iPhone की जिद से हुआ दर्दनाक हादसा, कहीं आपकी परवरिश में तो नहीं ये 5 गलतियां?

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पैरेंटिंग टिप्स

बच्चों की हर जिद पूरी करना आगे चलकर परेशानी की वजह बन सकता है. महाराष्ट्र की एक दर्दनाक घटना ने पैरेंटिंग पर सवाल खड़े किए हैं. जानिए, माता-पिता बच्चों को बचपन से कौन-सी 5 बातें सिखाएं, ताकि वे जिद, गुस्से और निराशा को बेहतर तरीके से संभाल सकें.

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बच्चों की छोटी-छोटी जिद पूरी करना माता-पिता को कई बार आसान रास्ता लगता है. बच्चा रोया, गुस्सा किया और उसकी पसंद की चीज दिला दी. लेकिन हर बार ऐसा करने से बच्चे को धीरे-धीरे यह आदत लग सकती है कि जिद करके वह अपनी बात मनवा सकता है. खासकर महंगे मोबाइल, गैजेट और ब्रांडेड चीजों को लेकर बच्चों की मांग को सही तरीके से संभालना जरूरी है.

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महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, iPhone की जिद को लेकर एक युवक पहाड़ी के किनारे पहुंच गया. परिवार उसे समझाने की कोशिश करता रहा, लेकिन वह खाई में गिर गया. उसे बचाने की कोशिश में पिता भी नीचे गिर गए और इसके बाद मां ने भी छलांग लगा दी. इस घटना में तीन लोगों की जान चली गई. यह घटना बेहद दुखद है, लेकिन इसे सिर्फ बच्चे की जिद से जोड़कर देखना सही नहीं होगा. किसी भी गंभीर घटना के पीछे कई परिस्थितियां हो सकती हैं. फिर भी यह मामला माता-पिता को बच्चों की परवरिश और उनकी भावनाओं को संभालने के तरीके पर सोचने का मौका जरूर देता है.

बच्चों की परवरिश में ये 5 बातें जरूर सिखाएं

1. ‘ना’ सुनना सिखाएं

बच्चे को यह समझना जरूरी है कि हर बार उसकी पसंद के मुताबिक चीजें नहीं मिल सकतीं. किसी मांग के पूरी न होने पर नाराज होना सामान्य है, लेकिन गुस्से में चिल्लाना, धमकी देना या किसी को नुकसान पहुंचाना सही नहीं है. उसे छोटी-छोटी बातों में ‘ना’ सुनने और निराशा को संभालने की आदत डालें.

2. हर जिद तुरंत पूरी न करें

बच्चा रोए या गुस्सा करे और माता-पिता उसकी मांग तुरंत मान लें, तो उसे लग सकता है कि जिद करने से उसकी बात मानी जाएगी. इसलिए हर मांग पर तुरंत हां कहने के बजाय बच्चे को प्यार से समझाएं कि क्या संभव है और क्या नहीं. जरूरत हो तो उसकी बात का कोई दूसरा विकल्प भी दें.

3. बातचीत और जिम्मेदारी की आदत डालें

बच्चों से सिर्फ उनकी गलतियों पर बात न करें, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-बड़ी चीजों पर भी उनसे बातचीत करें. उनकी बातें सुनें और उम्र के हिसाब से घर के छोटे कामों की जिम्मेदारी दें. इससे बच्चे में आत्मनिर्भरता के साथ जिम्मेदारी की भावना भी बढ़ती है.

4. जरूरत और इच्छा का फर्क समझाएं

बच्चे को बचपन से बताएं कि हर पसंद की चीज जरूरी नहीं होती. नया फोन, महंगे कपड़े या गेमिंग डिवाइस पसंद हो सकते हैं, लेकिन हर बार उन्हें खरीदना जरूरी नहीं. परिवार का बजट और प्राथमिकताएं सरल भाषा में समझाने से बच्चे को चीजों की असली जरूरत समझने में मदद मिलती है.

5. पैसों की अहमियत बताएं

बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से पैसों की कीमत समझाना भी जरूरी है. उन्हें बताएं कि चीजें खरीदने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और हर चीज तुरंत नहीं खरीदी जा सकती. छोटी बचत करने की आदत डालने से भी बच्चे धीरे-धीरे पैसे और खर्च की अहमियत समझने लगते हैं.

अगर बच्चा लगातार बहुत आक्रामक व्यवहार करे या खुद को अथवा किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाने की बात करे, तो इसे सिर्फ जिद समझकर नजरअंदाज न करें. ऐसी स्थिति में किसी योग्य काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना बेहतर है.

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