''इससे अच्छा तो मैं जेल के अंदर ही होता''

Updated at : 19 Jun 2014 4:10 PM (IST)
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''इससे अच्छा तो मैं जेल के अंदर ही होता''

इमरान क़ुरैशी बैंगलोर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए "मुझे नहीं पता कि क्या करना चाहिए. हां, मैं बाहर हूं लेकिन बेहतर होता कि मैं जेल के अंदर होता. जेल के मुक़ाबले बाहर ज़िंदगी ज़्यादा मुश्किल है." यह कहना है अब्दुल समद सिद्दीबापा का, जिन्होंने 2010 में जेल से आज़ाद होने के बाद कहा था […]

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"मुझे नहीं पता कि क्या करना चाहिए. हां, मैं बाहर हूं लेकिन बेहतर होता कि मैं जेल के अंदर होता. जेल के मुक़ाबले बाहर ज़िंदगी ज़्यादा मुश्किल है."

यह कहना है अब्दुल समद सिद्दीबापा का, जिन्होंने 2010 में जेल से आज़ाद होने के बाद कहा था कि वह एक सामान्य ज़िंदगी जीना चाहते हैं.

युवा समद सिद्धीबापा को मई 2010 में इसलिए गिरफ़्तार किया गया था क्योंकि जर्मन बेकरी के कैश काउंटर के ऊपर लगे कैमरे से ली गई एक तस्वीर में मौजूद शख़्स से उनकी शक्ल बहुत मिलती थी.

जर्मन बेकरी में फ़रवरी 2010 में हुए बम धमाके में 17 लोग मारे गए थे.

कर्नाटक के भटकल कस्बे की व्यथा

शक्ल का मिलना कोई अजीब बात भी नहीं. उनके बड़े भाई मोहम्मद अहमद ज़रार सिद्दीबापा, जिन्हें आमतौर पर यासीन भटकल के नाम से जाना जाता है, जेहादी चरमपंथी संगठन इंडियन मुजाहिदीन के संस्थापकों में से एक हैं.

पुलिस ने जब जर्मन बेकरी धमाके के असली मुजरिमों को गिरफ़्तार करने के बाद अदालत में पेश किया तब भी समद को छोड़ा नहीं, जिसकी उन्हें उम्मीद थी.

‘लोग डरे हुए हैं’

समद सिद्दीबापा को मुंबई के बाइकुला हथियार आपूर्ति मामले में कथित रूप से शामिल होने का अभियुक्त बनाया गया.

अब भी वह हर महीने इस केस की सुनवाई में शामिल होने के लिए मुंबई आते हैं. इसके अलावा वह अपना समय पत्रकारिता का कोर्स पूरा करने में लगाते हैं.

डबडबाई आंखों के साथ उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई है. यहां कोई मुझसे मिलने नहीं आता. कोई मुझसे बात नहीं करता. इसने मेरी ज़िंदगी को बहुत ज़्यादा प्रभावित किया है."

भटकल यानी पहचान का आतंक

कर्नाटक के तटीय शहर भटकल में स्थित अपने घर में उन्होंने कहा, "मैं अब 26 साल का हो गया हूं और अब भी कमा नहीं रहा हूं. मेरी ज़िंदगी वहां ख़त्म हो गई है जहां से शुरू होनी चाहिए थी. मैं नौकरी के लिए दुबई जा चुका होता (2010 में ही जहां उनके पिता कपड़ों की एक दुकान चलाते हैं). वहां मेरी ज़िंदगी शुरू होती, लेकिन यह ठहर सी गई है."

आप कहते हैं कि आप बेगुनाह हैं लेकिन आपके रिश्तेदार आपकी बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं? इस सवाल पर समद कहते हैं, "जो लोग जानते हैं वे डरे हुए हैं. वे जानते हैं कि मैं बेगुनाह हूं लेकिन वह पुलिस और मीडिया से डरे हुए हैं. मेरे परिवार के सदस्य डरे हुए हैं कि मेरे घर में कैमरे लगे हुए हैं और पुलिस को पता चल जाएगा."

सार्वजनिक रूप से स्वागत

समद कहते हैं, "वे जानते हैं कि मैं बेगुनाह हूं, वरना वे मेरा समर्थन नहीं करते. सारा इलाक़ा जानता है कि मैं बेगुनाह हूं. उन्हें डर है कि मैं ज़्यादा मुश्किल में न फंस जाऊं या फिर उन्हें आशंका है कि वे भी इस जाल में फंस सकते हैं."

यह पता चलने के बाद कि वह जर्मन बेकरी चरमपंथी हमले में शामिल नहीं थे भटकल लौटने पर समद सिद्दीबापा का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया गया था.

उनके परिवार ने तस्वीरों और वीडियो के ज़रिए यह साबित कर दिया कि आतंकवादी हमले के दिन वह भटकल में ही एक शादी में मौजूद थे.

वह कहते हैं कि उन्होंने आख़िरी बार अपने भाई, अहमद सिद्दीबापा या यासीन भटकल को 2005 में दुबई जाने से पहले देखा था, जहां उनकी अपने पिता से लड़ाई हो गई थी और वह वहां से भी चले गए थे.

अहमद सिद्दीबापा को पिछले साल अगस्त में गिरफ़्तार कर लिया गया था.

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