ऑफिस में ज्यादा बोलने की गलती न करें, चाणक्य की ये नीति बताएगी कब जुबान रोकनी है

ऑफिस में बैठा एक इंसान और आचार्य चाणक्य, Pic Credit- Chatgpt
Chanakya Niti: कार्यस्थल पर सफलता केवल मेहनत से नहीं, बल्कि सही समय पर बोलने और चुप रहने की समझ से मिलती है. चाणक्य नीति के अनुसार जानिए ऑफिस में कब अपनी बात रखना जरूरी है और कब मौन ही सबसे बड़ा हथियार साबित होता है.
Chanakya Niti: कार्यस्थल पर सफलता केवल इंसान के मेहनत और योग्यता पर निर्भर नहीं करती है. बल्कि यह सही समय पर बोलने की कला और चुप रहने से ही मिलती है. अक्सर हम देखते हैं लोग दफ्तर या बिजनेस में कुछ भी बोलने की आदत होती है. उन्हें पता ही नहीं है किस परिस्थिति में क्या बोलना है और कब चुप रहना है. इससे उन्हें आगे चलकर नुकसान ही झेलना पड़ता है. चाणक्य नीति में इस विषय पर स्पष्ट रूप लिखा गया है जो आज के ऑफिस कल्चर में भी पूरी तरह प्रासंगिक है. आचार्य चाणक्य की मानें तो जो व्यक्ति हर समय बोलता है, उसकी बातों का महत्व धीरे-धीरे कम हो जाता है, वहीं सोच समझ कर सही वक्त पर बोलने वाले इंसान को लोग गंभीरता से सुनते हैं. यही संतुलन कार्यस्थल पर व्यक्ति को सम्मान, सफलता और स्थिरता देता है.
कार्यस्थल पर कब बोलना चाहिए और कब नहीं
चाणक्य नीति में साफ कहा गया है कि जब संगठन के हित समय या सत्य, न्याय के वक्त साथ न खड़े रहने वाला व्यक्ति कमजोर कड़ी रहता है. वहीं, कार्यस्थल पर यदि किसी निर्णय से नुकसान होने की संभावना हो, नियमों का उल्लंघन हो रहा हो या आपकी जिम्मेदारी से जुड़ा विषय हो, तो स्पष्ट और संयमित शब्दों में अपनी बात रखना जरूरी हो जाता है. सही समय पर दिया गया सुझाव कई बार बड़ी समस्या को टाल देता है.
कब चुप रहना ही समझदारी है
कार्यालय में हर बहस में शामिल होना या हर मुद्दे पर राय देना बुद्धिमानी नहीं मानी जाती है. चाणक्य के अनुसार, जब बात आपकी जिम्मेदारी से बाहर हो, भावनाओं में बहकर कही जा रही हो या सामने वाला सुनने की स्थिति में न हो, तब मौन ही सबसे बड़ा हथियार है. अनावश्यक प्रतिक्रिया अक्सर रिश्तों और छवि दोनों को नुकसान पहुंचाती है.
शब्दों से ज्यादा व्यवहार बोलता है
चाणक्य नीति में यह भी कहा गया है कि व्यक्ति की पहचान उसके शब्दों से ज्यादा उसके कर्म और आचरण से होती है. इसलिए दफ्तर में हमेशा इन गुणों को साथ लेकर चलना चाहिए. कार्यस्थल पर लगातार परिणाम देने वाला व्यक्ति कम बोलकर भी प्रभाव छोड़ देता है. वहीं, केवल बोलने पर जोर देने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे भरोसा खो देता है.
वरिष्ठों के सामने संयम है जरूरी
चाणक्य के अनुसार, वरिष्ठों या निर्णय लेने की स्थिति में बैठे लोगों के सामने बोलते समय भाषा और लहजे का विशेष ध्यान रखना चाहिए. कठोर शब्द सत्य को भी गलत बना सकते हैं, जबकि संयमित भाषा कठिन बात को भी स्वीकार्य बना देती है.
संतुलन ही सफलता की कुंजी
चाणक्य नीति का सार यही है कि न तो पूर्ण मौन और न ही अति-वाक्पटुता सफलता का रास्ता है. सही अवसर पर बोलना और गलत समय पर चुप रहना ही कार्यस्थल पर स्थायी सफलता और सम्मान दिलाता है.
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लेखक के बारे में
By Sameer Oraon
इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.
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