BRICS Summit 2026: चीन की EV ताकत के सामने भारत कितना तैयार? जानें ऑटो सेक्टर की पूरी तस्वीर

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भारत और चीन की इलेक्ट्रिक कारें चार्जिंग स्टेशन के साथ (फोटो: एआई/चैटजीपीटी)

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चीन आज EV बाजार, बैटरी मैन्युफैक्चरिंग और चार्जिंग नेटवर्क में भारत से काफी आगे है. हालांकि भारत भी तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपना रहा है. बड़े बाजार, बढ़ती EV डिमांड और मजबूत टू-व्हीलर इंडस्ट्री भारत की ताकत हैं.

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दुनिया में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और इस रेस में चीन सबसे आगे निकल चुका है. वहीं, भारत भी तेजी से इलेक्ट्रिक व्हीकल यानी EV की तरफ बढ़ रहा है. BRICS Summit 2026 के मौके पर भारत और चीन जैसे बड़े ऑटो बाजारों की तुलना करना काफी दिलचस्प है. सवाल यही है कि चीन की जबरदस्त EV ताकत के सामने भारत आखिर कितना तैयार है?

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EV के मामले में चीन कितना आगे?

चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक कार बाजार है. International Energy Agency यानी IEA के मुताबिक, चीन में साल 2025 में 1.3 करोड़ से ज्यादा इलेक्ट्रिक कारें बिकीं. देश में बिकने वाली नई कारों में करीब 55 परसेंट इलेक्ट्रिक थीं. इतना ही नहीं, साल 2025 में दुनिया में बनने वाली इलेक्ट्रिक कारों में चीन की हिस्सेदारी करीब 75 परसेंट रही.

चीन की ताकत सिर्फ गाड़ियों की बिक्री तक सीमित नहीं है. वहां BYD जैसे बड़े ब्रांड कम कीमत से लेकर प्रीमियम सेगमेंट तक कई तरह की EV बेच रहे हैं. बैटरी, मोटर और दूसरे जरूरी पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग भी चीन में बड़े स्तर पर होती है. यही वजह है कि वहां कंपनियां कम कीमत में ज्यादा फीचर्स और अच्छी रेंज वाली इलेक्ट्रिक गाड़ियां बनाने में सक्षम हैं.

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में भी चीन काफी आगे है. हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में करीब 2.3 करोड़ चार्जिंग पॉइंट हैं, जिनमें बड़ी संख्या घरेलू चार्जर की है.

भारत की तस्वीर क्या कहती है?

भारत अभी चीन से काफी पीछे है, लेकिन यहां EV बाजार तेजी से बढ़ रहा है. IEA के अनुसार, भारत में साल 2025 के दौरान कुल EV बिक्री रिकॉर्ड 23 लाख यूनिट तक पहुंच गई. वहीं, इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री 75 परसेंट से ज्यादा बढ़कर करीब 1.65 लाख यूनिट रही. हालांकि, कुल कार बिक्री में इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी अभी करीब 4 परसेंट ही है.

भारत की खास बात यह है कि यहां सिर्फ इलेक्ट्रिक कारों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा. देश में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर, ई-रिक्शा, थ्री-व्हीलर और इलेक्ट्रिक बसों का बाजार भी तेजी से बढ़ रहा है. भारतीय सड़कों और लोगों की जरूरतों को देखते हुए यह भारत की बड़ी ताकत बन सकती है.

सरकार भी बढ़ा रही है रफ्तार

भारत सरकार EV को बढ़ावा देने के लिए PM E-DRIVE Scheme चला रही है. इसका मकसद इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री बढ़ाना, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना और देश में EV मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना है. सरकार बैटरी, चार्जिंग और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर भी फोकस कर रही है.

इसके अलावा भारतीय ऑटो इंडस्ट्री में भी इलेक्ट्रिक गाड़ियों की रफ्तार बढ़ी है. SIAM के मुताबिक, FY 2025-26 में इलेक्ट्रिक पैसेंजर व्हीकल के रजिस्ट्रेशन में 80 परसेंट से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

भारत की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन जैसी मजबूत सप्लाई चेन तैयार करना है. EV बनाने के लिए बैटरी, रेयर अर्थ मैग्नेट और कई जरूरी इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स की जरूरत होती है. इन क्षेत्रों में चीन की पकड़ काफी मजबूत है.

दूसरी चुनौती चार्जिंग की है. बड़े शहरों में चार्जिंग नेटवर्क बढ़ रहा है, लेकिन छोटे शहरों और गांवों में अभी काफी काम बाकी है. इसके अलावा EV की कीमत भी आम खरीदार के लिए एक बड़ा मुद्दा है.

भारत कहां मजबूत है?

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका बड़ा बाजार है. यहां हर साल करोड़ों टू-व्हीलर बिकते हैं. अगर इलेक्ट्रिक स्कूटर और बाइक तेजी से आम लोगों तक पहुंचते हैं, तो भारत EV बाजार में बड़ी छलांग लगा सकता है.

Tata और Mahindra जैसी भारतीय कंपनियां इलेक्ट्रिक कारों पर तेजी से काम कर रही हैं. IEA के मुताबिक, भारत में साल 2025 में बिकने वाली इलेक्ट्रिक कारों में करीब 60 परसेंट घरेलू कंपनियों द्वारा बनाई गई थीं.

तो क्या चीन को टक्कर देने के लिए भारत तैयार है?

सीधा जवाब है, भारत अभी चीन के बराबर नहीं पहुंचा है, लेकिन तेजी से आगे बढ़ रहा है. चीन के पास मजबूत बैटरी सप्लाई चेन, सस्ता उत्पादन और बड़ा चार्जिंग नेटवर्क है. दूसरी तरफ भारत के पास बड़ा बाजार, तेजी से बढ़ती EV डिमांड और मजबूत टू-व्हीलर इंडस्ट्री है.

आने वाले सालों में असली मुकाबला सिर्फ इस बात का नहीं होगा कि कौन ज्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियां बेचता है. असली लड़ाई बैटरी बनाने, सस्ती EV तैयार करने, चार्जिंग नेटवर्क बढ़ाने और अपनी टेक्नोलॉजी विकसित करने की होगी. BRICS Summit 2026 के दौर में यह साफ है कि भारत EV रेस में शामिल तो हो चुका है, अब चुनौती चीन की रफ्तार के करीब पहुंचने की है.

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