अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 24 सितंबर को वॉशिंगटन में होने वाली मुलाकात पर दुनिया की नजर है. इस बैठक में टैरिफ और ट्रेड के साथ AI, एडवांस्ड चिप्स, रेयर अर्थ्स और सप्लाई चेन जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत होने वाली है.हालांकि भारत के लिए दोनों देशों के राष्ट्रपतियों की मुलाकात से ज्यादा अहम ये है कि अमेरिका-चीन के बीच AI, एडवांस्ड चिप्स, रेयर अर्थ्स और सप्लाई चेन को लेकर क्या डील होती है और उसका असर भारत पर कितना पड़ सकता है? डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात अहम क्यों है?डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात ऐसे समय में हो रही है, जब न्यूयॉर्क में हुई एक बैठक के बाद दोनों देशों ने अमेरिका-चीन AI डायलॉग शुरू करने पर सहमति जताई है. अमेरिका और चीन के बीच एआई की होड़ अब सिर्फ टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं है. दोनों देश इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ रहे हैं. हालिया बातचीत में अमेरिका ने चीन के सामने AI से जुड़ी ऐसी घटनाओं के लिए एक नोटिफिकेशन सिस्टम का प्रस्ताव रखा है, जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है. इसका मकसद दोनों देशों के बीच एआई से जुड़े जोखिमों को लेकर सूचना साझा करने का रास्ता बनाना है. हालांकि, इसे अभी अमेरिका-चीन का फाइनल AI सेफ्टी समझौता नहीं कहा जा सकता क्योंकि फिलहाल बातचीत के दौरान रखा गया प्रस्ताव है. एआई की दूसरी बड़ी कड़ी एडवांस्ड चिप्स हैं. दुनिया के सबसे शक्तिशाली AI सिस्टम को चलाने के लिए बेहद ताकतवर चिप्स की जरूरत होती है और अमेरिका लंबे समय से चीन की एडवांस्ड सेमीकंडक्टर तक पहुंच को सीमित करने की कोशिश कर रहा है. AI और एडवांस्ड चिप्स के अलावा अमेरिका और चीन के बीच व्यापार और महत्वपूर्ण खनिजों यानी क्रिटिकल मिनरल्स का मुद्दा भी बातचीत में शामिल रही. जिसको लेकर दोनों पक्षों ने पहले से चर्चा में रहे बोर्ड ऑफ ट्रेड को आगे बढ़ाने की दिशा में भी काम किया है. ऐसे में जब अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की इस सप्ताह वॉशिंगटन में मुलाकात होनी है तो उससे पहले न्यूयॉर्क की बैठक को दोनों देशों के बीच लंबित आर्थिक और तकनीकी मुद्दों पर बातचीत की जमीन तैयार करने के तौर पर देखा जा रहा है. AI और चिप्स को लेकर अमेरिका-चीन की डील का भारत पर क्या होगा असर?अगर अमेरिका और चीन के बीच एडवांस्ड एआई चिप्स को लेकर नियम कुछ आसान होते हैं, तो ग्लोबल टेक सप्लाई चेन में अनिश्चितता कम हो सकती है. इससे चिप्स और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम करने वाली कंपनियों के लिए कारोबार की योजना बनाना आसान हो सकता है. लेकिन अगर अमेरिका चीन पर चिप प्रतिबंध और कड़े करता है, तो यह तस्वीर बदल सकती है. कंपनियां चीन से बाहर नई मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन तलाश सकती हैं. ऐसी स्थिति में भारत को सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में नए निवेश मिलने का मौका मिल सकता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत तुरंत चीन या ताइवान की सेमीकंडक्टर क्षमता की जगह ले सकता है. एडवांस्ड चिप बनाने के लिए सिर्फ फैक्ट्री नहीं, बल्कि खास मशीनें, कच्चा माल, पैकेजिंग, तकनीक और कुशल लोगों का पूरा इकोसिस्टम चाहिए, जो भारत के लिए असली चुनौती होगी. अब बात रेयर अर्थ्स की, जहां चीन की पकड़ बहुत मजबूत हैअगर एआई चिप्स अमेरिका की बड़ी ताकत हैं, तो रेयर अर्थ्स चीन की बड़ी सप्लाई चेन ताकत हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA के मुताबिक 2024 में चीन के पास मैग्नेट बनाने वाले रेयर अर्थ्स की दुनिया की करीब 60 फीसदी माइनिंग, 91 फीसदी रिफाइनिंग और 94 फीसदी परमानेंट मैग्नेट उत्पादन की हिस्सेदारी थी. यानी चीन की ताकत सिर्फ खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि कच्चे माल को प्रोसेस करके तैयार मैग्नेट बनाने तक फैली हुई है. इन मैग्नेट का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल, विंड टर्बाइन, इंडस्ट्रियल मोटर, इलेक्ट्रॉनिक्स और कुछ एआई डेटा सेंटर से जुड़े उपकरणों में भी होता है. इसलिए चीन से रेयर अर्थ्स की सप्लाई में किसी तरह की रुकावट का असर कई उद्योगों तक पहुंच सकता है. IEA के के मुताबिक, अगर चीन के दुर्लभ मृदा तत्वों पर लगाए गए निर्यात नियंत्रण पूरी तरह लागू होते हैं, तो चीन के बाहर हर साल करीब 6.5 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग 580 लाख करोड़ रुपये की डाउनस्ट्रीम उत्पादन गतिविधि जोखिम में पड़ सकती है.IEA के अनुसार ऑटोमोबाइल क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है, जहां चीन के बाहर 3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का संभावित प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान हो सकता है. इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, परिवहन, रक्षा और डेटा केंद्र जैसे क्षेत्र भी इसकी चपेट में आ सकते हैं. डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की डील से भारत को फायदा होगा या जोखिम?यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देशों के बीच समझौता किस दिशा में जाता है. अगर अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ और रेयर अर्थ्स को लेकर तनाव कम होता है, तो ग्लोबल सप्लाई चेन में स्थिरता आ सकती है. इससे भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो कंपनियों के लिए जरूरी सामान की उपलब्धता बेहतर हो सकती है.दूसरी तरफ, अगर चीन रेयर अर्थ्स पर निर्यात नियंत्रण कड़ा करता है या अमेरिका-चीन के बीच टेक्नोलॉजी तनाव बढ़ता है, तो कंपनियां चीन के बाहर सप्लायर तलाशेंगी. यहां भारत के लिए मौका बन सकता है. यानी चीन से सप्लाई हटने की स्थिति भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी. अवसर इसलिए क्योंकि ग्लोबल कंपनियां नई जगह निवेश कर सकती हैं. चुनौती इसलिए क्योंकि भारत खुद अभी कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के लिए आयात पर निर्भर है. भारत के लिए सबसे बड़ा मौका चीन प्लस वन रणनीति में है. अगर अमेरिकी, यूरोपीय और एशियाई कंपनियां चीन के अलावा दूसरी जगह सप्लाई चेन बनाना चाहती हैं, तो भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपोनेंट और रेयर अर्थ मैग्नेट जैसे क्षेत्रों में निवेश आकर्षित कर सकता है. लेकिन इसके लिए सिर्फ असेंबली बढ़ाना काफी नहीं होगा. भारत को कंपोनेंट, कच्चे माल, रिफाइनिंग, मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में अपनी क्षमता बढ़ानी होगी. ये भी पढ़ें: AI की इस गलती से हो सकता था अमेरिका-चीन में जंग...फिर ऐसे टला संकट, समझिए क्यों जरूरी है ह्यूमन इंटेलिजेंस