बचपन से आप दुनिया का गलत मैप देखते आ रहे हैं? भारत समेत इन देशों का आकार असल में कितना है
मर्केटर और इक्वल अर्थ मैप (Photo/X)
आपका बचपन का नक्शा गलत था? संयुक्त राष्ट्र ने ऐसे नक्शों को मंजूरी दी जो देशों के वास्तविक क्षेत्रफल को सही दिखाते हैं. जानें Equal Earth मैप के बारे में.
अगर आप बचपन से दुनिया का नक्शा देखते आए हैं, तो एक बार फिर उसे गौर से देखिए. हो सकता है कि दुनिया के कई देशों और महाद्वीपों का आकार आपकी सोच से बिल्कुल अलग हो. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर को ऐसे नक्शों को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया है, जो देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दिखाते हैं. इस प्रस्ताव के तहत समान-क्षेत्रफल वाले नक्शों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही गई है. रॉयटर्स के मुताबिक प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट किया, जबकि अमेरिका ने इसका विरोध किया और 6 देश मतदान से दूर रहे.
मर्केटर World Map क्या दिखाता है?
स्कूलों और इंटरनेट पर लंबे समय से इस्तेमाल होने वाला मर्केटर प्रोजेक्शन (Mercator Projection) 1569 में जेरार्डस मर्केटर ने बनाया था. इसका मकसद दुनिया का सबसे सटीक क्षेत्रफल दिखाना नहीं, बल्कि समुद्री यात्राओं के दौरान दिशा और कोण को सही रखना था. समस्या यह है कि जैसे-जैसे कोई जगह भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर जाती है, नक्शे पर उसका आकार वास्तविकता से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है.
इसी वजह से ग्रीनलैंड और अफ्रीका पुराने नक्शे में लगभग एक जैसे आकार के नजर आते हैं, जबकि असल में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा है. अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3.03 करोड़ वर्ग किलोमीटर है.
Equal Earth मैप में क्या अलग है?
मर्केटर नक्शे में भूमध्य रेखा के करीब मौजूद अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे इलाके अपने वास्तविक आकार से छोटे दिखाई देते हैं. इसके उलट यूरोप, रूस और उत्तरी अमेरिका जैसे उत्तरी हिस्से अपेक्षाकृत बड़े नजर आते हैं.
नए Equal Earth प्रोजेक्शन में क्षेत्रफल को वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब रखने की कोशिश की गई है. इसका मतलब यह नहीं है कि भारत या किसी दूसरे देश की जमीन अचानक बड़ी या छोटी हो जाएगी. सिर्फ नक्शे पर उसका दिखाई देने वाला आकार बदलेगा. Equal Earth एक समान-क्षेत्रफल वाला नक्शा प्रोजेक्शन है, जिसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात को बनाए रखना है.
दक्षिण एशिया, जिसमें भारत भी शामिल है, पारंपरिक मर्केटर नक्शे की तुलना में नए प्रोजेक्शन में अपेक्षाकृत ज्यादा बड़ा दिखाई देगा. अल जजीरा के मुताबिक, Equal Earth प्रोजेक्शन में दक्षिण एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ओशिनिया पारंपरिक मर्केटर प्रोजेक्शन की तुलना में बड़े दिखाई देते हैं.
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पुराने और नए मैप में क्या फर्क है?
Mercator Map में
- भारत और दक्षिण एशिया अपने असली आकार से छोटे दिखाई देते हैं.
- यूरोप, रूस और उत्तरी अमेरिका अपने असली आकार से बड़े दिखते हैं.
- अफ्रीका वास्तविक आकार से काफी छोटा नजर आता है.
Equal Earth Map में
- भारत और दक्षिण एशिया ज्यादा सही आकार में दिखाई देते हैं.
- अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ओशिनिया वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखते हैं.
- यूरोप और उत्तरी हिस्से Mercator की तुलना में छोटे दिखाई देते हैं.
मर्केटर मैप अभी भी क्यों काम का है?
संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव किसी देश के लिए अनिवार्य नहीं है. यानी दुनिया भर में मर्केटर नक्शे पर रोक नहीं लगी है और न ही संयुक्त राष्ट्र ने किसी एक नक्शे को आधिकारिक तौर पर अनिवार्य किया है. प्रस्ताव सरकारों, स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और तकनीकी कंपनियों को ऐसे नक्शों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करता है, जो देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दिखाते हैं.
मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल समुद्री नेविगेशन जैसे कामों में अब भी उपयोगी है, क्योंकि यह दिशा और कोणों को सही रखने में मदद करता है. इसलिए नया प्रस्ताव पुराने नक्शे को हर इस्तेमाल में पूरी तरह बदलने के लिए नहीं है.
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नए मैप पर भारत का क्या रुख है?
भारत ने भी प्रस्ताव का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया है कि वह किसी एक खास नक्शे या प्रोजेक्शन का समर्थन नहीं कर रहा है. भारत ने कहा है कि समान-क्षेत्रफल वाले नक्शे जमीन के वास्तविक आकार को समझने के लिए उपयोगी हैं. साथ ही, भारत ने अपनी आधिकारिक सीमाओं को सही तरीके से दिखाने की जरूरत पर जोर दिया है.
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