Explainer: जागृत शक्तिपीठ है बंगाल का तारापीठ, तंत्र साधना में वामाखेपा को यहीं मिली थी सिद्धि
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 27 Aug 2022 1:53 PM
Kaushiki Amavasya 2022|Tarapith|Explainer|शुंभ-निशुंभ से धरती को मुक्ति दिलाने के लिए देवी महामाया ने अपनी इच्छा जगायी और देवी कौशिकी का जन्म हुआ. भाद्र मास की अमावस्या तिथि को देवी कौशिकी ने शुंभ-निशुंभ का वध किया. तभी से इस अमावस्या को कौशिकी अमावस्या के नाम से जाना जाने लगा.
Kaushiki Amavasya 2022|Tarapith|Explainer|भारत में कुल 51 शक्ति पीठ हैं. इनमें से 5 (बक्रेश्वर, नलहाटी, बन्दीकेश्वरी, फुलोरा देवी और तारापीठ) पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिला में हैं. तारापीठ (Tarapith Temple) उनमें सबसे जागृत शक्तिपीठ है. बीरभूम जिला धार्मिक रूप से बहुत प्रसिद्ध है. तारापीठ यहां का सबसे प्रमुख धार्मिक तीर्थस्थल है और यह एक सिद्धपीठ भी है. यहीं पर सिद्ध पुरुष वामाखेपा (Bamakhepa) का जन्म हुआ था. उनका पैतृक आवास आटला गांव में है, जो तारापीठ मंदिर से 2 किमी की दूरी पर स्थित है.
कहते हैं कि वामाखेपा को मंदिर के सामने महाश्मशान में मां तारा देवी के दर्शन हुए थे. वहीं पर वामाखेपा को सिद्धि प्राप्त हुई और वह सिद्ध पुरुष कहलाये. मां तारा, काली माता का ही एक रूप है. मंदिर में मां काली की प्रतिमा की पूजा मां तारा के रूप में की जाती है.
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तारापीठ से एक और पौराणिक इतिहास जुड़ा है. कहा जाता है कि वर्ष 1274 में बंगाल में कौशिकी अमावस्या को तारापीठ महाश्मशान में श्वेतशिमुल वृक्ष के नीचे संत बामाखेपा ने सिद्धि प्राप्त की थी. उस दिन ध्यान कर रहे बामाखेपा को मां तारा ने दर्शन दिया था. महिषासुर के अत्याचार से देवता की रक्षा के लिए मां दुर्गा का अवतार हुआ था. शुंभ-निशुंभ से धरती को मुक्ति दिलाने के लिए देवी महामाया ने अपनी इच्छा जगायी और देवी कौशिकी का जन्म हुआ. भाद्र मास की अमावस्या तिथि को देवी कौशिकी ने शुंभ-निशुंभ का वध किया. तभी से इस अमावस्या को कौशिकी अमावस्या के नाम से जाना जाने लगा.
तारापीठ मुख्य मंदिर के सामने ही महाश्मशान है. उसके पास है द्वारिका नदी. भारत की सभी नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं, लेकिन यह नदी तारापीठ में दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है.
तारापीठ राजा दशरथ के कुलपुरोहित वशिष्ठ मुनि का सिद्धासन और तारा मां का अधिष्ठान है. इसलिए इसे हिंदुओं का महातीर्थ कहते हैं. सुदर्शन चक्र से जब भगवान विष्णु ने मां सती को छिन्न-भिन्न किया था, तब सती की आंख की पुतली (नेत्रगोलक) यहां गिरी थी. नेत्रगोलक को बांग्ला में तारा कहते हैं. इसलिए इस जगह का नाम तारापीठ पड़ा. तारापीठ मंदिर काली के रूप में शिवजी के विनाशकारी पहलू का प्रतिनिधित्व करता है. हिंदू परंपराओं के अनुसार, मां तारा को ज्ञान की 10 देवियों में दूसरा माना जाता है. उन्हें कालिका, भद्रकाली और महाकाली के नाम से जाना जाता है.
यहां पर एक बार रतनगढ़ के प्रसिद्ध वैश्य रमापति अपने पुत्र को लेकर नाव से व्यापार करने आये थे. तारापीठ के पास सर्पदंश से उनके पुत्र की मृत्यु हो गयी. उन्होंने अपने पुत्र के मृत देह को दूसरे दिन दाह संस्कार करने के लिए रखा. उस दिन तारापुर में ही ठहर गये. उनका एक सेवक उनको तारापीठ स्थित एक बड़े तालाब के पास ले गया. उन्होंने वहां आश्चर्यजनक दृश्य देखा.
उन्होंने देखा कि मरी हुई मछलियां तालाब के जल के स्पर्श से जीवित हो उठती हैं. यह देखकर उनको बहुत खुशी हुई. वह अपने पुत्र के मृत देह को तालाब में फेंक दिया. उसी समय उनका पुत्र जीवित हो उठा. उसी दिन से उस तालाब का नाम जीवन कुंड पड़ा.
आपदा-विपदा को दूर करने वाली मां तारा मृत्यु के पश्चात भी तारने वाली हैं. शक्ति मातंगी के चरण कमल यहां के महाश्मशान में प्रतिष्ठित हैं. कौशिकी अमावस्या की रात यहां तंत्र क्रियाएं होती हैं. तारापीठ के इतिहास पर गौर करेंगे, तो पायेंगे वशिष्ठ तांत्रिक कला में महारत हासिल करना चाहते थे. उन्होंने तारापीठ को तंत्र साधना का अभ्यास करने के लिए मां तारा की पूजा करने के लिए एक आदर्श स्थान के रूप में चुना था.
वशिष्ठ तब तारापीठ आये और बायें हाथ के तांत्रिक अनुष्ठान के साथ पंचमकार, यानी पांच निषिद्ध चीजों का उपयोग करके मां तारा की पूजा करने लगे. इससे प्रसन्न होकर मां तारा एक स्वर्गीय मां के रूप में उनके सामने प्रकट हुईं. इसके बाद माता रानी फिर पत्थर में तब्दील हो गयीं.
पागल संत साधक वामाखेपा के लिए भी तारापीठ को जाना जाता है. उनकी पूजा भी मंदिर में की जाती है. वह श्मशान घाट में रहते थे और कैलाशपति बाबा के मार्गदर्शन में तांत्रिक कला के साथ-साथ सिद्ध योग भी करते थे, जो एक और बहुत प्रसिद्ध संत थे. वामाखेपा ने अपना जीवन मां तारा की पूजा के लिए समर्पित कर दिया था. वामाखेपा अघोरी तांत्रिक और सिद्ध पुरुष थे. तारापीठ से 2 किलोमीटर दूर स्थित आटला गांव में सन् 1244 के फाल्गुन माह में शिव चतुर्दशी के दिन वामाखेपा का जन्म हुआ था. उनके पिता का नाम सर्वानंद चट्टोपाध्याय था तथा माता का नाम राजकुमारी था. इनका बचपन का नाम वामाचरण था. छोटे भाई का नाम रामचरण था. उनकी चार बहनें थीं और एक बहन का लड़का भी इनके पास ही रहता था. इस तरह परिवार में नौ सदस्य थे.
वामाचरण जब 11 वर्ष के थे, तब उनका भाई केवल 5 वर्ष का था. तब उनके ऊपर बड़ी भारी मुसीबत आयी. उनके पिता सर्वानंद बहुत बीमार हो गये. मां काली, मां तारा कहते हुए स्वर्ग सिधार गये. गरीबी और अभाव के बाद मामा ने दोनो बेटों को अपने साथ अपने गांव ले गये. वहां दोनों भाई गाय चराते थे. एक बार वामाचरण ने गांजा पीकर उसकी आग असावधानी से फेंक दी. उससे भयंकर आग लग गयी और कई घर जल गये. सभी लोग वामाचरण को पकड़ने लगे.
वामाखेपा उस आग में कूद गये. जब वे आग से बाहर निकले, तो उनका शरीर सोने की तरह चमक रहा था. मां तारा ने अपने पुत्र की अग्नि से रक्षा की थी. यह देखकर सभी चकित रह गये. इसके बाद वामाखेपा का साधक जीवन आरंभ हुआ. मोक्षदानंद बाबा व साईं बाबा आदि ने उन्हें महाश्मशान में आश्रय दिया. कैलाशपति बाबा उन्हें बहुत प्यार करते थे. एक दिन कैलाशपति बाबा ने रात में वामाचरण को गांजा तैयार करने के लिए बुलाया. उस रात वामाखेपा को बहुत डर लगा. असंख्य दैत्याकार आकृतियां उनके चारों ओर खड़ी थी. वामाखेपा ने जयगुरु, जय तारा मां पुकारा और वे सब आकृतियां लुप्त हो गयीं.
वामाचरण ने बाबा कैलाशपति के आश्रम में जाकर गांजा तैयार किया. 18 वर्ष की अल्पायु में विश्वास के बल पर वामाखेपा को सिद्धि प्राप्त हुई और वे संसार में पूज्य हुए. जिस प्रकार परमहंस रामकृष्ण परमहंस को दक्षिणेश्वर में मां काली के दर्शन हुए थे. उसी प्रकार वामाखेपा को तारापीठ के महाश्मशान में मां तारा ने दर्शन दिया था. वामाखेपा प्यार से तारा मां को बोड़ो (बड़ी) मां बुलाते थे. अपनी मां को छोटो (छोटी ) मां कहते थे.
बंगाली में खेपा का मतलब पागल होता है. उनका पागलपन अपनी मां तारा के लिए था. ऐसा माना जाता है कि वामाखेपा को मां तारा के दर्शन होते थे. मां तारा उनके साथ खाना खाती थीं. मां की भांति अपनी गोद में वामाखेपा को सुलाती थीं. वामाखेपा और मां तारा की एक-दूसरे से बातचीत होती थी. यहां तक कि मां तारा वामाखेपा के अलावा किसी और के हाथ से भोग भी ग्रहण नहीं करतीं थीं. वर्ष 1922 में वामाखेपा के निधन के बाद महाश्मशान के पास ही एक नीम के पेड़ के नीचे उनको समाधि दी गयी.
तारापीठ में एक और जगह देखने योग्य है. उसका नाम है मुंंडमालिनी. यहां पर भी मां तारा की प्रतिमा है. सुना है कि काली मां अपने गले की मुंडमाला वहां रखकर द्वारका नदी में स्नान करके माला पहन लेती हैं. इसलिए इस स्थान का नाम मुंंडमालिनी है. यहां भी एक श्मशान है.
तारापीठ को कौशिकी अमावस्या पर होने वाली विशेष पूजा व तंत्र क्रियाओं के लिए जाना जाता है. देश भर से लाखों श्रद्धालु आते हैं. इस बार भी तांत्रिकों ने महाश्मशान में डेरा डाल दिया है. यज्ञ, हवन, सिद्धि की तैयारियां जोरों पर हैं. अमावस्या लगते ही विश्व मंगल की कामना को लेकर विभिन्न मतों के तांत्रिक अपनी-अपनी पद्धति से साधना में जुट जाते हैं. यहां महाविद्या के जानकार, कुंडलिनी जागृत करने वाले योगी-योगिनी पहुंचे हैं. गृहस्थ अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की इच्छा लेकर आ रहे हैं. तंत्र विद्या के जानकार बताते हैं कि कौशिकी अमावस्या की रात ही कुछ समय के लिए स्वर्ग का द्वार खुलता है.
रिपोर्ट – मुकेश तिवारी
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