रूस-यूक्रेन युद्ध का असर अब सिर्फ यूक्रेन की सीमा तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि रूस की अगली नजर अब NATO देशों पर है. ऐसा कहना है पोलैंड का. पोलैंड ने आशंका जताई है कि रूस, यूक्रेन का समर्थन कर रहे NATO देशों के खिलाफ हाइब्रिड हमले की तैयारी कर सकता है. वहीं फ्रांस ने भी अपने महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे(Critical Infrastructure)और रक्षा प्रतिष्ठानों (Defence Establishments) की सुरक्षा बढ़ाने का फैसला किया है। ऐसे में अहम सवाल ये है कि क्या सच में रूस NATO देशों पर हाइब्रिड युद्ध की तैयारी कर रहा है?अगर हां तो हाइब्रिड युद्ध क्या है और फ्रांस समेत यूरोप की चिंता क्यों बढ़ रही है. पहले समझते हैं, पोलैंड को किस बात का डर है?पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने संसद में दावा कि उन्हें एक खुफिया जानकारी मिली है. जिसमें रूस की तरफ से पोलैंड पर ड्रोन और अन्य मिसाइल हमलों से जुड़े संभावित हाइब्रिड हमलों का खतरा है. डोनाल्ड टस्क ने यह चिंता खास तौर पर NATO के पूर्वी हिस्से में मौजूद देशों को लेकर जाहिर की है. टस्क के मुताबिक, अगर कोई ड्रोन या मिसाइल NATO के इलाके में पहुंचती है, तो रूस उसे दुर्घटना बताकर अपनी जिम्मेदारी से इनकार करने की कोशिश कर सकता है.ऐसी स्थिति में NATO के सामने यह तय करना मुश्किल होगा कि घटना जानबूझकर की गई थी या नहीं. पोलैंड के अनुसार यह सिर्फ उसके सीमा सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि NATO की सामूहिक सुरक्षा की परीक्षा है. हालांकि, अभी तक ऐसी किसी रूसी योजना के सार्वजनिक रूप से प्रमाणित होने की बात सामने नहीं आई है. टस्क का बयान एक खुफिया आकलन पर आधारित चेतावनी है. हाइब्रिड हमला होता क्या है?हाइब्रिड युद्ध का मतलब सिर्फ बम, मिसाइल और सैनिकों से हमला करना नहीं है. इसमें सैन्य और गैर-सैन्य तरीकों को मिलाकर दबाव बनाया जाता है. इसमें ड्रोन, साइबर हमले, तोड़फोड़, दुष्प्रचार, राजनीतिक हस्तक्षेप और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना शामिल हो सकता है. ये भी पढ़ें: 6000 नॉटिकल मील की रेंज, 98 मीटर लंबा...कितना ताकतवर है भारतीय वॉरशिप को टक्कर मारने वाला PNS हुनैन?फ्रांस ने क्यों बढ़ाई सुरक्षा?फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी 18 सितंबर को कहा था कि यूरोप और फ्रांस के सामने रूसी हाइब्रिड खतरा हाल के दिनों में बढ़ा है. इसके बाद उन्होंने सरकार को महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और रक्षा उद्योग से जुड़े संवेदनशील स्थानों की सुरक्षा के लिए योजना तैयार करने को कहा. इस योजना में ड्रोन और साइबर हमलों से सुरक्षा पर खास जोर है. फ्रांस ने विदेशी हस्तक्षेप और साइबर गतिविधियों से निपटने की अपनी व्यवस्था मजबूत करने की बात भी कही है. मैक्रों ने जर्मनी के लीपजिग हवाई अड्डे की कथित घटना समेत यूरोप में हुई कई घटनाओं का जिक्र किया. हालांकि ऐसी घटनाओं में रूस की भूमिका को लेकर सभी मामलों में सार्वजनिक प्रमाण और आरोपों की स्थिति एक जैसी नहीं है. इसलिए हर घटना को सीधे रूसी हमला मानना सही नहीं होगा. तो क्या NATO और रूस के बीच युद्ध होने वाला है?बीते कुछ दिनों में NATO ने अपनी पूर्वी सीमा पर सुरक्षा और निगरानी जरूर बढ़ाई है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि NATO ने रूस के साथ सीधे युद्ध की घोषणा कर दी है. NATO के मुताबिक उसकी पूर्वी हिस्से में सैन्य गतिविधियां रक्षात्मक प्रकृति (Defensive military activities) की हैं और उसका उद्देश्य सदस्य देशों की सुरक्षा तथा किसी संभावित खतरे को रोकना है. दरअसल पोलैंड और फ्रांस की चिंता ड्रोन या मिसाइल के NATO क्षेत्र में पहुंचने पर उसकी मंशा और स्रोत को लेकर है. आसान भाषा में कहें तो सवाल ये है कि अगर घटना होती है तो वो दुर्घटनावश या जानबूझकर माना जाएगा?इसलिए, फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि NATO और रूस के बीच युद्ध होने वाला है.ये भी पढ़ें: पाकिस्तान को मिल गया अमीर होने का फॉर्मुला! विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर, 26.79 अरब डॉलर पहुंचा रिजर्वपोलैंड-फ्रांस की चिंता और NATO-रूस की युद्ध की असली तस्वीर क्या है?इस पूरे घटनाक्रम को तीन हिस्सों में समझना सबसे आसान है. पहला, रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है और इसका सुरक्षा असर पूरे यूरोप पर पड़ रहा है. दूसरा, यूरोपीय सरकारें ड्रोन, साइबर हमलों, तोड़फोड़ और अन्य हाइब्रिड गतिविधियों को लेकर अपनी तैयारी बढ़ा रही हैं. तीसरा, रूस द्वारा NATO देश पर आसन्न बड़े हमले की सार्वजनिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. इसलिए मौजूदा स्थिति को यूरोप में नया युद्ध शुरू हो गया कहने से ज्यादा सटीक ये है कि यूरोप संभावित रूसी हाइब्रिड गतिविधियों को गंभीर सुरक्षा चुनौती मानकर अपनी तैयारी बढ़ा रहा है और NATO भी हवाई रक्षा, साइबर सुरक्षा, खुफिया साझेदारी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को मजबूत कर रहा है.