हर दिन 6,766 लीटर इंसानी पेशाब से पिघल रहा ग्लेशियर! नेपाल में बाढ़ से क्या है इसका कनेक्शन?
Author गौतम कुमार
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ग्लोबल वार्मिंग के अलावा, एवरेस्ट बेस कैंप पर पर्वतारोहियों के पेशाब से भी ग्लेशियर पिघलने का दावा किया गया है। जानिए इस चौंकाने वाली रिसर्च का सच और असली वजह।
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ग्लेशियर पिघलने की बात आते ही सबसे पहले ग्लोबल वार्मिंग का नाम सामने आता है.लेकिन एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले(Mountaineers) से जुड़ी एक रिसर्च ने ग्लेशियर पिघलने की बहस में एक चौंकाने वाला पहलू सामने रखा है.
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वैज्ञानिकों के मुताबिक एवरेस्ट बेस कैंप पर पर्वतारोहियों के पेशाब से निकलने वाली गर्मी भी बर्फ पिघलने का कारण है. अनुमान है कि 2023 के एक क्लाइंबिंग सीजन (चढ़ाई के मौसम) में करीब 154 टन बर्फ पिघलने के बराबर ऊर्जा पैदा हुई.
बेस कैंप पर हर साल लगते हैं 1,600 टेंट
- एवरेस्ट का बेस कैंप चढ़ाई के मौसम में एक छोटे शहर जैसा नजर आने लगता है.
- यहां हर साल बड़ी संख्या में पर्वतारोही, शेरपा, गाइड और दूसरे कर्मचारी पहुंचते हैं. करीब 1,600 टेंट वाले इस कैंप में खाना पकाने से लेकर गर्म पानी, बिजली, इंटरनेट और दूसरी सुविधाओं का इंतजाम किया जाता है.
- इन सुविधाओं को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में ईंधन जलता है. इससे पैदा होने वाली गर्मी आसपास के वातावरण और ग्लेशियर पर अतिरिक्त दबाव डालती है.
- रिसर्च में 2023 के क्लाइंबिंग सीजन के दौरान रोजाना करीब 6,766 लीटर पेशाब पैदा होने का अनुमान लगाया गया. शरीर से निकलते समय इसका तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस होता है.
- वैज्ञानिकों ने इसी गर्मी की गणना करते हुए यह अनुमान लगाया कि सीजन के दौरान पेशाब से निकलने वाली ऊर्जा करीब 154 टन बर्फ पिघलाने के बराबर हो सकती है.
पेशाब से ज्यादा खतरनाक है ईंधन का इस्तेमाल
- हालांकि बेस कैंप पर बर्फ पिघलाने वाली मानवीय गतिविधियों में पेशाब का योगदान सबसे बड़ा नहीं है.
- 2023 में खाना पकाने, हीटिंग और बिजली के लिए करीब 824 एलपीजी सिलेंडर, 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर पेट्रोल इस्तेमाल हुआ.
- रिसर्च के मुताबिक इंसानी गतिविधियों से पैदा होने वाली कुल गर्मी में करीब 94 फीसदी योगदान ईंधन का, जबकि लगभग 6 फीसदी योगदान पेशाब का था.
हिमालय में ग्लेशियर क्यों पिघल रहे हैं?
- पूरे हिमालय की बात करें तो ग्लेशियर पिघलने का सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन है.
- तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार भी बढ़ रही है.
- 2019 में प्रकाशित एक रिसर्च में 650 से ज्यादा हिमालयी ग्लेशियरों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था.
- इसमें सामने आया कि 2000 के बाद ग्लेशियरों के बर्फ पिघलने की रफ्तार पिछली अवधि की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई थी.
क्या है इस समस्या का निदान
- रिसर्चरों का कहना है कि अगर ग्लेशियर पर हर साल हजारों लोग पहुंच रहे हैं और उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में ईंधन जलाया जा रहा है, तो स्थानीय पर्यावरण पर इसका असर कम करना जरूरी है.
- इसके लिए सौर ऊर्जा जैसे साफ विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है. वेस्ट मैनेजमेंट बेहतर किया जा सकता है और भविष्य में बेस कैंप को ग्लेशियर से ज्यादा स्थिर जगह पर ले जाने पर भी विचार किया जा सकता है.
- यानी एवरेस्ट का ग्लेशियर सिर्फ पर्वतारोहियों के पेशाब से नहीं पिघल रहा.असली खतरा बढ़ता तापमान है.
नेपाल में बाढ़ से क्या है इसका कनेक्शन?
- नेपाल में अगस्त 2026 में ग्लेशियर से जुड़ी भयावह घटना के बाद आई बाढ़ में 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हैं. रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के ढहने से पानी, बर्फ और मलबे की तेज धारा बनी, जिसने नदी घाटियों में भारी तबाही मचाई.
- लेकिन इस आपदा को सीधे एवरेस्ट बेस कैंप के पेशाब या वहां इस्तेमाल हुए ईंधन से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा. दोनों घटनाओं के बीच बड़ा संदर्भ तेजी से बदलता हिमालयी जलवायु तंत्र और ग्लेशियरों की बढ़ती अस्थिरता है.
- नई रिसर्च का संदेश भी यही है कि अगर किसी ग्लेशियर पर हर साल हजारों लोग जमा होते हैं और वहां खाना, बिजली, गर्म पानी और दूसरी सुविधाओं के लिए बड़ी मात्रा में ईंधन जलता है, तो उस स्थानीय पर्यावरणीय दबाव को कम करना जरूरी है.
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