Knowledge Adda: BRICS करेंसी की राह में पहला कदम? डॉलर की अकड़ तोड़ने के लिए क्या है भारत, चीन और रूस का प्लान
BRICS देशों के प्रमुख नेताओं की फोटो (AI Generated)
Knowledge Adda: भारत BRICS देशों के बीच सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को जोड़ने का प्रस्ताव ला रहा है. इसका मकसद सीमा-पार भुगतानों को आसान और तेज बनाना है. क्या यह डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक अहम कदम है? इस आर्टिकल में जानें नई पहल का पूरा एनालिसिस.
Knowledge Adda: भारत में 12-13 सितंबर को हो रही BRICS बैठक के बीच एक बार फिर डॉलर और BRICS की अपनी करेंसी को लेकर चर्चा तेज है. इस चर्चा के बीच भारत की एक पहल खास ध्यान खींच रही है. भारत BRICS देशों की केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी सीबीडीसी को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है, ताकि देशों के बीच सीमा-पार भुगतान को आसान और तेज बनाया जा सके.
लेकिन यहां एक सवाल उठता है. क्या डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ने की यह कोशिश BRICS की अपनी कॉमन करेंसी की तरफ पहला कदम है? जवाब है - अभी इसे सीधे BRICS करेंसी कहना सही नहीं होगा. दरअसल, सीबीडीसी और कॉमन करेंसी दो अलग चीजें हैं. फिर भी दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी जरूर है - डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश. आज हम प्रभात खबर के अपने खास सेग्मेंट नॉलेज अड्डा में इसी विषय पर बात करने वाले हैं.

CBDC क्या है और BRICS से इसका क्या कनेक्शन है?
CBDC यानी Central Bank Digital Currency. आसान भाषा में समझें तो यह किसी देश की सरकारी करेंसी का डिजिटल रूप है. भारत का डिजिटल रुपया इसका उदाहरण है. इसे भारतीय रिजर्व बैंक जारी करता है और यह रुपये का ही डिजिटल रूप है.
यानी डिजिटल रुपया कोई क्रिप्टोकरेंसी नहीं है. इसके पीछे देश का केंद्रीय बैंक होता है. चीन के पास डिजिटल युआन और रूस के पास डिजिटल रूबल जैसी डिजिटल करेंसी की व्यवस्था है.
अब सवाल यह है कि इनका BRICS से क्या लेना-देना है?
मान लीजिए भारत और रूस के बीच कोई व्यापार होता है. अगर दोनों देशों की डिजिटल भुगतान व्यवस्थाएं इस तरह जुड़ जाएं कि भुगतान सीधे अपनी-अपनी करेंसी में हो सके, तो हर लेनदेन के लिए डॉलर को बीच में लाने की जरूरत कम हो सकती है.
यही वजह है कि भारत BRICS देशों की डिजिटल करेंसी को जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है. रूस भी BRICS देशों के साथ डिजिटल करेंसी के जरिए व्यापार भुगतान की संभावनाओं पर चर्चा कर रहा है.
क्या इससे डॉलर की ताकत को चुनौती मिलेगी?
यहां मामला थोड़ा दिलचस्प है. आज दुनिया के अंतरराष्ट्रीय कारोबार और भुगतान व्यवस्था में डॉलर की बड़ी भूमिका है. अगर BRICS देश आपस में अपनी-अपनी करेंसी में ज्यादा व्यापार करने लगते हैं और उनके भुगतान सिस्टम आपस में जुड़ते हैं, तो कुछ लेनदेन में डॉलर की जरूरत घट सकती है.
यानी बात यह नहीं है कि सीबीडीसी सीधे डॉलर को खत्म कर देगा. बात यह है कि देशों के पास भुगतान के लिए एक और रास्ता होगा.

भारत की मौजूदा पहल को इसी नजर से देखा जा सकता है. 2026 की BRICS बैठक से पहले भारत भुगतान प्रणालियों को जोड़ने और स्थानीय करेंसी में व्यापार को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है.
यह कोशिश अचानक शुरू नहीं हुई है. BRICS देश कई साल से अपनी-अपनी करेंसी में व्यापार और वित्तीय सहयोग बढ़ाने की बात करते रहे हैं. 2017 के शियामेन सम्मेलन में भी स्थानीय करेंसी में भुगतान, करेंसी स्वैप और वित्तीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया था. बाद के वर्षों में इसी चर्चा ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया - क्या BRICS की अपनी कॉमन करेंसी हो सकती है?
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लेकिन सीबीडीसी और BRICS करेंसी एक नहीं हैं
यही फर्क सबसे पहले समझना जरूरी है.
डिजिटल रुपया भारत की करेंसी का डिजिटल रूप है. डिजिटल युआन चीन की करेंसी का डिजिटल रूप है. डिजिटल रूबल रूस की करेंसी का डिजिटल रूप है.

इसके उलट कॉमन BRICS करेंसी का मतलब होगा कि सदस्य देशों के लिए एक अलग कॉमन करेंसी हो.
अभी ऐसी कोई BRICS कॉमन करेंसी लॉन्च नहीं हुई है. भारत भी इसके पक्ष में नहीं है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने अगस्त में साफ कहा था कि भारत BRICS की अलग करेंसी शुरू करने के किसी प्रस्ताव का समर्थन नहीं करता.
इसलिए सीबीडीसी को BRICS करेंसी की शुरुआत कहना सही नहीं होगा. इसे ज्यादा से ज्यादा ऐसे भुगतान ढांचे की दिशा में एक कदम माना जा सकता है, जिसमें सदस्य देश अपनी-अपनी करेंसी का इस्तेमाल ज्यादा आसानी से कर सकें.
फिर कॉमन BRICS करेंसी बनाना इतना मुश्किल क्यों है?

- पहली चुनौती - BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाएं और उनके हित एक जैसे नहीं हैं. इन देशों के बीच व्यापार का संतुलन भी अलग-अलग है.
- दूसरी चुनौती - भारत और चीन जैसे बड़े देशों के बीच रणनीतिक भरोसे का सवाल है. साझा व्यवस्था बनने पर यह तय करना होगा कि उसके नियम क्या होंगे और उसे चलाने में किसकी कितनी भूमिका होगी.
- तीसरी चुनौती - अलग-अलग देशों की डिजिटल करेंसी और भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ना आसान नहीं है. इसके लिए नियम, तकनीक, सुरक्षा और सीमा-पार पहचान जैसी कई चीजों पर सहमति चाहिए.
- चौथी चुनौती - व्यापार असंतुलन की है. अगर दो देशों के बीच व्यापार एकतरफा ज्यादा है, तो सिर्फ अपनी-अपनी करेंसी में भुगतान की व्यवस्था बना देना समस्या का पूरा समाधान नहीं करता. ऐसी स्थिति में करेंसी स्वैप जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत पड़ सकती है. BRICS की मौजूदा पहल के सामने यह भी एक चुनौती मानी जा रही है.
- और सबसे बड़ी चुनौती है - डॉलर की मौजूदा ताकत. दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में डॉलर और उससे जुड़े भुगतान नेटवर्क की गहरी पकड़ है. BRICS के लिए इसका विकल्प तैयार करना सिर्फ नई तकनीक बनाने का सवाल नहीं, बल्कि बहुत बड़े आर्थिक और वित्तीय ढांचे को खड़ा करने का मामला है.
क्या सीबीडीसी सच में डॉलर को चुनौती दे सकता है?
यही वह सवाल है जिस पर विशेषज्ञों की राय अहम हो जाती है. सीबीडीसी को आपस में जोड़ने से सीमा-पार भुगतान तेज और आसान हो सकता है. लेकिन क्या इससे डॉलर की वैश्विक भूमिका वास्तव में कमजोर होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने देश इसे अपनाते हैं, भुगतान व्यवस्था कितनी भरोसेमंद बनती है और BRICS देश अपनी-अपनी करेंसी में कितना व्यापार बढ़ा पाते हैं.
इसलिए फिलहाल इसे BRICS की नई करेंसी कहना जल्दबाजी होगी. असल बदलाव शायद इससे थोड़ा अलग है. BRICS देश ऐसी भुगतान व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें उन्हें हर बार डॉलर पर निर्भर न रहना पड़े. सीबीडीसी इस कोशिश को तकनीक दे सकती है, लेकिन कॉमन करेंसी बनाना उससे कहीं बड़ा और मुश्किल कदम होगा.
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