तुम करो तो पुण्य और मैं करूं तो पाप?

।।सुरेंद्र किशोर।।
-समाचार विश्‍लेषण-
संसद ने सांसदों के खिलाफ़ टीम अन्ना की एक ताजा टिप्पणी की एकमत से मंगलवार को निंदा की. वह खास टिप्पणी निंदा के काबिल थी भी. पर, सांसदों के उस सर्वसम्मत वायदे की लगातार वादाखिलाफ़ी की निंदा कब यह संसद करेगी जो वायदा वर्ष 1997 में देश से किया गया था ?आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर संसद ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव में कहा था कि हम भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण को समाप्त करेंगे और चुनाव सुधार भी करेंगे.

यदि संसद, सांसद व अब तक की सरकारों ने इस दिशा में ठोस कदम आगे बढ़ाया होता तो आज अन्ना टीम उभर कर सामने आती ही नहीं. उसकी जरूरत ही नहीं पड़ती. पर इसके विपरीत हकीकत तो यह है कि आज देश में 1997 की अपेक्षा अधिक भ्रष्टाचार है.

राजनीति का अधिक अपराधीकरण हुआ है और चुनाव सुधार के अभाव में विधायिकाओं का स्वरूप व चरित्र भी बदलता जा रहा है. इन दिनों अनेक छोटे-बड़े नेतागण व जन प्रतिनिधि सदन के भीतर व बाहर एक दूसरे को चोर, उचक्का, बदमाश, हत्यारा, बलात्कारी और न जाने क्या-क्या नहीं कहते रहते हैं.1997 में हुए संसद के उस छह दिवसीय विशेष अधिवेशन में उस समय की दुरवस्था को लेकर जिस तरह की कड़ी टिप्पणियां खुद सांसदों ने की थीं, सामान्यत वैसी ही टिप्पणियां तो आज टीम अन्ना कर रही है.

पर इस पर इस देश की राजनीति की अधिकांश टीम अन्ना पर तमतमायी हुई है. यानी हम करें तो पुण्य और तुम करो तो पाप? इस देश की राजनीति आखिर आज कहां जा रही है ?नयी दिल्ली के जंतर-मंतर पर टीम अन्ना के धरने के दौरान सोमवार को की गयी एक आपत्तिजनक टिप्पणी पर संसद या यूं कहें कि अधिकतर सांसद तमतमा गये. टिप्पणी थी ही ऐसी. पर सवाल यह उठता है कि इसी संसद व उसके सदस्यों ने 15 साल में अपने ही उस सर्वसम्मत प्रस्ताव को कूड़ेदान में आखिर क्यों फ़ेंक दिया? इससे संसद या सांसदों की गरिमा बढ़ी? इस वादाखिलाफ़ी के लिए जनता का तमतमाना उचित नहीं होगा? संसद जनता से भी बड़ी है?आज देश की अधिकतर जनता इसलिए भी तमतमायी हुई है, क्योंकि इस बीच देश में 15 से भी अधिक महाघोटाले हो चुके हैं. और होते ही जा रहे हैं.

टीम अन्ना जनता के उसी तमतमाये तेवर को तो स्वर दे रही है. हां, स्वर कभी -कभी कर्कश हो जा रहे हैं. टीम अन्ना को उससे जरूर बचना चाहिए. पर अफ़सोसनाक स्थिति यह है कि घोटालों के आरोप बारी-बारी से इस बीच सत्ता में आये करीब-करीब सभी प्रमुख दलों के नेताओं पर लगे. इससे राजनीति की साख घटी या बढ़ी? इससे संसद और उसके सदस्यों की गरिमा व साख बढ़ी या घटी ? जैसा आप बोओगे, वैसा ही तो काटोगे. यदि साख घटी तो टीम अन्ना का भी तमतमाना कहां से गैर वाजिब है? अब जरा उस सर्वदलीय वायदे को एक बार फ़िर याद कर लिया जाए, जो इस देश के करीब-करीब सभी दलों के नेताओं ने संसद के ऊंचे मंच से पूरे देश के सामने किया था.

आजादी की स्वर्ण जयंती पर छह दिनों तक संसद का विशेष सत्र चला था. उसमें पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव से संबंधित खबर 2 सितंबर 1997 के अखबारों में छपी थी. खबर का इंट्रो इस प्रकार था, क्‍या संसद ने आज एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भारत के भावी कार्यक्रम के रूप में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया. प्रस्ताव में भ्रष्टाचार समाप्त करने, राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने के साथ-साथ चुनाव सुधार करने, जनसंख्या वृद्धि, निरक्षरता और बेरोजगारी को दूर करने के लिए जोरदार राष्ट्रीय अभियान चलाने का संकल्प किया गया. छह दिनों की चर्चा के बाद जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास किया गया, उसे अटल बिहारी वाजपेयी, इंद्रजीत गुप्त, सुरजीत सिंह बरनाला, कांशीराम, जार्ज फ़र्नाडीस, शरद यादव, सोमनाथ चटर्जी, एनवीएस चितन, मुरासोली मारन, मुलायम सिंह यादव, डॉ एम जगन्नाथ, अजित कुमार मेहता, मधुकर सरपोतदार, सनत कुमार मंडल, वीरेंद्र कुमार वैश्य, ओम प्रकाश जिंदल और राम बहादुर सिंह ने संयुक्त रूप से पेश किया था.यह प्रस्ताव आने की भी एक खास पृष्ठभूमि थी. वर्ष1996 में विभिन्न दलों की ओर से 40 ऐसे व्यक्ति लोक सभा के सदस्य चुन लिये गये थे, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे थे.

बिहार से चुने गये दो बाहुबली सदस्यों ने लोक सभा के अंदर ही एक दिन आपस में ही मारपीट कर ली. इस शर्मनाक व अभूतपूर्व घटना को लेकर अनेक बड़े नेता शर्मसार हो उठे और उन लोगों ने तय किया कि ऐसी समस्याओं पर सदन में विशेष चर्चा की जाए और इन्हें रोकने के लिए ठोस कदम उठाये जायें. इस विशेष चर्चा के दौरान सदन में कोई दूसरा कामकाज नहीं हुआ. वक्ताओं ने सदन में देशहित में भावपूर्ण भाषण किये. 65 घंटे तक चर्चा हुई. 218 सदस्य बोले. एक पर एक सदस्यों ने देश की गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता जतायी. पर, उसका नतीजा शून्य रहा. यानी वे भाषण घड़ियाली आंसू ही साबित हुए. उस के बाद 1998, 1999, 2004 और 2009 में लोक सभा के चुनाव हो चुके हैं. इस बीच भाजपानीत और कांग्रेसनीत सरकारें केंद्र में बनीं.

This Article Posted on: March 29th, 2012

pehle politics me aane ke liye certain conditions hone chahiye jisse ye saabit ho ki ye desh or desh ko logon ko first priority de.....

or kuch restrictions hona chahiye jisse inhe bussinessmen ke category se alag rakha ja sake...
kyunki agar ye desh seva me aana chahte hai to phir paise banane ki jarurat hi kya hai....

inlogon ko jine or rehne ke liye jindagi bhar govt facility deti hi hai phir itni property ki kya jarurat hai or rahi baat family banane ki toh ....

govt. aapko itni facilities provide karati hai ki ek chotta parivaar easily achche tarike se survive kar sake... inki property ki ek limitation bhi honi chahiye ki agar ishe cross karte hai to property ka 50-60% govt ko chala jayega.....

ish tarah ke limitation banakar shayad achche logo ko mauka diya ja sakta hai jo really me deshseva or lokseva karna chahte ho or jinka asli maksad jindagi me naam kamana ho apne achche work ke through or self satisfaction ke through.....

achche and intelligent log hi desh ka bhala kar sakte hai..

as a common person aisi bahut si baatein mujhe lagti hai jo honi chachiye so desh really me tarakki kar sake or ham really me ushpar naaz kar sake..... .

ajj ke neta (sab nahi) kuch log nishchit hi desh ki lutya dubo rahe hai, par kaddawar aur sahi neta bhi ishko manne ke liye taiyar nahi hai, sabhi netao ka pichle 15 years ka income source mangna chahiye , sab pol khul jayega,.............

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