भारत माला की सड़क बनी हाथियों की राह में रोड़ा, गांवों में बढ़ा मानव-हाथी संघर्ष

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गांव में घुसा हाथियों का झुंड : प्रभात खबर

भारतमाला सड़क निर्माण के कारण हाथियों के पारंपरिक रास्ते बाधित हुए हैं, जिससे गांवों में मानव-हाथी संघर्ष बढ़ गया है और किसानों को भारी नुकसान हो रहा है.

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गोला से राजकुमार की रिपोर्ट

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रामगढ़ जिला के गोला वन क्षेत्र में मानव और हाथियों के बीच बढ़ता संघर्ष अब गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है. जंगल से निकलकर हाथियों के झुंड लगातार गांवों और खेतों का रुख कर रहे हैं. एक ओर जहां हाथियों के झुंड किसानों की तैयार फसलों को रौंदकर उनकी महीनों की मेहनत बर्बाद कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वन विभाग के सामने भी हाथियों को सुरक्षित तरीके से जंगल की ओर खदेड़ने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी है.

पिछले कई महीनों से जारी इस संघर्ष ने ग्रामीणों की रातों की नींद छीन ली है. स्थिति यह है कि शाम ढलते ही जंगल से सटे गांवों में दहशत फैल जाती है और लोग रातभर जागकर अपने घर और खेतों की निगरानी करने को मजबूर हैं. शनिवार देर रात मुरपा गांव में जंगली हाथियों के झुंड ने खेतों में घुसकर कई किसानों की तैयार फसलों को रौंद दिया. हाथियों के उत्पात से कई लोगों के फसलें प्रभावित हुई.

ग्रामीणों में भय का माहौल

घटना के बाद गांव में भय का माहौल है. किसानों का कहना है कि एक तरफ खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और दूसरी ओर तैयार फसल हाथियों के झुंड द्वारा नष्ट कर दी जा रही है. ऐसे में परिवार के सामने आर्थिक संकट गहराता जा रहा है.

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भारतमाला सड़क ने बदली हाथियों की राह

ग्रामीणों और वन विभाग से जुड़े लोगों के अनुसार हाथियों की परेशानी बढ़ने के पीछे कई कारण हैं. इनमें सबसे प्रमुख कारण भारतमाला परियोजना के तहत बन रही सड़क को माना जा रहा है. सड़क निर्माण के कारण हाथियों के पारंपरिक आवाजाही मार्ग प्रभावित हुए हैं. जिन रास्तों से हाथियों के झुंड वर्षों से एक जंगल से दूसरे जंगल तक आते-जाते रहे हैं, वहां अब चौड़ी सड़क और निर्माण कार्य खड़ा हो गया है. इससे हाथियों को सड़क पार करने में परेशानी हो रही है और वे अपने पुराने मार्ग से भटककर गांव और खेतों की ओर पहुंच रहे हैं.

वर्तमान में भारतमाला परियोजना के तहत जैनामोड़ से ओरमांझी तक सड़क निर्माण कार्य लगभग पूरा होने के कगार पर है. हाथियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए करीब पांच स्थानों पर कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव भी सामने आया था, लेकिन अभी तक कॉरिडोर धरातल पर नहीं उतर सका है. यही कारण है कि हाथियों के लिए जंगल के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंचने के प्राकृतिक रास्ते लगातार सीमित होते जा रहे हैं. हाथियों के साथ कई छोटे-छोटे शावक हैं. जो सड़क पार करने की कोशिश जरुर करते हैं, लेकिन सेफ्टी क्रैश बेरियर को पार नहीं कर पाते हैं. मजबूरन उन्हें जंगल की ओर लौटना पड़ता है. ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की स्थिति हाथियों को और अधिक बेचैन कर रही है.

जंगल सिमटे, भोजन की तलाश में गांव पहुंच रहे हाथी

जानकारों के अनुसार हाथी वन्यजीव हैं और जंगल ही उनका प्राकृतिक आवास है. लेकिन लगातार जंगलों के सिमटने और वन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां बढ़ने से हाथियों के लिए पर्याप्त भोजन और सुरक्षित आवागमन की समस्या पैदा हो रही है. भोजन और पानी की तलाश में हाथियों के झुंड अब जंगल से निकलकर खेतों और गांवों तक पहुंच रहे हैं. वन विभाग हाथियों को आबादी वाले क्षेत्रों से दूर करने के लिये लगातार अभियान चला रहा है.

विभागीय कर्मी और वनरक्षक कई-कई घंटे, यहां तक कि पूरी रात हाथियों की निगरानी में गुजार रहे हैं. हाथियों को एक क्षेत्र से सुरक्षित तरीके से खदेड़कर दूसरे जंगल की ओर भेजा जाता है, लेकिन एक-दो दिन बाद वही झुंड फिर वापस लौट आता है. इससे वन विभाग के प्रयास भी स्थायी समाधान में तब्दील नहीं हो पा रहे हैं.

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दस दिनों में चार मौतों से बढ़ी चिंता

हाथियों के बढ़ते आतंक का सबसे गंभीर पहलू मानव जीवन पर मंडराता खतरा है. पिछले दस दिनों के भीतर हाथियों के हमले में चार लोगों की मौत हो चुकी है. लगातार हो रही घटनाओं से ग्रामीणों में भय व्याप्त है. शाम होते ही जंगल से सटे गांवों के लोग घरों में दुबकने को मजबूर हो जाते हैं. रात के अंधेरे में जरूरी काम से घर से बाहर निकलना भी उनके लिए जोखिम भरा हो गया है. ग्रामीणों का कहना है कि वे न तो हाथियों को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं और न ही अपने खेत और घर छोड़ सकते हैं.

वे चाहते हैं कि सरकार और वन विभाग ऐसा स्थायी समाधान निकाले, जिससे हाथियों को भी सुरक्षित आवास और आवाजाही का रास्ता मिले तथा ग्रामीणों की जान और संपत्ति भी सुरक्षित रह सके. वहीं गत दिन गोला के नया सिरका गांव में दो हाथी एक कुएं में गिर गये थे. जिसे वन विभाग के द्वारा सुरक्षित बाहर निकाला गया.

स्थायी समाधान निकालने की जरुरत

फिलहाल स्थिति ऐसी है कि हाथी अपने प्राकृतिक रास्ते और भोजन की तलाश में भटक रहे हैं, ग्रामीण अपनी जान और फसल बचाने की चिंता में हैं और वन विभाग दोनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रहा है. यदि जल्द ही हाथियों के पारंपरिक गलियारों को सुरक्षित करते हुए कॉरिडोर का निर्माण नहीं किया गया और जंगलों में हाथियों के लिए पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में मानव-हाथी संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है.

जरूरत इस बात की है कि विकास और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन कायम करते हुए ऐसा स्थायी समाधान निकाला जाये, जिससे जंगल भी सुरक्षित रहें, हाथियों की राह भी बनी रहे और ग्रामीणों का जीवन भय के साये से बाहर आ सके.


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