80s का दौर फिर क्यों भा रहा? जिस जमाने को जिया नहीं, उसी में खुद को तलाश रही नई पीढ़ी
समर्थकों द्वारा एआई से बनाई गई हेमंत सोरेन , कल्पना सोरेन और जयराम महतो की तस्वीर
सोशल मीडिया पर 80s की AI तस्वीरें धूम मचा रही हैं. यह सिर्फ एक ट्रेंड है या लोग डिजिटल जिंदगी में सादगी तलाश रहे हैं? जानें क्या है इस आकर्षण का राज.
सोशल मीडिया पर इन दिनों 80 के दशक की तस्वीरों का एक अलग ही आकर्षण देखने को मिल रहा है. AI की मदद से लोग अपनी मौजूदा तस्वीरों को 80s के अंदाज में बदल रहे हैं. तस्वीरों में वही चेहरा, लेकिन पहनावा, बालों की शैली और पूरा अंदाज उस दौर का. खास बात यह है कि इस चलन में वह पीढ़ी भी शामिल है, जिसने 80 का दशक देखा तक नहीं.
आखिर आज की पीढ़ी उस दौर की ओर क्यों आकर्षित हो रही है, जिसे उसने जिया ही नहीं? क्या यह सिर्फ सोशल मीडिया का एक चलन है या फिर भागती-दौड़ती डिजिटल जिंदगी के बीच लोग उस दौर की सादगी और अपनापन तलाश रहे हैं?

पुरानी पीढ़ी के लिए यादों की वापसी
सिंधु मिश्रा ने भी AI की मदद से 80 के दशक की अपनी तस्वीर तैयार की. वह उस दौर को जी चुकी हैं. उनका कहना है कि AI से बनी तस्वीर देखने पर पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं. खासकर जब तस्वीर में चेहरा पहले जैसा ही दिखाई देता है, तो ऐसा लगता है जैसे बीते समय की झलक फिर सामने आ गयी हो.
उन्होंने AI से बनी तस्वीर की तुलना 80 के दशक की अपनी वास्तविक तस्वीर से भी की और दोनों में काफी समानता महसूस की. उनके अनुसार, व्यस्त जिंदगी के बीच ऐसी तस्वीरें कुछ पल के लिए खुशी और ताजगी देती हैं. AI तस्वीरों के गलत इस्तेमाल या खाते की सुरक्षा को लेकर आशंका की जानकारी होने के बावजूद लोग इस चलन का हिस्सा बन रहे हैं, क्योंकि इससे कुछ पल का सुकून मिलता है.
जिसे देखा नहीं, उसे तस्वीर में देखा
नयी पीढ़ी के लिए इस चलन का मतलब थोड़ा अलग है. काव्या ने अपनी और अपनी मां की 80s के अंदाज में AI तस्वीरें बनायीं, हालांकि उन्हें सोशल मीडिया पर साझा नहीं किया. उनका कहना है कि उन्होंने उस दौर को देखा नहीं है. इसलिए AI के जरिये यह देखना दिलचस्प लगा कि अगर वह उस समय होतीं, तो कैसी दिखतीं. उन्हें पहले से ही पुराने और पारंपरिक अंदाज के कपड़े पसंद हैं. ऐसे में तस्वीर के जरिये उस दौर की कल्पना करना उन्हें अच्छा लगा.

तनाव से कुछ देर दूर होने का माध्यम
रांची विश्वविद्यालय के साइकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ परवेज हसन के अनुसार, इस चलन को केवल फैशन के तौर पर नहीं देखा जा सकता. पुराने दौर की तस्वीरें और उससे जुड़ी यादें लोगों को ऐसे समय की ओर ले जाती हैं, जिसे वे आज की तुलना में कम डिजिटल दबाव और अपेक्षाकृत कम भागदौड़ वाला मानते हैं.
उनके अनुसार, आज काम और सोशल मीडिया का दबाव बढ़ा है. ऐसे में पुराने अंदाज की तस्वीर बनाना और कुछ समय के लिए उसी कल्पना में रहना मानसिक विराम जैसा काम कर सकता है. इसे एक तरह के पलायन के रूप में भी देखा जा सकता है, जहां व्यक्ति कुछ देर के लिए मौजूदा तनाव से दूर चला जाता है.
डॉ परवेज हसन सोशल मीडिया पर मिलने वाली प्रतिक्रिया को भी इसकी एक वजह मानते हैं. तस्वीर साझा करने पर मिलने वाले लाइक और सकारात्मक टिप्पणियां लोगों को उत्साहित करती हैं. यानी यह चलन पुरानी यादों के साथ-साथ सामाजिक स्वीकृति से भी जुड़ा है.

तब रोजमर्रा के काम में ही थी शारीरिक सक्रियता
80 के दशक की तस्वीरों में दिखाई देने वाले शरीर और आज की जीवनशैली के बीच अंतर की चर्चा भी इस ट्रेंड के साथ हो रही है. डायटीशियन कुमारी मीनाक्षी के अनुसार, उस समय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में शारीरिक गतिविधियां अधिक थीं.
घर के कई काम हाथ से किये जाते थे. सिलबट्टे पर पीसना, चक्की और ढेंकी जैसे पारंपरिक काम, सफाई और खाना बनाने के अलावा खेत-बगीचे के काम भी शारीरिक मेहनत से जुड़े थे. मशीनों पर निर्भरता कम थी.
मीनाक्षी के अनुसार, उस दौर में घर के बने भोजन का चलन अधिक था. दाल, चावल, सब्जी, भुंजा, मुढ़ी, चूड़ा, दही और दूध जैसे खाद्य पदार्थ सामान्य भोजन का हिस्सा थे. आज की तुलना में पिज्जा, बर्गर जैसे फास्ट फूड का चलन कम था. उनका मानना है कि अधिक शारीरिक गतिविधि, घर का भोजन और दिनचर्या में बदलाव का असर शरीर पर भी पड़ता है.
वह नींद और दिनचर्या के अंतर की ओर भी ध्यान दिलाती हैं. उनके अनुसार, पहले जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने की आदत अधिक थी, जबकि आज देर रात तक जागना आम है. पर्याप्त नींद और नियमित दिनचर्या शरीर के लिए जरूरी है.
चटख रंग, बड़े प्रिंट और बेलबॉटम की वापसी
फैशन की दुनिया में भी 80s की छाप फिर दिखाई दे रही है. रांची विमेंस कॉलेज के फैशन डिजाइनिंग विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर रत्ना सिंह के अनुसार, 80s का फैशन आज रेट्रो फैशन के रूप में लौट रहा है.
उस दौर में लाल, हरा, पीला जैसे चटख रंग और बड़े प्रिंट पसंद किये जाते थे. महिलाओं की साड़ियों में बड़े प्रिंट और चौड़े बॉर्डर, पफ स्लीव वाले ब्लाउज, सलवार-कमीज और आकर्षक आभूषणों का चलन था. बालों में घनापन और वॉल्यूम पर खास ध्यान दिया जाता था.
पुरुषों के पहनावे में बड़े कॉलर वाली शर्ट, ऊंची कमर वाली पैंट और बेलबॉटम खास थे. रत्ना सिंह के अनुसार, फैशन समय के साथ फिर लौटता है. पुराने चलन नये रूप में सामने आते हैं. आज पफ स्लीव, बड़े प्रिंट और चौड़े या ढीले आकार के कपड़ों में 80s की झलक देखी जा सकती है. हालांकि इन्हें आज की सुविधा और जरूरत के अनुसार बदला गया है.

तब तस्वीर कम, याद ज्यादा
80 के दशक में तस्वीरें खींचना आज की तरह आसान नहीं था. हर पल कैमरे में कैद नहीं होता था. इसलिए एक तस्वीर के पीछे कोई अवसर, कोई व्यक्ति या कोई खास याद जुड़ी होती थी. आज मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने तस्वीरों की संख्या बहुत बढ़ा दी है. तस्वीर को फिल्टर और संपादन के जरिये मनचाहा रूप देना भी आसान हो गया है.
AI ने इसमें एक और परत जोड़ दी है. अब व्यक्ति केवल पुरानी तस्वीर नहीं देख रहा, बल्कि खुद को उस दौर में कल्पना करके देख सकता है. नयी पीढ़ी के लिए यह उस समय को समझने और महसूस करने का दृश्य माध्यम बन गया है, जिसे उसने देखा नहीं.
मनोरंजन से लेकर यादों तक
अभिनेता रमन गुप्ता इस चलन को मनोरंजन का माध्यम मानते हैं. उनका कहना है कि ऐसे चलन लोगों को अपने तय कार्यक्रम से कुछ समय बाहर निकलकर मनोरंजन करने का मौका देते हैं. उन्होंने AI तस्वीर की जगह अपने कॉलेज के दिनों की वास्तविक तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया.

सोशल मीडिया पर नेताओं के 80s लुक भी छाये
80s का यह ट्रेंड सोशल मीडिया पर आम लोगों तक ही सीमित नहीं है. झारखंड के कई प्रमुख राजनीतिक चेहरों की 80s लुक वाली तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर खूब साझा की जा रही हैं. समर्थकों की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, कल्पना सोरेन और जयराम महतो की AI से तैयार 80s अंदाज वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट की जा रही हैं, जिन्हें लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. हालांकि, इन नेताओं ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से ऐसी तस्वीरें साझा नहीं की हैं.
वहीं, लोहरदगा सांसद सुखदेव भगत, हजारीबाग सांसद मनीष जायसवाल और बड़कागांव की पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने 80s लुक में अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की हैं. इस तरह AI से तैयार रेट्रो तस्वीरों का चलन अब युवाओं और सोशल मीडिया यूजर्स के साथ राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों तक भी पहुंच गया है.

हटिया विधायक नवीन जायसवाल ने भी AI से अपनी तस्वीर तैयार कर सोशल मीडिया पर साझा की. उनके अनुसार, इस चलन ने पुराने दिनों और युवा अवस्था की यादें ताजा कर दीं.
झारखंड सरकार के मंत्री इरफान अंसारी 80s के दौर को आज से बेहतर मानते हैं. उनका कहना है कि उस समय लोगों के बीच भाईचारा था और उन्हें वह दौर पसंद है.
शायद इस पूरे चलन का आकर्षण इसी में छिपा है. 80s में जी चुकी पीढ़ी के लिए यह अपनी पुरानी यादों तक लौटने का बहाना है. नयी पीढ़ी के लिए उस दौर को अपनी कल्पना में देखने का मौका. और सोशल मीडिया के लिए यह मनोरंजन और साझा करने का नया तरीका.
AI बीते हुए समय को वापस नहीं ला सकता, लेकिन एक तस्वीर के जरिये कुछ पल के लिए इंसान को उस दौर में जरूर ले जाता है. शायद आज की तेज रफ्तार जिंदगी में 80s का आकर्षण इसी कुछ पल के ठहराव में है.
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