तीन दशक तक झामुमो के साथ, दो बार विधायक और फिर मंत्री बने सुदिव्य सोनू की कहानी
झारखंड सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू की फाइल फोटो
झारखंड मुक्ति मोर्चा के विश्वसनीय नेता सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक यात्रा का पूरा सफर. तीन दशक के संघर्ष के बाद गिरिडीह से दो बार विधायक और फिर कैबिनेट मंत्री तक का सफर.
झारखंड की राजनीति में सुदिव्य कुमार सोनू की पहचान सिर्फ गिरिडीह विधायक या मंत्री के तौर पर नहीं थी. वह लंबे समय से झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से जुड़े संगठन के भरोसेमंद नेताओं में शामिल रहे. करीब तीन दशक तक पार्टी के साथ जुड़े रहने के बाद उन्होंने चुनावी राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखे. 2009 और 2014 में चुनाव हारने के बाद 2019 में पहली बार गिरिडीह से विधायक बने. 2024 में उन्होंने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की और इसके बाद हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री बने.
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2009 से शुरू हुआ चुनावी संघर्ष
सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र से 2009 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा. इसके बाद 2014 में भी उन्होंने झामुमो के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरकर अपनी राजनीतिक दावेदारी पेश की, लेकिन दोनों चुनावों में उन्हें सफलता नहीं मिली. 2014 में भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी ने गिरिडीह सीट पर जीत दर्ज की थी.
लगातार दो चुनाव हारने के बावजूद सोनू ने सक्रिय राजनीति नहीं छोड़ी. संगठन में उनकी भूमिका बनी रही और पार्टी के भीतर उनका प्रभाव बढ़ता गया. 2019 में इसका परिणाम चुनावी जीत के रूप में सामने आया.
2019 में पहली जीत, बदली राजनीतिक तस्वीर
2019 के विधानसभा चुनाव में सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह सीट पर भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी को हराया. उन्हें 80,871 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 64,987 वोट मिले. इस जीत के साथ सोनू पहली बार विधानसभा पहुंचे.
पहली बार विधायक बनने के बाद गिरिडीह में शिक्षा और आधारभूत विकास से जुड़े मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता चर्चा में रही. स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, उनके प्रयासों से सर जेसी बोस विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में पहल हुई. पीरटांड़ में बड़ी सिंचाई परियोजना समेत मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज से जुड़े प्रस्ताव भी उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं में रहे.
चुनावी राजनीति से आगे, संगठन में भी अहम भूमिका
सुदिव्य सोनू की राजनीतिक पहचान केवल अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रही. 2024 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी रणनीतिक भूमिका को लेकर भी चर्चा हुई. एक रिपोर्ट के अनुसार, झामुमो की सोशल मीडिया टीम को मजबूत करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. पार्टी के भीतर उन्हें रणनीति तैयार करने वाले नेताओं में गिना गया.
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2024 में हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन के सक्रिय राजनीति में आने के दौर में भी सोनू की भूमिका चर्चा में रही. रिपोर्ट के मुताबिक, गांडेय विधानसभा क्षेत्र से कल्पना सोरेन को चुनाव लड़ाने की रणनीति में उनका योगदान था. कल्पना सोरेन ने गांडेय उपचुनाव में जीत दर्ज की और बाद में 2024 के विधानसभा चुनाव में भी सीट बरकरार रखी.
2024 में लगातार दूसरी जीत और मंत्री पद
2024 के विधानसभा चुनाव में सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह से दोबारा जीत दर्ज की. उन्हें 94,042 वोट मिले, जबकि भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी को 90,204 वोट मिले. इस तरह उन्होंने लगातार दूसरी बार विधानसभा में अपनी जगह कायम रखी.
इसके बाद हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र से झामुमो के पहले मंत्री बनने का गौरव भी उनके नाम दर्ज हुआ. इससे पहले 2000 में गिरिडीह से विधायक चंद्रमोहन प्रसाद को भाजपा सरकार में मंत्री बनाया गया था, लेकिन झामुमो के टिकट पर गिरिडीह से जीतकर मंत्री बनने वाले सोनू पहले नेता बने.
एक विधायक से कई विभागों की जिम्मेदारी तक
मंत्री बनने के बाद सुदिव्य कुमार सोनू को कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली. इनमें उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति, खेल एवं युवा कार्य जैसे विभाग शामिल थे. इस तरह उनका राजनीतिक सफर एक क्षेत्रीय विधायक से राज्य सरकार के महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालने वाले कैबिनेट मंत्री तक पहुंचा.
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सुदिव्य सोनू की राजनीतिक यात्रा का सबसे अहम पहलू यह रहा कि शुरुआती चुनावी असफलताओं के बावजूद उन्होंने झामुमो से अपनी राजनीतिक दूरी नहीं बनाई. 2009 और 2014 की हार के बाद 2019 में विधानसभा पहुंचे और 2024 में दोबारा जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की. संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहने और बाद में सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के बीच उनकी यह यात्रा गिरिडीह की राजनीति में उनके बढ़ते प्रभाव की कहानी भी बताती है.
56 वर्ष की उम्र में उनके आकस्मिक निधन के साथ झारखंड की राजनीति ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसने संगठन में लंबे समय तक काम करने के बाद सत्ता के शीर्ष स्तर तक अपनी जगह बनाई थी.
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