जंतर-मंतर पर AI फेस रिकग्निशन वैन, क्या आधार से हो रही प्रोटेस्टर्स की पहचान? वायरल वीडियो के बाद उठे सवाल

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जंतर-मंतर पर मौजूद प्रोटेस्टर्स (Photo: @Cockroachisback/Instagram)

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रोटेस्ट के दौरान AI फेस रिकग्निशन वैन को लेकर कुछ वीडियो वायरल हो रहे हैं. दावा किया जा रहा है कि इस टेक्नोलॉजी से प्रोटेस्ट में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है. आइए जानते हैं पूरा मामला.

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रोटेस्ट के दौरान एक नई बात सामने आई है. X पर कुछ वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं. इनमें दावा किया जा रहा है कि दिल्ली पुलिस AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाली फेस पहचानने की टेक्नोलॉजी का यूज कर रही है, ताकि प्रोटेस्ट में शामिल लोगों की पहचान की जा सके. CJP ने भी ये वीडियो X पर शेयर किए हैं. आइए देखते हैं वीडियो को.

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देखें वीडियो

CJP ने जिस वीडियो को X पर शेयर किया है, उसमें एक CCTV निगरानी वाली वैन दिखाई देती है. इसमें चारों तरफ देखने वाले 360-डिग्री कैमरे लगे हैं. वैन के अंदर लगी स्क्रीन पर कुछ लोगों की फोटो, नाम और डिटेल्स भी नजर आती हैं. इसी वजह से लोग इस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठा रहे हैं.

प्रोटेस्ट साइट के बाहर AI टेक्नोलॉजी से लैस वैन की तैनाती

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने प्रोटेस्ट वाली जगह के पास निगरानी के लिए दो खास गाड़ियां तैनात किए हैं. इनमें से एक गाड़ी आसपास लगे CCTV कैमरों की लाइव फुटेज पर नजर रखती है. वहीं, दूसरे गाड़ी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टेक्नोलॉजी का यूज किया जा रहा है, जो कैमरों में दिख रहे चेहरों की तुलना पुलिस के डेटाबेस में मौजूद तस्वीरों से करता है.

यह फेस रिकग्निशन सिस्टम 'इक्षणा' (Ikshana) वैन में लगाया गया है. दिल्ली पुलिस ने इस वैन का यूज सबसे पहले 2023 के G20 सम्मेलन से पहले सेफ्टी पर नजर रखने के लिए किया था.

हालांकि, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस तकनीक का मकसद हर प्रोटेस्ट में शामिल लोगों की पहचान करना नहीं है. उनका दावा है कि इसका यूज सिर्फ उन लोगों का पता लगाने के लिए किया जा रहा है, जिनका पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड है और जो भीड़ में मौजूद हो सकते हैं.

कैसे काम करता है फेशियल रिकग्निशन सिस्टम?

फेशियल रिकग्निशन सिस्टम किसी व्यक्ति की फोटो या वीडियो में उसका चेहरा पहचानता है. फिर उस चेहरे की तुलना अपने रिकॉर्ड में पहले से मौजूद तस्वीरों से करता है. अगर दोनों चेहरे काफी हद तक एक जैसे लगते हैं, तो सिस्टम बताता है कि यह वही व्यक्ति हो सकता है. इसके बाद पुलिस या संबंधित अधिकारी खुद इसकी जांच करते हैं.

लेकिन सिर्फ सिस्टम के कह देने से यह साबित नहीं हो जाता कि वह वही व्यक्ति है. कई बार कैमरे की खराब क्वालिटी, कम रोशनी, अलग एंगल से ली गई फोटो या चेहरे पर मास्क होने की वजह से सिस्टम गलती भी कर सकता है. इसलिए अंतिम फैसला हमेशा इंसान जांच-पड़ताल करने के बाद ही लेते हैं.

आधार से जुड़ी आशंकाओं पर अब तक नहीं मिला जवाब

CJP ने जिस वीडियो को शेयर किया है उसमें कहीं भी आधार (Aadhaar) का जिक्र नहीं किया गया है. वीडियो में सिर्फ इतना दिख रहा है कि कैमरे में कैद चेहरों का मिलान पुलिस के सिस्टम में मौजूद कुछ व्यक्तिगत जानकारी से किया जा रहा है. 

हालांकि, चेहरा स्कैन करते ही लोगों की निजी जानकारी सामने आने के दावों के बाद सोशल मीडिया पर कई सवाल उठ रहे हैं। यूजर्स जानना चाहते हैं कि क्या यह टेक्नोलॉजी आधार (Aadhaar) या किसी दूसरे सरकारी डेटाबेस से जुड़ी है। फिलहाल, इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. वहीं, दिल्ली पुलिस ने भी अब तक यह नहीं कहा है कि इस तकनीक का आधार डेटाबेस से कोई लिंक है.

लेकिन इससे एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा हो गया है. अगर यह जानकारी आधार डेटाबेस से नहीं ली जा रही है, तो फिर लोगों की पहचान किस डेटाबेस के जरिए की जा रही है?

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