12 साल पुराने अग्रिम जमानत आदेश में झारखंड हाईकोर्ट ने दी राहत, सरेंडर के लिए दो हफ्ते का अतिरिक्त समय

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झारखंड हाईकोर्ट की फाइल फोटो.

झारखंड हाईकोर्ट ने 12 वर्ष पुराने अग्रिम जमानत आदेश में संशोधन करते हुए याचिकाकर्ता को निचली अदालत में आत्मसमर्पण के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है. अदालत ने कहा कि जमानत की शर्तें ऐसी नहीं होनी चाहिए जो उसके उद्देश्य को ही निष्प्रभावी कर दें.

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Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने 12 वर्ष पुराने अग्रिम जमानत आदेश में संशोधन करते हुए याचिकाकर्ता को निचली अदालत में आत्मसमर्पण के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है. अदालत ने सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की कि जमानत देते समय ऐसी कठोर शर्तें नहीं लगायी जानी चाहिए, जिनसे जमानत का उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाए. न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने गोड्डा निवासी सपथ कुमार चंद्र उर्फ सपथ कुमार चंद की याचिका का निस्तारण करते हुए 26 मार्च 2014 के आदेश में सीमित संशोधन किया और बाकी सभी शर्तों को यथावत रखा.

2014 में मिली थी अग्रिम जमानत

मामला वर्ष 2014 में पारित अग्रिम जमानत आदेश से जुड़ा है. उस समय हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत देते हुए तीन व्यक्तियों संजय कुमार दुबे, राजेश साह और अरुण सिंह को 35-35 हजार रुपये भुगतान करने की शर्त लगायी थी. इसके अलावा जीवन भगत के नाम 23 हजार रुपये का बैंक ड्राफ्ट जमा करने का भी निर्देश दिया गया था. इस तरह कुल 1.28 लाख रुपये जमा करना जमानत की शर्त का हिस्सा था.

पैसे नहीं जुटा पाने से नहीं कर सके थे सरेंडर

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि आर्थिक कारणों से वह निर्धारित समय के भीतर यह राशि नहीं जुटा सका, जिसके कारण निचली अदालत में आत्मसमर्पण भी नहीं कर पाया. अब उसने अदालत को भरोसा दिलाया कि वह आवश्यक राशि की व्यवस्था कर चुका है और एक सप्ताह के भीतर उसे जमा कर देगा. इसी आधार पर उसने आत्मसमर्पण के लिए अतिरिक्त समय देने की मांग की.

राज्य सरकार ने देरी पर उठाया सवाल

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गयी कि याचिकाकर्ता को 2014 में ही अग्रिम जमानत का लाभ मिल चुका था, लेकिन उसने इतने वर्षों तक निचली अदालत में आत्मसमर्पण नहीं किया. सरकार ने यह भी कहा कि इतने लंबे अंतराल के बाद संशोधन याचिका दायर की गयी है.

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जमानत देना न्यायिक विवेक का विषय है और उससे जुड़ी शर्तें भी न्यायिक सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए. अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शर्त लगाने के लिए शर्त नहीं लगायी जानी चाहिए. यदि कोई शर्त इतनी कठिन हो कि आरोपी उसका पालन ही न कर सके, तो इसका अर्थ होगा कि एक हाथ से जमानत दी गयी और दूसरे हाथ से वापस ले ली गयी.

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आदेश में क्या हुआ संशोधन

अदालत ने याचिकाकर्ता के इस आश्वासन को स्वीकार किया कि वह एक सप्ताह के भीतर निर्धारित राशि जमा करेगा. इसके बाद उसे 21 अगस्त 2026 से दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने की अतिरिक्त मोहलत दे दी गयी. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 26 मार्च 2014 के आदेश में केवल इसी सीमा तक संशोधन किया गया है, जबकि बाकी सभी शर्तें पहले की तरह लागू रहेंगी.

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