प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य सम्मेलन का आगाज, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनपक्षधर लेखन पर मंथन

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राज्य सम्मेलन में मौजूद प्रगतिशील लेखक संघ के पदधारी

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रामगढ़ में प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस), झारखंड के दो दिवसीय पांचवें राज्य सम्मेलन का शानदार आगाज हुआ. इस सम्मेलन में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, सामाजिक न्याय और जनपक्षधर लेखन पर साहित्यकारों ने अपने विचार रखे.

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रामगढ़ : प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस), झारखंड के दो दिवसीय पांचवें राज्य सम्मेलन की शुरुआत शनिवार को रजरप्पा स्थित खगेन्द्र ठाकुर नगर, ऑफिसर्स क्लब (सीसीएल) में हुई. सम्मेलन की शुरुआत संगठन के झंडोत्तोलन के साथ हुई. इस अवसर पर प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव डॉ सुखदेव सिंह सिरसा समेत राज्यभर से साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, शोधार्थी, विद्यार्थी और प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े लोग शामिल हुए.

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उद्घाटन सत्र की शुरुआत इप्टा के कलाकारों ने शैलेंद्र का चर्चित गीत "तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर" प्रस्तुत कर की. खोरठा के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बीएन ओहदार ने स्वागत भाषण दिया. इप्टा की राज्य महासचिव अर्पिता ने कहा कि प्रगतिशील आंदोलन में महिलाओं और हाशिए के समाज की आवाजों को समान भागीदारी मिलनी चाहिए.

लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा पर जोर

सम्मेलन में वक्ताओं ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, सामाजिक न्याय तथा जनपक्षधर और प्रगतिशील लेखन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. राष्ट्रीय महासचिव डॉ सुखदेव सिंह सिरसा ने कहा कि प्रलेस के 90 वर्ष केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर गंभीर आत्ममंथन का भी समय है. कथाकार रणेंद्र ने कहा कि प्रगतिशील विचारधारा का प्रभाव हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं और शास्त्रीय संगीत तक में देखा जा सकता है. प्रो. अहमद बद्र ने गंभीर और समाजोन्मुख साहित्य की आवश्यकता पर बल दिया. प्रो रामानंदन सिंह ने रचनात्मक कार्यों के साथ संगठन को मजबूत बनाने का आह्वान किया.

इस दौरान शैलेंद्र, प्रो अहमद बद्र, पंकज मित्र, अनीस अंकुर, गुंजल मुंडा समेत कई साहित्यकारों ने भी अपने विचार रखे. उद्घाटन सत्र का संचालन राज्य महासचिव मिथिलेश ने किया, जबकि आयोजन समिति के सचिव पॉवेल कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन दिया.

पुरखे रचनाकारों पर विशेष सत्र

सम्मेलन के दूसरे सत्र में पुरखे रचनाकारों के साहित्य और योगदान पर चर्चा हुई. विद्रोही कवि सुकांत भट्टाचार्य पर बोलते हुए पार्थ बनर्जी ने कहा, "क्रांति और भूख एक आंतरिक दृष्टि है." इसके अलावा विजयदान देथा, महाश्वेता देवी, अमरकांत और डॉ. नामवर सिंह के साहित्यिक योगदान पर कमल, पार्थ बनर्जी और डॉ प्रज्ञा गुप्ता ने वक्तव्य दिया. सत्र की अध्यक्षता नियाज अख्तर, निशि प्रभा और रणेंद्र ने की, जबकि संचालन संजय सोलोमन ने किया.

नाटक और कविता पाठ मुख्य आकर्षण

शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रम में रायपुर से आए इप्टा के वरिष्ठ रंगकर्मी और नाचा थिएटर विशेषज्ञ निसार अली व उनकी टीम ने नाटक प्रस्तुत किया. सम्मेलन के दूसरे दिन विभिन्न वैचारिक सत्रों के साथ युवा रचनाकारों का कविता पाठ होगा. आयोजकों के अनुसार यह सम्मेलन झारखंड के प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होगा.


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