कालियागंज में राजनीतिक गतिविधियां तेज

कालियागंज. कालियागंज नगरपालिका अध्यक्ष अरुण दे सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के बाद से यहां राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई है. एक ओर जहां कांग्रेसी नगरपालिका अध्यक्ष अरुण दे सरकार अपनी कुर्सी बचाने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके विरोधी यथाशीघ्र उन्हें इस पद से हटाकर नगरपालिका पर कब्जा करना चाहते हैं. इसको […]
सबकी निगाहें नगरपालिका अध्यक्ष अरुण दे सरकार पर टिकी हुई है. यहां उल्लेखनीय है कि नगरपालिका के नौ पार्षदों ने अरुण दे सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस जारी किया है. इन नौ पार्षदों में से सात पार्षद ऐसे हैं जो कांग्रेसी थे और बाद में पाला बदल कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गये. इस महीने की 20 तारीख को नगरपालिका के उपाध्यक्ष कार्तिक पाल के नेतृत्व में सात कांग्रेसी पार्षद कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गये. तब से लेकर करीब एक सप्ताह का समय बीत चुका है.
अरुण दे सरकार चुप्पी साधे बैठे हैं, जबकि कार्तिक पाल तत्काल बैठक बुलाने की मांग को लेकर सक्रिय हैं. सोमवार को उन्होंने इसको लेकर उत्तर दिनाजपुर के जिला अधिकारी रणधीर कुमार से भी मिले थे. उन्होंने रणधीर कुमार से अविश्वास प्रस्ताव को लेकर शीघ्र बैठक बुलाने की मांग की. इस मुद्दे पर कार्तिक पाल का कहना है कि नगरपालिका अध्यक्ष अरुण दे सरकार का जाना तय है. इसलिए वह बैठक बुलाने में देरी कर रहे हैं. अविश्वास प्रस्ताव पेश होने की स्थिति में नगरपालिका अध्यक्ष को 15 दिनों के अंदर बैठक बुलानी होती है.
करीब एक सप्ताह का समय बीत जाने के बाद भी नगरपालिका अध्यक्ष बैठक नहीं बुला रहे हैं. श्री पाल ने आगे कहा कि कालियागंज नगरपालिका में पार्षदों की संख्या 17 है. इनमें से 12 पार्षद नगरपालिका अध्यक्ष के खिलाफ हैं. उन्होंने दावा करते हुए कहा कि नौ पार्षदों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिये जाने के बाद तीन और कांग्रेसी पार्षद उनके साथ हो गये हैं. यहां उल्लेखनीय है कि कार्तिक पाल को अरुण दे सरकार ने नगरपालिका के उपाध्यक्ष पद से हटा दिया है.
तृणमूल कांग्रेस ने बोर्ड बनने की स्थिति में कार्तिक पाल को नगरपालिका अध्यक्ष बनाने की घोषणा की है. कार्तिक पाल जब सभी पार्षदों को लेकर शहीद दिवस की रैली में शामिल होने के लिए कोलकाता गये थे, तभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसकी घोषणा की थी. इधर, जिला अधिकारी रणधीर कुमार का कहना है कि पूरी परिस्थिति पर उनकी नजर है. नियमानुसार अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलने के बाद 15 दिनों के अंदर बैठक बुलानी पड़ती है. अभी सात दिन का ही समय बीता है. इस अवधि के दौरान यदि बैठक नहीं बुलायी जाती है, तो प्रशासन अपने स्तर पर हस्तक्षेप करेगी.
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