वनकाठी की काली पूजा है आठ सौ वर्ष पुरानी
Author Prabhat khabar digital desk
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राजा बल्लालदेव सेन के गुरु महेश्वर बनर्जी ने की थी शुरुआत जलती चिता पर खड़े होकर करते थे साधना, काली देती हैं दर्शन पानागढ़ : कांकसा थाना अंतर्गत वनकाठी जंगलमहल में राय परिवार की कालीपूजा आठ सौ वर्ष पुरानी है. किवदंती है कि तत्कालीन प्राचीन बंगाल के राजा बल्लालदेव सेन के गुरु व तंत्र साधक […]
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राजा बल्लालदेव सेन के गुरु महेश्वर बनर्जी ने की थी शुरुआत
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जलती चिता पर खड़े होकर करते थे साधना, काली देती हैं दर्शन
पानागढ़ : कांकसा थाना अंतर्गत वनकाठी जंगलमहल में राय परिवार की कालीपूजा आठ सौ वर्ष पुरानी है. किवदंती है कि तत्कालीन प्राचीन बंगाल के राजा बल्लालदेव सेन के गुरु व तंत्र साधक महेश्वर प्रसाद बंधोपाध्याय ने ही कांकसा के बनकाठी जंगलमहल में काली की 11 फुट की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू की थी. राय परिवार के सदस्य अनिल राय ने बताया कि राजा बल्लाल सेन जलपथ से राणबंगला आये थे. उनके साथ उनके गुरु महेश्वर बंधोपाध्याय भी थे.
अजय नदी किनारे कांकसा के इस जंगलमहल में जंगल काट कर बनकाठी ग्राम का स्थापना की गई. गुरु महेश्वर बनर्जी को यह स्थान काफी पसंद आया. वे काली के परम भक्त थे. उन्होंने ही यहां पत्थर की 11 फुट की काली प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू की. इस समय भी पारंपरिक रूप में काली की पूजा तंत्र साधना के साथ की जाती है. बलि प्रथा चालू है. दावा है कि शुरूआती दौर में काली के समक्ष नरबलि होती थी. लेकिन यहां भैंसों और पाठा बलि चालू है.
उन्होंने दावा किया कि महेश्वर बनर्जी स्थानीय श्मशान में नग्न जाते थे और रात में जलती चिता पर एक पैर पर खड़े होकर साधना करते थे. इसके बाद काली उन्हें दर्शन देती थी. अमावस्या की रात तालाब में स्नान करने के बाद देवी की पूजा होती थी. इस समय चिता पर कोई तंत्र साधना नहीं करता है. लेकिन चिता दाह वाले स्थान पर खड़े होकर इस परंपरा का पालन परिजन करते हैं. गुरु महेश्वर लिखित पोथी से ही मंत्रोच्चारण किया जाता है.
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