कला भवन, शांतिनिकेतन के सौ वर्ष

Updated at : 01 Sep 2019 2:53 AM (IST)
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कला भवन, शांतिनिकेतन के सौ वर्ष

मनीष पुष्कलेपेंटर यह शांतिनिकेतन में कला भवन का शताब्दी वर्ष है. जिसके उपलक्ष्य में इस वर्ष वहां कलाओं पर केंद्रित अनेक कार्यक्रम, परिचर्चाएं, प्रदर्शिनियां, शिविर आदि के आयोजन हो रहे हैं. शांतिनिकेतन की उर्वरता और उसके अभूतपूर्व योगदान से हम भली-भांति परिचित हैं. वहां अब बंगाल के लगभग सभी प्रमुख कलाकारों के स्टूडियो या घर […]

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मनीष पुष्कले
पेंटर

यह शांतिनिकेतन में कला भवन का शताब्दी वर्ष है. जिसके उपलक्ष्य में इस वर्ष वहां कलाओं पर केंद्रित अनेक कार्यक्रम, परिचर्चाएं, प्रदर्शिनियां, शिविर आदि के आयोजन हो रहे हैं. शांतिनिकेतन की उर्वरता और उसके अभूतपूर्व योगदान से हम भली-भांति परिचित हैं. वहां अब बंगाल के लगभग सभी प्रमुख कलाकारों के स्टूडियो या घर हैं. उसी कड़ी में प्रख्यात चित्रकार और राज्यसभा सदस्य जोगेन चौधरी ने भी वहां पर ‘संवाद’ नाम की एक संस्था बनायी है.
इस संस्था का मूल उद्देश्य शांतिनिकेतन के कलाकारों को आधुनिक चेतना की मुख्यधारा से जोड़े रखना है. एक बेहतरीन शिक्षक के रूप में जोगेन चौधरी का बड़ा योगदान रहा है, लेकिन उसके साथ एक कलाकर्मी के रूप में वे अब अन्य भूमिका में भी हैं. जोगेन ने कला भवन के शताब्दी पर्व के अंतर्गत कलकत्ता के बड़े संग्राहक प्रशांत तुलसियान के सहयोग से पिछले दिनों एक कला शिविर का आयोजन किया था.
शांतिनिकेतन की अपनी पहली इस यात्रा में तत्काल ही मुझे यह अंदेशा हुआ कि कला भवन के अप्रतिम योगदान से वहां के समाज में बसता सौंदर्यबोध अभी तक अतुलनीय है, और वहां की फिजा में अब भी परंपरा और आधुनिकता के परस्पर सार्थक मेल से सही ‘भारतीयता’ का अहसास होता है.
साल 1913 में गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला था, जिसकी पुरस्कार राशि से 1919 में उन्होंने इस भवन की स्थापना की थी. गुरुदेव टैगोर ने बंगाल कला स्कूल के संस्थापक, अबनींद्रनाथ टैगोर के प्रमुख शिष्य नंदलाल बसु को इस कला भवन की कमान सौंपी थी. जिसके कारण कला भवन से हमें राम किंकर बैज, बिनोद बिहारी मुखर्जी के अलावा अनेकों मूर्धन्य कलाकार मिले. भारतीय कलाओं के संरक्षण व संवर्धन में टैगोर बंधुओं ने जो कुछ किया है, वह अब इतिहास है और अब हम सभी उस से अच्छी तरह से वाकिफ हैं.
उन्होंने स्थानीय कलाकारों को अपनी परंपराओं और उनकी विशेषताओं की ओर आकर्षित तो किया, साथ ही उन्होंने इस बात पर भी गहरा विमर्श स्थापित किया कि पारंपरिक आकर्षण में कहीं उन कलाकारों का मानस उस समय में प्रचलित एक विशेष प्रकार के यथार्थवाद के प्रतिपालन की चक्की में न पिस जाये. इसलिए उन्होंने उन्हें कलाओं में स्वयं के विवेक, विशेष अंतर्ज्ञान का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्होंने किसी विशिष्ट सिद्धांत का प्रचार प्रसार नहीं किया.
शास्त्रीय शिल्प कला में विन्यस्त कलात्मक ‘भारतीयता’ के अध्ययन के दौरान, उसकी प्रस्तावना में अबनींद्रनाथ एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं. वे कहते हैं कि ‘कला, शास्त्र के महिमामंडन या पैरवी के लिए नहीं है; लेकिन शास्त्र, कला की व्याख्या के लिए जरूर है’. इसके पहले रबींद्रनाथ कह ही चुके थे कि ‘परंपराओं के डर से उपजा शिष्टाचार अपरिपक्वता का प्रतीक है’.
इसके साथ ही गुरुदेव यह भी कहते हैं कि ‘मैं कलाकारों से दृढ़तापूर्वक आग्रह करता हूं कि वे पुरानी रीतिवादी पद्धति के अनुसार भारतीय कला के रूप में चस्पा किये जानेवाले आग्रहों को इनकार करें. कला कोई ऐसी भव्य कब्र नहीं है जो अचल है, जो वर्षों से एकांत में अपनी शाश्वत्ता की विलुप्ति के उहापोह में मग्न है.
कला तो जीवन के जुलूस के अंतर्गत आती है और आश्चर्य के साथ नैरंतर्य का समायोजन करती है. वह तो भविष्य की तीर्थयात्रा के लिए वर्तमान में वास्तविकता के अज्ञात तीर्थों की खोज कर रही है, जिसके रास्ते अतीत से वैसे ही अलगा जाते हैं, जैसे किसी बीज से एक पेड़’. टैगोर, अपनी परंपराओं को ठीक से जानते थे, उन्होंने उनका गहन अध्ययन किया था, अपनी विचारधारा में उन्हें ईबी हाॅवेल और आनंद कुमारस्वामी के साथ ओकाकुरा काकुजो के विमर्श वैशिष्ठ्य से प्रेरक सहायता मिली थी.
सुखद है कि कला भवन के युवाओं को काम करते हुए देखना एक प्रकार से उसके मूलभूत उद्देश्य को जीवित देखना है. वहां के युवा कलाकार देश और दुनिया में कला के विभिन्न ट्रेंड से भली-भांति परिचित हैं, लेकिन दुखद है कि वहां के अनेक विद्यार्थियों को उस ‘लालित्य तत्व’ का भान तक नहीं है, जिसकी प्रेरणा कला भवन की उसी माटी से कभी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को मिली थी. जिस ‘शब्द’ के प्रभाव से गुरुदेव टैगोर ने ‘रूप’ के संबंध-संवर्धन के लिए कला भवन स्थापित किया था, उसका प्रांगण उनके परस्पर विच्छेद से बिखर भी रहा है.
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