बच्चों को अक्षर दान में जुटा सेवा फाउंडेशन

Updated at : 22 Jun 2014 1:00 PM (IST)
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बच्चों को अक्षर दान में जुटा सेवा फाउंडेशन

सुजीत कुमार हमारे लिए ‘सेवा परम धर्म’ मूल मंत्र है. बच्चों को सही दिशा में ले जाने वाला शिक्षा मिले, वह सफल हो, जीवन के गति के साथ खुद को ढ़ालने में सक्षम हो, तब समझूंगा, मनुष्य योनि में जन्म लेना सफल हो गया. यह कहना है प्रदीप कौशिक का. झारखंड के देवघर में ‘सेवा […]

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सुजीत कुमार

हमारे लिए ‘सेवा परम धर्म’ मूल मंत्र है. बच्चों को सही दिशा में ले जाने वाला शिक्षा मिले, वह सफल हो, जीवन के गति के साथ खुद को ढ़ालने में सक्षम हो, तब समझूंगा, मनुष्य योनि में जन्म लेना सफल हो गया. यह कहना है प्रदीप कौशिक का. झारखंड के देवघर में ‘सेवा फाउंडेशन’ के नाम से संस्था चला रहे प्रदीप कौशिक समाज के उन तबकों के बच्चों के बीच में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं, जो शिक्षा की रोशनी से अभी तक वंचित हैं.

सहयोग से पड़ी नींव
देवघर के मोहनपुर पंचायत के कविलासपुर क्षेत्र के अगल-बगल के इलाकों के बच्चों के लिये 14 जनवरी सन् 2012 को इस संस्था की नींव रखी गयी. इसमें हमारे जैसे की कुछ साथियों ने मदद की. इस इलाके का चुनाव इसलिए किया गया कि यहां के बच्चे शिक्षा से कोसों दूर थे. इरादा बस एक ही था कि इन्हें ऐसी शिक्षा दी जाए कि वे अपनी जिंदगी को अपनी सोच के हिसाब से आकार दे सके. चूंकि पहले भी सन् 2003 में हमने पाकुड़ जिले में संताल और पहाड़िया आदिवासियों के बीच पढ़ाई, दवाई और सिंचाई जैसे मुद्दों पर काम किया था. अत: मन में यही था कि यहां भी इन क्षेत्रों के लिए ही काम करूंगा. प्रदीप कौशिक बताते हैं कि उस वक्त वरुण रजक, शीलवंत हांसदा, मीना फ्लोरा हांसदा, साहेब हांसदा ने सहयोग किया था. आज भी सेवा फाउंडेशन के स्कूलों में इनका सहयोग बरकरार है.

शिक्षा के लिए तय किये मानक
प्रदीप कौशिक बताते हैं, इससे पहले भी एनजीओ के द्वारा रजिस्ट्रेशन करवाने की परंपरा चलती आ रही है. ट्रस्ट को पंजीकृत करवाना अनिवार्य था, लेकिन हमने कुछ मानक स्वयं तय किये. हमने इस बात का फैसला किया कि सेवा फाउंडेशन किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार का कोई भी सरकारी फंड नहीं लेगा और ना ही कभी लेने की कोशिश करेगा. जो काम होगा, वह आपसी सहयोग से होगा. इसका व्यापक असर देखने को मिला. मदद के हाथ खुद ब खुद बढ़ने लगे. किसी ने दो महीने के लिए शिक्षकों का वेतन देने की बात कही, तो किसी ने बच्चों के शिक्षा के लिए आवश्यक सामग्री देने में रुचि दिखाई. बच्चों के दाखिले को लेकर भी संस्थान के अपने मानक हैं. प्री-नर्सरी में दाखिले के वक्त हम इस बात का ख्याल रखते हैं कि उस बच्चे को ही स्थान मिले, जिसे वास्तव में इसकी जरूरत है. जितने बच्चों का नाम दाखिले के लिए आता है, उनके घरों का निरीक्षण, परिवारिक परिवेश, आर्थिक हालात आदि की जानकारी ली जाती है. इन सारे मानकों को देखने के बाद ही नामांकन होता है.

बच्चों का प्रदर्शन शानदार
इस फाउंडेशन के जरिये शिक्षा पाने और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे स्कूलों में नामांकन करने वाले छात्रों का प्रदर्शन शानदार है. कई उच्च विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर रहे यहां से गये बच्चों ने निरंतर प्रगति की तरफ अग्रसर हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे लिट्टीपाड़ा उच्च विद्यालय में अध्ययनरत हैं.

मजबूत नींव रखने की पहल
इन बच्चों को शिक्षा देने के साथ इनमें संस्कार की भी नींव मजबूत हो सके, इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है. प्रदीप जी बताते हैं, जागृति लाने का माध्यम केवल शिक्षक कर सकते हैं, लेकिन संस्कार व परोपकार की भावना को इन छोटे बच्चों में कैसे बलवती की जाए, इसकी पहल सेवा फाउंडेशन करता है. अपने आस-पास के लोगों से सहयोग रखने की भावना से लेकर जीव-जंतुओं पर दया करने की भी शिक्षा दी जाती है. साथ ही शाकाहार के प्रति भी बच्चों को जागरूक किया जाता है.

बह रही बदलाव की बयार
सेवा संस्थान के द्वारा जगायी जा रही शिक्षा की अलख के बारे में प्रदीप जी बताते हैं, इस स्कूल में अधिकांश बच्चे अभिवंचित वर्ग से आते हैं. संस्थान में प्री- नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी, स्टैंडर्ड वन, टू और थ्री तक की शिक्षा एकदम मुफ्त में दी जाती है. इन बच्चों को आठ शिक्षक शिक्षा प्रदान करते हैं. इन्हें कलम, किताब, कॉपी और साल में एक बार स्कूल ड्रेस भी मुफ्त दी जाती है. हमारी कोशिश यह भी होती है कि बच्चों के साथ इनके अभिभावकों को भी सामाजिक सुधार के प्रति जागरूक किया जाए. इसके लिए हर वर्ष महिला दिवस पर आठ मार्च को अभिभावकों के बीच प्रतियोगिता का आयोजन कराया जाता हैं. साथ ही वक्त-वक्त पर इनके साथ बैठकें कर समाज में फैल रही बुराइयों सें भी सचेत कराया जाता हैं. प्रदीप जी बताते हैं, बच्चे कंप्यूटर की भी जानकारी रखें, इसके लिए संस्थान के द्वारा असरदार पहल की जाती है. चौथे वर्ग से ही बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा देनी शुरू कर दी जाती है. इन स्कूलों में शिक्षा देने की बेहतरीन पद्धति के कारण आस-पास के स्कूलों के बच्चे भी आने लगे है.

जड़ मजबूत हो, इसका होता है ख्याल
प्रदीप जी बताते हैं, संस्थान की शुरुआत के लिए सहयोग में जितने भी हाथ बढ़े, वह सब ऊर्जा से भरे हुए थे. सब ने इस पहल के लिए अपनी तरफ से पूरी सहायता करने का संकल्प लिया. बच्चे स्कूल में कैसे आयें, इसके लिए पहल हमने खुद की, शुरू में लोगों को समझाया कि एक ऐसा स्कूल खुलने वाला है, जहां बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जायेगी. आप सब अपने बच्चों को वहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजिये. इसके लिए इलाके के तकरीबन सभी गांवों का दौरा किया गया. हमारी इस पहल का सुखद परिणाम सामने आया. पहली ही बार में करीब 160 लड़कों ने शिक्षा ग्रहण करने में अपनी रुचि दिखाई. प्रदीप जी कहते हैं, आजादी के बाद अब तक शिक्षा के नाम पर केवल व्यापार और प्रयोग ही हुए हैं. हमने सही मायनों में शिक्षा देने की बात सोची. लोग या तो सरकारी स्कूल चलाते हैं या फिर प्राइवेट स्कूल. शिक्षा के मंदिर के ऐसे हालात को देख कर मन में क्षोभ होता था. इन स्कूलों में हर छोटी बड़ी जरूरतों के लिए किसी संस्थान विशेष का नाम दिया जाता है. हम लोगों ने इस लकीर के आगे एक और लकीर खींचने की कोशिश की.

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