकती है. इसके लिए एक माकूल मौका चाहिए था. युद्ध विराम की मियाद पूरी होने से पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस मुद्दे पर अहम अधिकारियों के साथ पहले समीक्षा बैठक की, उसके बाद प्रधानमंत्री के साथ उनकी बैठक हुई और उन्होंने उन्हें पूरे हालात की जानकारी दी.

इधर, पार्टी के स्तर पर अमित शाह ने इस मुद्दे पर मोर्चा संभाला. उन्होंने जम्मू कश्मीर के मामले को देखने वाले विभिन्न पक्ष से बात की. आज सुबह उनसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने उनके आवास पर जाकर बैठक की. फिर अमित शाह ने जम्मू कश्मीर के सभी अहम भाजपा नेताओं के साथ बैठक की जिसमें यह फैसला लिया गया. राम माधव ने इस बड़े फैसले की जानकारी देते समय पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या का प्रमुखता से जिक्र किया और एक तरह से इस फैसले के एक पक्ष को उससे जोड़ने की कोशिश करते भी दिखे.

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