रांची : खेमका परिवार ने दुश्वारियों से गुजर कर हासिल किया मुकाम, कभी छोटे से कमरे में बनाते थे ग्रीस, आज देश में है पहचान
Updated at : 08 Oct 2018 5:59 AM (IST)
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राजेश कुमार रांची : सफलता कभी आसानी से नहीं मिलती. रांची जैसे छोटे शहरों से निकल कर देश में अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था. एक छोटे से कमरे से व्यापार की शुरुआत कर आज देश में रांची की अलग पहचान बनायी है. हम बात कर रहे हैं अपर बाजार निवासी खेमका परिवार की. […]
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राजेश कुमार
रांची : सफलता कभी आसानी से नहीं मिलती. रांची जैसे छोटे शहरों से निकल कर देश में अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था. एक छोटे से कमरे से व्यापार की शुरुआत कर आज देश में रांची की अलग पहचान बनायी है.
हम बात कर रहे हैं अपर बाजार निवासी खेमका परिवार की. खेमका परिवार का इतिहास काफी पुराना है. खेमका परिवार का कारोबार तब शुरू हुआ, जब परिवार के प्रधान तोलाराम खेमका और बैजनाथ खेमका राजस्थान के चुरू से लगभग 1900 ई में रांची पहुंचे. बाद में तोलाराम बैजनाथ फर्म बनाया गया. सबसे पहले अपर बाजार में गल्ला-किराना की दुकान खोली. अधिकांश पारिवारिक कारोबारों की तरह ही कई वर्षों के दौरान इसमें भी कई बंटवारे हुए हैं.
1962 में ग्रीस बनाना शुरू किया : बैजनाथ खेमका के तीन पुत्रों में से एक बाबूलाल खेमका और बाबूलाल खेमका के पुत्र चतुर्भुज खेमका पेनसॉल इंडस्ट्रीज के संस्थापक हैं.
आज रांची ही नहीं, पूरे देश में इनकी एक अलग पहचान बन गयी है. चतुर्भुज खेमका कहते हैं कि उन दिनाें ग्रीस छोटे पैकेटों में काफी बिकती थी, उसी तर्ज पर एक छोटे से कमरे में पैकेज ग्रीस बनाने से शुरुआत की गयी. नाम रखा गया पेनसॉल.
पहले कड़ाही में बनता था ग्रीस : चतुर्भुज खेमका बताते हैं कि पहले ग्रीस बनाने की कहानी काफी रोचक है. 1962 मेें कड़ाही में ग्रीस बनाया जाता था. उस समय 450 ग्राम ग्रीस की कीमत एक से दो रुपये थी. यह ग्रीस बनाने में समय लगता था.
मोबिल की कीमत 87 पैसे प्रति लीटर थी : 1962 के आसपास मोबिल की कीमत 87 पैसे प्रति लीटर थी. आज यह 250 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है.
कंपनी से मोबिल की खरीदारी होती थी. 1972 तक ग्रीस बनाने का काम पूरी तरह से मैनुअली तरीके से चला. चतुर्भुज खेमका के बड़े पुत्र अरुण खेमका पिता के कारोबार में सहयोगी बने, तो उन्होंने ग्रीस मैन्यूफैक्चरिंग प्रोसेस का मशीनीकरण किया. 1972 में चुटिया में नयी फैक्टरी खोली गयी. 10 साल तक इस फैक्टरी में काम चला.
2010 में आया था बुरा दौर
श्री खेमका कहते हैं कि इसके बाद 1993 में नयी फैक्टरी मध्य प्रदेश के पिथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के इंदौर शहर में लगायी गयी. 2010 में एक समय काफी बुरा दौर आया था. नामकुम वाली फैक्टरी में आग लग गयी. परिवार के लोग काफी परेशान हो गये. लगभग दो करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
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